
कर्नाटक कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक के.एन. राजन्ना ने शनिवार को अपनी ही सरकार के ताजा आदेश पर कड़ा सवाल खड़ा कर दिया। यह आदेश सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक स्थलों पर बिना अनुमति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की गतिविधियों पर रोक लगाने से जुड़ा है। राजन्ना का कहना है कि सरकार को इस फैसले की व्यावहारिकता पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा, “देखना यह है कि यह आदेश वास्तव में जमीन पर कितना लागू हो सकता है, क्योंकि कई बार ऐसे नियम सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं।”
पूर्व मंत्री राजन्ना, जिन्हें कुछ माह पहले कैबिनेट से हटा दिया गया था, ने कहा कि किसी भी सरकार को ऐसे ही नियम नहीं बनाने चाहिए जो केवल दिखावे के लिए हों। उनके अनुसार, “ऐसे नियमों का कोई मतलब नहीं जो लागू ही न हो पाएं, क्योंकि वे सिर्फ प्रशासनिक बोझ बढ़ाते हैं और जनता में भ्रम फैलाते हैं।”
राजन्ना ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार का यह कदम मंत्री प्रियंक खड़गे के पत्र पर आधारित है, जिसमें सिर्फ इतना कहा गया था कि आरएसएस को सार्वजनिक जगहों पर किसी भी कार्यक्रम से पहले अनुमति लेनी चाहिए। उन्होंने कहा, “प्रियंक खड़गे ने कहीं भी आरएसएस की गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात नहीं कही थी, लेकिन अब इसे उसी रूप में पेश किया जा रहा है।”
विधायक ने आगे सवाल उठाया, “अब सवाल यह है कि क्या यही नियम बाकी समुदायों पर भी लागू होंगे? उदाहरण के लिए, हमारे पास ईदगाह हैं, और मुस्लिम भाई सड़क पर नमाज अदा करते हैं। क्या वे अनुमति लेते हैं? अगर अब उनसे अनुमति लेने को कहा जाएगा, तो क्या वे मान जाएंगे?”
गौरतलब है कि गुरुवार को कर्नाटक मंत्रिमंडल ने फैसला लिया था कि सरकारी संपत्तियों और सार्वजनिक सड़कों पर आयोजित किसी भी संगठन की गतिविधियों, विशेषकर आरएसएस के मार्च और कार्यक्रमों के लिए, अनुमति से जुड़ी नई प्रक्रिया बनाई जाएगी। सरकार का कहना है कि यह कदम सार्वजनिक व्यवस्था और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
हालांकि, राजन्ना के बयान ने अब कांग्रेस सरकार के भीतर ही असहमति की आवाज़ें तेज़ कर दी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस आदेश के क्रियान्वयन और इससे उत्पन्न सामाजिक-राजनीतिक प्रतिक्रियाओं से कैसे निपटती है।














