
नववर्ष का पहला दिन हमेशा नई उम्मीदों, नए संकल्पों और आगे बढ़ने के जज़्बे का प्रतीक माना जाता है। बीते अनुभवों से सीख लेकर आने वाले कल की दिशा तय करने का यही सही वक्त होता है। इसी भावना के साथ साल 2026 की शुरुआत देश के लिए कई सकारात्मक और भरोसा जगाने वाली खबरें लेकर आई है। एक ओर जहां डीआरडीओ और इसरो की तकनीकी उपलब्धियां भारत की सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का संकेत देती हैं, वहीं गिग वर्कर्स को मिलने वाली बेहतर सामाजिक सुरक्षा देश के श्रम वर्ग के भविष्य को ज्यादा सुरक्षित बनाने की दिशा में अहम कदम साबित होगी।
एक ही लांचर से दो प्रलय मिसाइलों का सफल परीक्षण, भारत की बढ़ी सैन्य ताकत
भारत ने बुधवार को ओडिशा के चांदीपुर स्थित अब्दुल कलाम द्वीप से स्वदेशी रूप से विकसित ‘प्रलय’ मिसाइल के दो सफल परीक्षण कर एक अहम उपलब्धि हासिल की। डीआरडीओ ने इस परीक्षण में एक ही मोबाइल लांचर से बैक-टू-बैक दो मिसाइलों को दागकर अपनी उन्नत तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन किया। युद्ध की स्थिति में इस तरह की क्षमता दुश्मन के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है और इसे आधुनिक युद्ध का गेम चेंजर माना जा रहा है।
जब किसी लक्ष्य की ओर एक साथ दो या उससे अधिक मिसाइलें छोड़ी जाती हैं, तो विरोधी देश की वायु रक्षा प्रणाली के लिए उन्हें रोक पाना बेहद मुश्किल हो जाता है। यदि रक्षा प्रणाली एक मिसाइल को निष्क्रिय करने की कोशिश करती है, तो दूसरी मिसाइल अपने लक्ष्य को भेदने में सफल हो जाती है। यही वजह है कि प्रलय का यह डबल स्ट्राइक फीचर दुश्मन की रणनीति को पूरी तरह ध्वस्त करने की ताकत रखता है।
रणनीतिक ठिकानों पर पलक झपकते वार करने में सक्षम
प्रलय मिसाइल दुश्मन के बंकरों, एयरबेस और अन्य अहम सैन्य ठिकानों को बेहद कम समय में नष्ट करने की क्षमता रखती है। पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित यह मिसाइल भारत की ‘आत्मनिर्भर भारत’ नीति का सशक्त उदाहरण है। इसकी उन्नत विशेषताएं इसे दुनिया की प्रभावशाली और आधुनिक मिसाइल प्रणालियों की सूची में शामिल करती हैं। इस मिसाइल को डीआरडीओ की हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला में विकसित किया गया है।
उड़ान के दौरान रास्ता बदलकर दुश्मन को चकमा देने की क्षमता
प्रलय एक ‘क्वासी-बैलिस्टिक’ मिसाइल है, जो उड़ान के दौरान अपना मार्ग बदल सकती है। यह खासियत इसे दुश्मन के रडार से बच निकलने और आखिरी क्षणों में भी दिशा बदलकर सटीक प्रहार करने में सक्षम बनाती है। इसकी उन्नत तकनीक के कारण इसे हवा में इंटरसेप्ट करना या मार गिराना बेहद कठिन हो जाता है।
परीक्षण के दौरान दोनों मिसाइलों ने अपने निर्धारित लक्ष्यों को पूरी सटीकता के साथ भेदा और परीक्षण से जुड़े सभी उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल किया। यह सफलता प्रलय मिसाइल प्रणाली की विश्वसनीयता, तेज प्रतिक्रिया क्षमता और संचालन कुशलता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
रक्षा मंत्रालय ने इस सफल परीक्षण को भारतीय सशस्त्र बलों की रणनीतिक ताकत को और सुदृढ़ करने वाला कदम बताया है। मंत्रालय के अनुसार, इस मिसाइल प्रणाली को आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है।
सेना के बेड़े में शामिल होने के लिए तैयार
प्रलय मिसाइल का यह परीक्षण ‘यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल्स’ का हिस्सा था, जिसका अर्थ है कि इसका विकास चरण पूरा हो चुका है और अब भारतीय सेना इसे अपने मानकों पर परख रही है। इसके सफल होने के बाद इसे औपचारिक रूप से सेना के बेड़े में शामिल किया जाएगा। परीक्षण के दौरान भारतीय सेना और भारतीय वायु सेना के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।
डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने कहा कि यह सफलता इस बात का संकेत है कि प्रलय मिसाइल प्रणाली अब पूरी तरह से तैनाती के लिए तैयार है। उनके अनुसार, यह उपलब्धि भारत की रक्षा रणनीति में एक अहम बदलाव को दर्शाती है, जहां देश अब सिर्फ रक्षात्मक नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि सटीक और प्रभावी आक्रामक क्षमता विकसित कर रहा है।
150 से 500 किलोमीटर तक मारक क्षमता
प्रलय मिसाइल की मारक क्षमता 150 किलोमीटर से लेकर 500 किलोमीटर तक है। यह 350 किलोग्राम से लेकर 1000 किलोग्राम तक का पारंपरिक हथियार अपने साथ ले जाने में सक्षम है, जिसमें कवच-भेदी वारहेड भी शामिल हैं। इसकी यह क्षमता इसे सीमित समय में बड़े और मजबूत लक्ष्यों को नष्ट करने वाला एक शक्तिशाली हथियार बनाती है।
ठोस ईंधन तकनीक से बढ़ी मारक तत्परता
इस मिसाइल प्रणाली में सॉलिड प्रोपेलेंट यानी ठोस ईंधन का उपयोग किया गया है, जो इसे युद्ध की परिस्थितियों में कहीं ज्यादा प्रभावी बनाता है। लिक्विड फ्यूल आधारित मिसाइलों में ईंधन भरने की प्रक्रिया समय लेने वाली होती है, जबकि ठोस ईंधन वाली मिसाइलें पहले से ही ‘रेडी-टू-फायर’ स्थिति में रहती हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इन्हें बेहद कम समय में दागा जा सकता है, जो किसी भी त्वरित और आक्रामक सैन्य कार्रवाई के लिए अत्यंत जरूरी होता है। यही कारण है कि आधुनिक युद्ध रणनीतियों में सॉलिड फ्यूल मिसाइलों को विशेष प्राथमिकता दी जा रही है।
इसरो को साल के अंत में बड़ी सफलता, एसएसएलवी के तीसरे चरण का जमीनी परीक्षण सफल
साल 2025 के समापन से ठीक पहले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एक और अहम उपलब्धि अपने नाम की है। इसरो ने स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (एसएसएलवी) के तीसरे चरण के उन्नत संस्करण का सफल जमीनी परीक्षण कर लिया है। यह परीक्षण मंगलवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में मौजूद सॉलिड मोटर स्टैटिक टेस्ट सुविधा में किया गया।
इसरो द्वारा विकसित एसएसएलवी एक तीन-चरणीय ऑल-सॉलिड लॉन्च व्हीकल है, जिसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसका बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन आसानी से किया जा सके। इसरो के मुताबिक, इसका ऊपरी यानी तीसरा चरण लॉन्च व्हीकल को लगभग चार किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार प्रदान करता है। द्रव्यमान को सीमित रखने के लिए इसमें मोनोलिथिक कंपोजिट मोटर केस और फ्री-स्टैंडिंग नोजल डाइवर्जेंट जैसी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है।
स्टैटिक टेस्ट के जरिए एसएसएलवी के तीसरे चरण (एसएस3) के उस उन्नत संस्करण को मान्यता दी गई है, जिसमें कार्बन-एपॉक्सी मोटर केस लगाया गया है। इससे इस चरण का वजन उल्लेखनीय रूप से कम हुआ है, जिसका सीधा फायदा पेलोड क्षमता में देखने को मिला। नतीजतन, एसएसएलवी अब पहले की तुलना में 90 किलोग्राम अतिरिक्त भार अंतरिक्ष में ले जाने में सक्षम हो गया है।
इसरो ने यह भी स्पष्ट किया कि तीसरे चरण में इग्नाइटर और नोजल सिस्टम के लिए नए और बेहतर डिजाइन अपनाए गए हैं, जिससे पूरी प्रणाली और ज्यादा मजबूत तथा प्रभावी बन गई है। 108 सेकंड तक चले इस परीक्षण के दौरान सभी प्रदर्शन मानक अपेक्षित आंकड़ों के बेहद करीब पाए गए। इस सफल परीक्षण के बाद एसएस3 मोटर के उन्नत संस्करण को भविष्य की लॉन्च उड़ानों में शामिल करने के लिए पूरी तरह योग्य घोषित कर दिया गया है।
वंदे भारत स्लीपर ट्रेन का अंतिम हाई-स्पीड ट्रायल पूरा, 180 किमी प्रति घंटे की रफ्तार हासिल
भारतीय रेलवे ने स्वदेशी तकनीक से तैयार की गई ‘वंदे भारत स्लीपर ट्रेन’ के अंतिम चरण के उच्च गति परीक्षण को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। यह उपलब्धि आत्मनिर्भर रेल प्रौद्योगिकी की दिशा में एक और मजबूत कदम मानी जा रही है।
रेल मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, रेलवे सुरक्षा आयुक्त (सीआरएस) की निगरानी में यह परीक्षण कोटा–नागदा सेक्शन पर किया गया, जहां ट्रेन ने 180 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम गति हासिल की। गौरतलब है कि वंदे भारत स्लीपर ट्रेन की शुरुआत को लेकर पहले कई बार समय-सीमा आगे बढ़ चुकी है।
नवंबर के मध्य में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संकेत दिया था कि इस ट्रेन को दिसंबर 2025 में शुरू किया जाएगा। 30 दिसंबर को उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सुरक्षा परीक्षण से जुड़ा एक वीडियो भी साझा किया था। इस वीडियो में तेज रफ्तार के दौरान ट्रेन के भीतर पानी से भरे गिलासों की स्थिरता दिखाई गई, जो इसकी उन्नत सस्पेंशन और स्थिरता प्रणाली का प्रमाण है।
अधिकारियों ने बताया कि सुरक्षा परीक्षण के दौरान सवारी स्थिरता, ब्रेकिंग क्षमता, आपातकालीन ब्रेकिंग सिस्टम, सुरक्षा उपकरणों और अन्य अहम तकनीकी पहलुओं का व्यापक मूल्यांकन किया गया। इन सभी मानकों पर ट्रेन का प्रदर्शन संतोषजनक पाया गया है।
गिग वर्कर्स के लिए राहत, अब मिलेगा ज्यादा कमीशन
नए साल की शुरुआत गिग वर्कर्स के लिए भी कुछ राहत भरी खबरें लेकर आई है। फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म स्विगी और जोमैटो ने व्यस्त समय और साल के अंत के दिनों में अपने डिलीवरी पार्टनर्स के लिए अधिक कमीशन और प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की है। यह फैसला डिलीवरी वर्कर यूनियनों द्वारा 25 दिसंबर और 31 दिसंबर को वेतन, कामकाजी परिस्थितियों और सामाजिक सुरक्षा की मांग को लेकर हड़ताल के आह्वान के बाद लिया गया है।
जोमैटो ने अपने डिलीवरी पार्टनर्स को शाम छह बजे से रात 12 बजे तक के व्यस्त समय में प्रति ऑर्डर 120 से 150 रुपये तक भुगतान की पेशकश की है। कंपनी ने ऑर्डर की संख्या और उपलब्धता के आधार पर एक दिन में तीन हजार रुपये तक कमाई का भरोसा भी दिया है।
वहीं स्विगी ने 31 दिसंबर 2025 से 1 जनवरी 2026 के बीच अपने डिलीवरी कर्मचारियों को 10 हजार रुपये तक कमाने का अवसर देने की घोषणा की है। इसमें नए साल की पूर्व संध्या पर शाम छह बजे से रात 12 बजे तक पीक आवर्स के दौरान दो हजार रुपये तक का अतिरिक्त भुगतान शामिल है। इसके अलावा, क्विक-कॉमर्स कंपनी जेप्टो ने भी अपने डिलीवरी पार्टनर्स के लिए प्रोत्साहन राशि बढ़ाने का फैसला किया है, जिससे गिग इकोनॉमी में काम कर रहे कर्मचारियों को नए साल पर अतिरिक्त आर्थिक सहारा मिल सके।














