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नहीं रहे हरित क्रांति के जनक कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन

हरित क्रांति (ग्रीन रेवोल्यूशन) के जनक और प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन का गुरुवार को तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में निधन हो गया है। वे 98 वर्ष के थे।

Posts by : Rajesh Bhagtani | Updated on: Thu, 28 Sept 2023 10:48:21

नहीं रहे हरित क्रांति के जनक कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन

नई दिल्ली। हरित क्रांति (ग्रीन रेवोल्यूशन) के जनक और प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन का गुरुवार को तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में निधन हो गया है। वे 98 वर्ष के थे। उन्हें उम्र संबंधी कई सारी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां थीं। प्रोफेसर स्वामीनाथन को भारत में गेहूं और चावल की उच्च उपज देने वाली किस्मों को विकसित करने का श्रेय प्राप्त है।

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में सुबह 11.20 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। स्वामीनाथन जन्म 7 अगस्त, 1925 को हुआ था। कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथ ने 98 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्हें भारत में हरित क्रांति के जनक के तौर पर जाना जाता है। मिली जानकारी के मुताबिक लंबी उम्र की वजह से आने वाली दिक्कतों के चलते उनका निधन हुआ।

भारत को अकाल से बचाने के लिए बोरलॉग के साथ किया था काम

स्वामीनाथन डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के वैज्ञानिक थे। उन्होंने 1972 से लेकर 1979 तक 'इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च' के अध्यक्ष के तौर पर भी काम किया। कृषि क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से नवाजा था। स्वामीनाथन की गिनती भारत के महान कृषि वैज्ञानिकों के तौर पर होती है, जिन्होंने धान की ऐसी किस्म को तैयार किया, जिसने भारत के कम आय वाले किसानों को ज्यादा धान पैदा करने के काबिल बनाया। भारत को अकाल से बचाने और खाद्यान सुरक्षा दिलाने के लिए उन्होंने अमरीकी वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग के साथ 1960 के दशक में काम किया था।

कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से हुए सम्मानित

डॉ. स्वामीनाथन को ढेरों पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1961 में उन्हें बायोलॉजिकल साइंसेज में योगदान के लिए एस.एस. भटनागर अवॉर्ड से नवाजा गया। कम्युनिटी लीडरशिप के लिए वह 1971 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किए गए। स्वामीनाथन को 1986 में अल्बर्ट आइंस्टीन वर्ल्ड साइंसेज अवॉर्ड और 1987 में पहला वर्ल्ड फूड प्राइज अवॉर्ड भी मिला। कृषि वैज्ञानिक को साल 2000 में फ्रेंकलिन डी. रूजवैल्ड फॉर फ्रीडम मेडल और महात्मा गांधी प्राइज ऑफ यूनेस्को अवॉर्ड दिया गया। 2007 में उन्हें लाल बहादुर शास्त्री नेशनल अवार्ड मिला।

स्वामीनाथन को 1967 में पद्म श्री, 1972 में पद्म भूषण और 1989 में पद्म विभूषण सहित भारत के सर्वोच्च सम्मानों से सम्मानित होने का गौरव हासिल हुआ। उन्हें दुनियाभर की यूनिवर्सिटी से 81 मानद डॉक्टरेट उपाधियां हासिल हुईं। डॉ. स्वामीनाथन 2007-13 तक राज्यसभा सदस्य भी रहे।

कृषकों को आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभाई

स्वामीनाथन ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने किसानों को धान, गेंहू की ऐसी किस्म को पैदा करना सिखाया। जाहिर है कि इससे भारतीय किसानों की आय में बढ़ोतरी हुई। उन्होंने गरीब किसानों के खेतों में मेढ़ के किनारे वृक्षों को लगाने की बात बताई। इससे कृषकों की आमदनी में बढ़ोतरी हुई और वे धीरे-धीरे आत्मनिर्भर होते चले गए। हरित क्रांति प्रोजेक्ट के माध्यम से स्वीमानाथ ने कृषि क्षेत्र में बहुत सारे बदलाव किए। उनके प्रयासों के चलते भारत में अकाल के हालात में गुणात्मक सुधार आए।

हरित क्रांति ने बदली भारत की तस्वीर

कृषि वैज्ञानिक डॉ. स्वामीनाथन ने 'हरित क्रांति' की सफलता के लिए दो केंद्रीय कृषि मंत्रियों सी. सुब्रमण्यम (1964-67) और जगजीवन राम (1967-70 और 1974-77) के साथ मिलकर काम किया। ये एक ऐसा प्रोग्राम था, जिसमें केमिकल-बायोलॉजिकल टेक्नोलॉजी के जरिए गेहूं और चावल की प्रोडक्टिविटी बढ़ाई गई। हरित क्रांति की वजह से भारत अनाज के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के रास्ते पर आगे बढ़ पाया। हरित क्रांति की वजह से भारत की तस्वीर बदल गई।

हरित क्रांति के चलते भारत में गेहूं और चावल के उत्पादन में भारी इजाफा देखने को मिला। भारत में नई किस्म के बीजों का इस्तेमाल किया गया। सिंचाई सुविधाएं बेहतर की गईं और कीटनाशक एवं उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ाया गया। इसके परिमास्वरूप 1978-79 में भारत में 131 मिलियन टन अनाज पैदा हुआ। भारत को एक वक्त पर अनाज के लिए विदेशी मुल्कों पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन हरित क्रांति की वजह से भारत एक कृषि उत्पादक देश बन गया।

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