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जंतर-मंतर पर चेहरा क्यों छिपा रहे हैं 'कॉकरोच'? दिल्ली पुलिस की AI वैन बनी वजह

दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी छात्र आंदोलन के दौरान AI और फेशियल रिकग्निशन तकनीक से लैस दिल्ली पुलिस की निगरानी वैन चर्चा में है। हाईटेक सर्विलांस के चलते कई प्रदर्शनकारी चेहरा ढककर प्रदर्शन करते नजर आए।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Fri, 24 Jul 2026 2:16:02

जंतर-मंतर पर चेहरा क्यों छिपा रहे हैं 'कॉकरोच'? दिल्ली पुलिस की AI वैन बनी वजह

दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर जारी छात्र आंदोलन के बीच एक अलग तस्वीर भी देखने को मिल रही है। प्रदर्शन में शामिल कई छात्र और अन्य प्रदर्शनकारी अपने चेहरे मास्क, स्कार्फ या पोस्टर से ढककर नजर आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि इसकी बड़ी वजह दिल्ली पुलिस द्वारा प्रदर्शन स्थल के आसपास की गई हाईटेक निगरानी व्यवस्था है। दावा किया जा रहा है कि पुलिस ने यहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और फेशियल रिकग्निशन तकनीक से लैस विशेष निगरानी वैन तैनात की हैं, जिनकी मदद से प्रदर्शनकारियों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है।

जंतर-मंतर के समीप स्थित केरल हाउस के बाहर दिल्ली पुलिस की दो आधुनिक सर्विलांस वैन मौजूद हैं। इनमें एक बड़ी वैन को मोबाइल कमांड एंड कंट्रोल व्हीकल कहा जाता है, जबकि दूसरी छोटी वैन का नाम 'इक्षण' है। संस्कृत भाषा में 'इक्षण' का अर्थ होता है देखना या दृष्टि। इस विशेष वैन में मौजूद पुलिस अधिकारी AI आधारित तकनीक के जरिए लाइव सीसीटीवी फुटेज का विश्लेषण करते हैं। बताया जाता है कि यह सॉफ्टवेयर कैमरे में दिखाई देने वाले प्रत्येक चेहरे की पहचान करते हुए उसके चारों ओर एक हरा बॉक्स बनाता है और फिर उसे पुलिस के उपलब्ध आपराधिक डेटाबेस से मिलान करता है।

दिल्ली पुलिस ने इस 'इक्षण' वैन को वर्ष 2023 में नई दिल्ली में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन से पहले अपने बेड़े में शामिल किया था। यह अत्याधुनिक निगरानी प्रणाली 360 डिग्री व्यू देने वाले आठ हाई-रिजॉल्यूशन फिक्स्ड कैमरों से लैस है। इन कैमरों से प्राप्त फुटेज की निगरानी प्रशिक्षित सीसीटीवी ऑपरेटर और तकनीकी विशेषज्ञ लगातार करते हैं, ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत नजर रखी जा सके।

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि प्रदर्शन स्थल पर लाइव फेशियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। अधिकारी के अनुसार, पुलिस के पास अपराधियों का विस्तृत डेटाबेस उपलब्ध है और उसी के आधार पर कैमरों से मिलने वाले फुटेज का मिलान किया जाता है। उनका कहना था कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई वांछित अपराधी या असामाजिक तत्व भीड़ का फायदा उठाकर कानून-व्यवस्था को प्रभावित न कर सके।

निगरानी से असहज महसूस कर रहे छात्र

हालांकि, इस हाईटेक निगरानी व्यवस्था ने आंदोलन में शामिल कई छात्रों के बीच चिंता और असहजता भी बढ़ा दी है। बड़ी संख्या में छात्र अपने भविष्य, करियर और संभावित पुलिस प्रोफाइलिंग को लेकर आशंकित दिखाई दे रहे हैं। इसी वजह से कई प्रदर्शनकारी अपने चेहरे को मास्क, स्कार्फ या हाथों में पकड़े पोस्टरों से ढककर प्रदर्शन में शामिल हो रहे हैं, ताकि उनकी पहचान सार्वजनिक न हो सके।

राजस्थान से आए एक छात्र, जो यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं, ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा कि उन्होंने आंदोलन के लिए कई प्रभावशाली पोस्टर तैयार किए थे, लेकिन कैमरों की लगातार रिकॉर्डिंग और फेशियल रिकग्निशन तकनीक की जानकारी मिलने के बाद उन्हें अपना चेहरा छिपाना पड़ रहा है। उनका कहना था कि वे सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं और किसी भी तरह से पुलिस डेटाबेस का हिस्सा बनने का जोखिम नहीं लेना चाहते।

वहीं, एक अन्य छात्रा ने भी अपनी चिंता साझा करते हुए कहा कि यदि प्रदर्शन के दौरान पोस्टर हाथ में लिए या नारे लगाते हुए उनकी तस्वीरें या वीडियो उनके परिवार तक पहुंच जाते हैं, तो उन्हें कई तरह के सवालों का सामना करना पड़ सकता है। उनका कहना था कि इसी आशंका के चलते कई छात्र आंदोलन में शामिल होने के बावजूद अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं होने देना चाहते।

डेटा कितने समय तक रखा जाएगा, इस पर स्पष्ट नीति नहीं

पुलिस सूत्रों के अनुसार, प्रदर्शन स्थल से एकत्र की गई वीडियो रिकॉर्डिंग और अन्य डिजिटल डेटा को कितने समय तक सुरक्षित रखा जाएगा, इसे लेकर फिलहाल कोई तय समय-सीमा या स्पष्ट दिशा-निर्देश मौजूद नहीं हैं। अधिकारियों का कहना है कि यदि प्रदर्शन के दौरान या उसके बाद कोई कानून-व्यवस्था से जुड़ी घटना सामने आती है, तो कई महीनों बाद भी जांच एजेंसियों को इस फुटेज की आवश्यकता पड़ सकती है। इसी कारण यह निश्चित रूप से नहीं बताया जा सकता कि रिकॉर्ड किया गया डेटा सिस्टम में कितने समय तक सुरक्षित रहेगा।

हाईकोर्ट पहुंचा निगरानी का मुद्दा

दिल्ली पुलिस की इस हाईटेक निगरानी व्यवस्था को लेकर अब कानूनी बहस भी शुरू हो गई है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (JNUSU) की पूर्व अध्यक्ष आइशी घोष ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पुलिस पर लगातार, व्यापक और अत्यधिक निगरानी रखने का आरोप लगाया है। याचिका में कहा गया है कि प्रदर्शन स्थल पर स्थायी निगरानी टावर स्थापित करना और लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग करना नागरिकों के निजता के अधिकार, गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

अदालत में सरकार का पक्ष

20 जुलाई को हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दिल्ली हाईकोर्ट के सामने स्पष्ट किया कि जंतर-मंतर पर की जा रही वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी का उद्देश्य किसी व्यक्ति की जासूसी करना नहीं है। उन्होंने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने, सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसी भी संभावित अप्रिय घटना को रोकने के लिए अपनाई जा रही है।

AI निगरानी पर उठ रहे हैं सवाल

गौरतलब है कि वर्ष 2022 में एक आरटीआई के जवाब में दिल्ली पुलिस ने बताया था कि उसका फेशियल रिकग्निशन सिस्टम किसी व्यक्ति की पहचान को तब "पॉजिटिव मैच" मानता है, जब सॉफ्टवेयर की सटीकता 80 प्रतिशत या उससे अधिक होती है। हालांकि, नागरिक अधिकारों से जुड़े कई संगठनों का कहना है कि AI आधारित निगरानी तकनीकों का उपयोग बिना किसी व्यापक और स्पष्ट कानूनी ढांचे के किया जाना लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक स्वतंत्रताओं के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकता है। उनका मानना है कि ऐसी तकनीकों के इस्तेमाल के लिए स्पष्ट नियम, जवाबदेही और निजता की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले कानूनी प्रावधान आवश्यक हैं।

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