
उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को खत्म करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने हाल ही में नए नियमों का मसौदा तैयार किया था। लेकिन इन नियमों की भाषा और प्रावधानों को लेकर उठे सवालों के बीच अब सुप्रीम कोर्ट ने इनके अमल पर अंतरिम रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि ये विनियम प्रथम दृष्टया अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने मौखिक टिप्पणी में यह भी चेताया कि यदि समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो इसके दूरगामी और खतरनाक सामाजिक परिणाम हो सकते हैं, जो समाज को और अधिक विभाजित कर सकते हैं। ऐसे में यह जानना अहम हो जाता है कि आखिर ये दोनों जज कौन हैं, जिन्होंने UGC के नियमों पर रोक लगाने का बड़ा फैसला सुनाया।
कौन हैं मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत?
भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत का नाम उन न्यायाधीशों में शुमार है, जो देश के कई संवेदनशील और ऐतिहासिक मामलों में फैसले देने वाली पीठ का हिस्सा रहे हैं। अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को निरस्त करने का मामला हो, बिहार मतदाता सूची संशोधन से जुड़ा विवाद, पेगासस स्पाइवेयर प्रकरण या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकता के अधिकार जैसे मुद्दे—न्यायमूर्ति सूर्यकांत की भूमिका इन सभी में महत्वपूर्ण रही है। हरियाणा के हिसार जिले में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे सूर्यकांत ने एक छोटे शहर के वकील के रूप में अपना करियर शुरू किया और धीरे-धीरे देश के सर्वोच्च न्यायिक पद तक पहुंचे।
उन्होंने 24 नवंबर 2025 को भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी और 9 फरवरी 2027 को 65 वर्ष की आयु पूरी होने पर सेवानिवृत्त होंगे। प्रधान न्यायाधीश बनने के बाद उन्होंने साफ किया था कि उनकी दो सर्वोच्च प्राथमिकताएं होंगी—अदालतों में लंबित पांच करोड़ से अधिक मामलों का शीघ्र निपटारा और वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली, खासकर मध्यस्थता को प्रोत्साहित करना।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत का न्यायिक सफर
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में अपने कार्यकाल के दौरान कई चर्चित और दूरगामी फैसले देने वाले न्यायमूर्ति सूर्यकांत को 5 अक्टूबर 2018 को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। इसके बाद उच्चतम न्यायालय में पदोन्नति के बाद उन्होंने संवैधानिक मूल्यों से जुड़े अहम मामलों में निर्णायक भूमिका निभाई। वह उस पीठ का हिस्सा रहे, जिसने औपनिवेशिक काल के राजद्रोह कानून के इस्तेमाल पर रोक लगाते हुए सरकार को इसके पुनरावलोकन तक कोई नई एफआईआर दर्ज न करने का निर्देश दिया था।
SIR और लोकतांत्रिक अधिकारों पर रुख
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने निर्वाचन आयोग को बिहार में मसौदा मतदाता सूची से बाहर किए गए करीब 65 लाख मतदाताओं का विवरण सार्वजनिक करने का निर्देश दिया था। मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ दायर याचिकाओं की सुनवाई करते हुए उन्होंने लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर जोर दिया। जमीनी स्तर पर लोकतंत्र और लैंगिक न्याय को मजबूती देने वाले फैसलों में भी उनका नाम अग्रणी रहा है। उन्होंने गैरकानूनी तरीके से हटाई गई एक महिला सरपंच को बहाल करने का आदेश देते हुए प्रशासनिक स्तर पर मौजूद लैंगिक पूर्वाग्रह को उजागर किया। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन समेत अन्य बार एसोसिएशनों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का निर्देश भी उनके नेतृत्व वाली पीठ ने दिया।
राष्ट्रीय सुरक्षा और चार धाम परियोजना पर फैसला
2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पंजाब यात्रा के दौरान हुई सुरक्षा चूक की जांच के लिए न्यायमूर्ति सूर्यकांत उस पीठ का हिस्सा थे, जिसने पूर्व न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में एक पांच सदस्यीय समिति गठित की। उन्होंने ‘वन रैंक-वन पेंशन’ (OROP) योजना को संवैधानिक रूप से वैध ठहराते हुए बरकरार रखा और सशस्त्र बलों में स्थायी कमीशन से जुड़े मामलों में महिला अधिकारियों की याचिकाओं पर सुनवाई जारी रखी। उत्तराखंड की चार धाम परियोजना को लेकर भी उन्होंने इसके रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्व को रेखांकित करते हुए इसे जारी रखने का समर्थन किया।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सख्त संदेश
न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कई मौकों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं को स्पष्ट किया है। पॉडकास्टर रणवीर इलाहाबादिया को उनकी विवादित टिप्पणियों पर फटकार लगाते हुए अदालत ने कहा था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ने का लाइसेंस नहीं है। ‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ के होस्ट समय रैना समेत कई स्टैंड-अप कॉमेडियनों को दिव्यांगजनों का मजाक उड़ाने के मामले में भी अदालत ने सख्त रुख अपनाया और केंद्र सरकार को ऑनलाइन कंटेंट के नियमन के लिए दिशानिर्देश लाने का निर्देश दिया। कर्नल सोफिया कुरैशी पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह को भी न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने कड़ी फटकार लगाई और कहा कि एक मंत्री के शब्दों में जिम्मेदारी झलकनी चाहिए।
पेगासस और भ्रष्टाचार पर कड़ा रुख
पेगासस जासूसी मामले में न्यायमूर्ति सूर्यकांत उस पीठ का हिस्सा रहे, जिसने साइबर विशेषज्ञों की एक स्वतंत्र समिति गठित कर जांच के आदेश दिए। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी उनका रुख बेहद सख्त रहा है। 2023 के एक फैसले में उन्होंने भ्रष्टाचार को ‘गंभीर सामाजिक खतरा’ करार देते हुए सीबीआई को बैंकों और बिल्डरों के बीच कथित साठगांठ से जुड़े 28 मामलों की जांच का आदेश दिया था। दिल्ली आबकारी नीति मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जमानत देने वाली पीठ का नेतृत्व भी उन्होंने ही किया और जांच एजेंसियों से निष्पक्षता बनाए रखने की अपेक्षा जताई।
कौन हैं न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची?
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी। उनका कार्यकाल छह वर्ष से अधिक का होगा और इस दौरान वे भविष्य में भारत के प्रधान न्यायाधीश के रूप में भी जिम्मेदारी संभालेंगे। न्यायमूर्ति बागची, न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन के 25 मई 2031 को सेवानिवृत्त होने के बाद, दो अक्टूबर 2031 तक भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद पर रहेंगे। उनका जन्म तीन अक्टूबर 1966 को हुआ था और केंद्र सरकार ने 10 मार्च को उनके नाम को सुप्रीम कोर्ट जज के रूप में नियुक्ति की मंजूरी दी थी।
कॉलेजियम की सिफारिश और न्यायिक अनुभव
तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश खन्ना की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय कॉलेजियम ने छह मार्च को न्यायमूर्ति बागची के नाम की सिफारिश की थी। इस कॉलेजियम में न्यायमूर्ति बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ शामिल थे। कॉलेजियम ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिलाया था कि 2013 में न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर के सेवानिवृत्त होने के बाद से कलकत्ता उच्च न्यायालय से कोई भी न्यायाधीश भारत का प्रधान न्यायाधीश नहीं बना था।
कलकत्ता से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची को 27 जून 2011 को कलकत्ता उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। चार जनवरी 2021 को उनका तबादला आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में हुआ, लेकिन आठ नवंबर 2021 को वे फिर से कलकत्ता उच्च न्यायालय लौट आए। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में उन्होंने 13 वर्षों से अधिक समय तक सेवा दी है। अपने संतुलित फैसलों, संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता और प्रशासनिक अनुभव के चलते आज वे देश के शीर्ष न्यायाधीशों में गिने जाते हैं।














