
ईरान इस समय गंभीर राजनीतिक और आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। पूरे देश में विरोध प्रदर्शन तेज़ हो गए हैं और सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि वहां इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं पर रोक लगा दी गई है। यह संकट केवल ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर भारत जैसे देशों पर भी पड़ सकता है, जिनके रणनीतिक और व्यापारिक हित ईरान से गहराई से जुड़े हुए हैं। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि जो भी देश ईरान के साथ व्यापार करेंगे, उन पर अतिरिक्त 25% टैरिफ लगाया जाएगा। ऐसे में यह खबर भारत के लिए चिंता का विषय बन गई है, क्योंकि भारत ईरान का महत्वपूर्ण व्यापारिक पार्टनर है।
भारत के लिए ईरान की रणनीतिक अहमियत
ईरान भारत की विदेश नीति और व्यापार रणनीति में एक अहम भूमिका निभाता है। भारत ने मध्य एशिया, रूस और यूरोप तक अपनी पहुंच मजबूत करने के लिए जिन परियोजनाओं में निवेश किया है, उनमें ईरान एक प्रमुख ट्रांजिट हब की तरह काम करता है। खासकर ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।
चाबहार पोर्ट भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप तक सीधे व्यापारिक रास्ते प्रदान करता है। यही बंदरगाह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का भी अहम हिस्सा है। इस मार्ग के जरिए भारत निर्यात-आयात में लगभग 40% समय और 30% लागत की बचत कर सकता है। यदि ईरान में अस्थिरता बढ़ती है और चाबहार बंदरगाह प्रभावित होता है, तो भारत की भू-आर्थिक रणनीति पर बड़ा असर पड़ेगा।
भारत-ईरान व्यापार पर संभावित असर
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 1.68 अरब डॉलर रहा। इसमें भारत ने ईरान को 1.24 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया, जबकि 0.44 अरब डॉलर का आयात हुआ। भारत को लगभग 0.80 अरब डॉलर का व्यापारिक लाभ हुआ।
भारत से ईरान निर्यात किए जाने वाले प्रमुख सामानों में चावल, चाय, चीनी, दवाइयां, इलेक्ट्रिक मशीनरी और कृत्रिम फाइबर शामिल हैं। वहीं ईरान से भारत में मुख्यत: सूखे मेवे, रसायन और कांच से बने उत्पाद आते हैं। यदि संकट गहरा जाता है या चाबहार पोर्ट एवं INSTC मार्ग बाधित होते हैं, तो भारत-ईरान व्यापार पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
तेल और गैस पर असर
ईरान दुनिया के प्रमुख तेल और गैस उत्पादक देशों में शामिल है। यदि ईरान संकट का असर होर्मुज जलडमरूमध्य तक पहुँचता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। दुनिया के लगभग 20% कच्चे तेल की आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। इस वजह से तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत का आयात बिल बढ़ेगा, जिसका असर परिवहन लागत, माल ढुलाई और आम उपभोक्ताओं पर महंगाई के रूप में दिखाई देगा। पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम देश में महंगाई के दबाव को और तेज कर सकते हैं।
भारत के लिए ईरान में स्थिरता का महत्व
ईरान में हालात केवल एक पड़ोसी देश की समस्या नहीं हैं, बल्कि यह भारत की व्यापारिक, ऊर्जा और रणनीतिक सुरक्षा से सीधे जुड़ा मामला है। चाबहार पोर्ट, INSTC कॉरिडोर और तेल आपूर्ति जैसे मुद्दे भारत की दीर्घकालिक आर्थिक योजनाओं से जुड़े हैं। यदि ईरान में अस्थिरता बढ़ती है, तो भारत को इसके दूरगामी प्रभावों के लिए तैयार रहना होगा।














