नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने राम मंदिर चढ़ावा मामले पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले के बयान सहित कई समसामयिक मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि राम मंदिर से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं और चढ़ावे में गड़बड़ी के आरोपों की निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच होनी चाहिए, क्योंकि यह मामला करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है।
मनीष तिवारी ने कहा कि इस पूरे प्रकरण में जो आरोप सामने आए हैं, उनकी सच्चाई का पता लगाना बेहद जरूरी है। उनके अनुसार, यदि मंदिर से जुड़े किसी भी स्तर पर कथित गबन या वित्तीय अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि रामलला के जन्मस्थान से जुड़े इस पवित्र स्थल का देशभर के करोड़ों लोगों की आस्था से सीधा संबंध है, इसलिए इसकी गरिमा और विश्वसनीयता हर हाल में बनी रहनी चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि मंदिर से जुड़े घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में कराई जानी चाहिए, ताकि पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आ सके। उनके मुताबिक, ऐसी जांच से न केवल तथ्यों का खुलासा होगा, बल्कि श्रद्धालुओं का विश्वास भी मजबूत होगा और किसी तरह की आशंका या भ्रम की स्थिति समाप्त हो सकेगी।
महाराष्ट्र में कॉमन सिविल कोड पर भी रखी राय
महाराष्ट्र सरकार द्वारा यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) की दिशा में ड्राफ्टिंग कमेटी गठित करने के फैसले पर भी कांग्रेस सांसद ने अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि संविधान में यूनिफॉर्म सिविल कोड का उल्लेख है, जबकि वर्तमान में कॉमन सिविल कोड शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो दोनों अवधारणाओं के बीच अंतर पैदा करता है।
मनीष तिवारी ने कहा कि जब इस विषय पर पहले चर्चा हुई थी और केंद्र सरकार ने पहल की थी, तब स्वयं सरकार ने स्पष्ट किया था कि अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जनजातियों तथा विभिन्न जातीय (एथनिक) समुदायों को इसके दायरे से बाहर रखा जाएगा।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि समाज के इतने बड़े वर्ग को प्रस्तावित कानून के दायरे से बाहर रखा जाता है, जिनके अपने पारंपरिक और प्रथागत (कस्टमरी) कानून हैं, तो फिर इसे वास्तविक अर्थों में यूनिफॉर्म सिविल कोड कैसे कहा जा सकता है। उनके अनुसार, यही इस पूरे विषय का सबसे बड़ा विरोधाभास है। उन्होंने कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान यूनिफॉर्म सिविल कोड की अवधारणा की बात करता है, न कि कॉमन सिविल कोड की।
सिंधु जल संधि और पाकिस्तान पर भी दिया बयान
सिंधु जल संधि और आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के रुख को लेकर पूछे गए सवाल पर मनीष तिवारी ने कहा कि इस विषय पर देश की नीति लंबे समय से स्पष्ट और स्थिर रही है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1994 और 2013 में संसद ने इस संबंध में प्रस्ताव पारित किए थे, जिनमें भारत का स्पष्ट दृष्टिकोण सामने रखा गया था।
तिवारी ने आगे कहा कि पिछले वर्ष 7 मई से 10 मई के बीच पाकिस्तान के खिलाफ हुई कार्रवाई के बाद जब भारत के प्रतिनिधिमंडल ने विभिन्न देशों का दौरा किया, तब भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने स्पष्ट रूप से यह संदेश रखा गया कि पाकिस्तान आतंकवाद को संरक्षण देता है और आतंकवाद तथा वार्ता दोनों एक साथ नहीं चल सकते।
उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर देश के भीतर व्यापक राष्ट्रीय सहमति मौजूद है कि "खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।" उनके अनुसार, सरकार को इसी राष्ट्रीय सहमति के अनुरूप अपनी नीति को प्रभावी ढंग से लागू करना चाहिए और आतंकवाद के खिलाफ अपने रुख पर मजबूती से आगे बढ़ना चाहिए।













