किशोर बच्चे की चुप्पी हो सकती हैं खतरनाक, इन बातों से करें उन्हें समझने की कोशिश

By: Ankur Thu, 25 Nov 2021 6:25 PM

किशोर बच्चे की चुप्पी हो सकती हैं खतरनाक, इन बातों से करें उन्हें समझने की कोशिश

बच्चों की किशोरावस्था बेहद महत्वपूर्ण होती हैं जब उनके शरीर में कई बदलाव होने के साथ ही विचारों में भी कई परिवर्तन देखने को मिलते हैं जो उनके व्यवहार में झलकते हैं। टीनएज बच्चे से पेरेंट्स का रिश्ता कैसा हैं यह बहुत मायने रखता हैं क्योंकि इस दौरान उनकी खामोशी उनके भविष्य के लिए घातक साबित हो सकती हैं। माता-पिता को बच्चे के मन की बातें जानने के लिए कई तरह के जतन करने पड़ते हैं। बच्चों की चुप्पी पैरेंट्स को सोचने पर मजबूर कर देती हैं और उनके लिए साइलेंट किलर का काम करती है। ऐसे में आज हम आपके लिए कुछ ऐसी बातें लेकर आए हैं जिनकी मदद से आपको बच्चों को समझने में मदद मिलेगी और बच्चों से रिश्तों में सुधार आएगा। तो आइये जानते हैं इसके बारे में।

पर्सनल स्पेस


बच्चों को जितनी अपने पैरेंट्स की ज़रूरत होती है, उतनी ही अपने पर्सनल स्पेस की भी। उन्हें इतनी आज़ादी ज़रूर दें कि वे अपने छोटे-छोटे फैसले ख़ुद कर सकें। इससे उनमें आत्मविश्‍वास आएगा। उनका मार्गदर्शन करें, पर अपने फैसले उन पर न थोपें। बच्चों पर जितनी बंदिशें लगाएंगे, वे उतने ही अपनी बातें शेयर करने से कतराते हैं। उन्हें लगने लगता है कि पैरेंट्स से बातें शेयर करना बेकार है। वे उन्हें समझेंगे नहीं, तो वे चुप्पी को अपना विरोध जताने का हथियार बना लेते हैं।

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असीमित उम्मीदें

जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगते हैं, पैरेंट्स की उम्मीदें भी बढ़ने लगती हैं। वे अपनी अधूरी इच्छाओं को उनके ज़रिए पूरा करना चाहते हैं। बच्चे जब उन उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाते हैं, तो वे अपने और पैरेंट्स के बीच दूरी बनाने लगते हैं। यहीं से शुरू होता है संवादहीनता का सिलसिला। अगर आपका बच्चा भी चुप रहने लगे, तो आप उससे कोई उम्मीद न करें, बल्कि उस दूरी को कम करने की कोशिश करें।

डांटें-फटकारें नहीं


छोटा बच्चा पैरेंट्स से हर बात शेयर करता है, लेकिन अक्सर वे उसे झिड़ककर या डांटकर चुप करा देते हैं। नतीजतन बच्चा पैरेंट्स से बातें छुपाने लगता है। पैरेंट्स को पता ही नहीं चलता। धीरे-धीरे वह पैरेंट्स से दूरी बनाना शुरू कर देता है। तुलना कर देती है कुंठित अधिकतर पैरेंट्स बच्चे की तुलना उसके दूसरे भाई-बहन या दोस्तों से करते हैं या फिर रिश्तेदारों के सामने ही उनकी कमियों-ख़ूबियों का बखान करने लगते हैं, जो सही नहीं है। हर बच्चे की क्षमता और सामर्थ्य अलग-अलग होती है। पैरेंट्स को ध्यान रखना चाहिए कि ज़्यादा तारीफ़ और ज़्यादा आलोचना दोनों ही बच्चे के लिए ठीक नहीं हैं। पैरेंट्स का कर्त्तव्य है कि उनमें जितनी योग्यता और क्षमता है, उसे निखारने में उनकी मदद करें। उन्हें एहसास कराएं कि वे हर पल उनके साथ हैं।

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बच्चे को सोशल बनाएं

सिंगल चाइल्ड के बढ़ते कॉन्सेप्ट और वर्किंग पैरेंट्स होने के कारण बच्चा मेड के भरोसे पलता है या अकेले। ऐसे में उसका दायरा बहुत सीमित हो जाता है। सुरक्षा की दृष्टि से पैरेंट्स उसे घर से अकेले बाहर नहीं जाने देते हैं। नतीजा यह होता है कि वह सोशल नहीं बन पाता है। वह दूसरे बच्चों के साथ घुलना-मिलना नहीं जानता। अपनी बातें मन में दबाए रखता है, लेकिन वर्किंग पैरेंट्स के पास उसकी बातें सुनने का समय नहीं होता।

हमउम्र बच्चों के साथ बिताने दें समय


भावनाओं को व्यक्त न कर पाने की स्थिति में धीरे-धीरे वह अपने में ही सिमटता जाता है। अगर वह कुछ कहना भी चाहता है, तो पैरेंट्स के पास सुनने का समय नहीं होता। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, तो हो सकता है उसमें बदलाव आए, पर ऐसा तभी संभव है जब वह सोशल हो और बाहरी दुनिया के साथ तालमेल बिठा सके। उसकी चुप्पी का लावा जब फूटता है, तो उसका नतीज़ा बहुत ख़तरनाक हो सकता है। बेहतर होगा कि बच्चे को उसके हमउम्र बच्चों के साथ समय बिताने दें।

कहीं वह चाइल्ड एब्यूज़ का शिकार तो नहीं?


बच्चा अगर अचानक चुप रहने लगे, तो पैरेंट्स जानने की कोशिश करें कि कहीं वह चाइल्ड एब्यूज़ का शिकार तो नहीं है। मनोवैज्ञानिक नीलम पंत का कहना है कि चाइल्ड एब्यूज़ का हल ढूंढ़ने की राह पैरेंट्स से शुरू होती है और वहीं ख़त्म भी। अगर बच्चा पैरेंट्स को अपने साथ हुई किसी घटना के बारे में बताना चाहता है, तो उसे डांटने-फटकारने की जगह उसकी बात सुनें। अपने स्तर पर छानबीन करने की कोशिश करें। पैरेंट्स को यह समझना ज़रूरी है कि चाइल्ड एब्यूज़ एक बहुत बड़ी समस्या है और इसका शिकार कोई भी बच्चा हो सकता है।

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