
आमिर खान की फिल्म ‘सितारे ज़मीन पर’ ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया है और अपने टारगेट ऑडियंस के बीच सराही भी गई है, इसके बावजूद ट्रेड सर्किट और सोशल मीडिया के एक हिस्से में इसकी सफलता को लेकर चुप्पी देखी जा रही है। ट्रेड एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई लोगों ने जानबूझकर फिल्म को फ्लॉप साबित करने की कोशिश की।
यह सिलसिला एक बार फिर इस बात की ओर इशारा करता है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री अब ‘क्लैन्स’ और ‘पीआर कैम्पेन’ की राजनीति में उलझती जा रही है, जहां फिल्मों की गुणवत्ता से ज्यादा अहमियत इस बात की होती है कि वह किस खेमे से जुड़ी है।
ट्रेड में क्यों नहीं हो रही खुलेआम सराहना?
जाने-माने ट्रेड एनालिस्ट तरन आदर्श ने कहा, “बिजनेस से जुड़े लोगों—डिस्ट्रीब्यूटर्स और एग्ज़िबिटर्स—को पता है कि फिल्म ने अच्छा काम किया है। लेकिन सोशल मीडिया या अन्य हलकों में इसे स्वीकारने में हिचक है।”
उन्होंने यह भी माना कि आज के डिजिटल युग में नेगेटिविटी पर कंट्रोल करना नामुमकिन है। कोई भी बिना ठोस कारण के किसी भी फिल्म के खिलाफ माहौल बना सकता है।
राज बंसल बोले: "PR एजेंसियां भी बनाती हैं खेल"
डिस्ट्रीब्यूटर और एग्ज़िबिटर राज बंसल ने कहा, “शुरुआत से ही इस फिल्म को लेकर हिचक थी। आज के समय में हिंदी सिनेमा खेमों में बंट चुका है। हर एक्टर का एक अलग पीआर सिस्टम है, जो दूसरे स्टार्स की फिल्मों को नीचे गिराने की कोशिश करता है।”
उन्होंने आगे कहा कि, “लोगों ने फिल्म के बजट को लेकर गलत जानकारी भी फैलाई। असल में इस फिल्म की लागत 40 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं है। लेकिन कुछ लोगों ने इसे फ्लॉप साबित करने की होड़ में आंकड़ों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया।”
गिरीश जौहर का विश्लेषण: "हम आलोचना में उलझ गए हैं"
प्रोड्यूसर और फिल्म बिजनेस एनालिस्ट गिरीश जौहर का मानना है कि इंडस्ट्री में सफलता को स्वीकार करने का धैर्य अब नहीं रहा। उनके अनुसार: “हम इतने फेल्योर के आदी हो गए हैं कि जब कोई फिल्म ठीक-ठाक भी करती है, तो उसे स्वीकारना मुश्किल लगता है। हम बहुत संदेहपूर्ण समय में जी रहे हैं।” उन्होंने कहा कि फिल्म की सबसे बड़ी वैलिडेशन उसका ऑडियंस रिस्पॉन्स है—अगर जनता उसे पसंद कर रही है, तारीफ कर रही है, तो ट्रेड की चुप्पी मायने नहीं रखती।
वास्तविकता क्या है?
ट्रेड विश्लेषण के अनुसार: फिल्म ‘सितारे ज़मीन पर’ ने अपनी लागत से बेहतर प्रदर्शन किया है। दर्शकों से इसे सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती रही है इंटरनल इंडस्ट्री पॉलिटिक्स, न कि इसकी कंटेंट या एक्टिंग।
‘सितारे ज़मीन पर’ एक ऐसी फिल्म बनकर उभरी है जिसने न सिर्फ आमिर खान की वापसी को मजबूत किया, बल्कि यह भी दिखाया कि कंटेंट अभी भी मायने रखता है, चाहे सोशल मीडिया ट्रेंड्स कुछ भी कहें। लेकिन इंडस्ट्री में बने "कैम्प्स" और "पीआर एजेंसियों की चुप लड़ाई" ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि फिल्म की सफलता के पैमाने अब सिर्फ बॉक्स ऑफिस नंबर नहीं, बल्कि कौन-किसके साथ है इस पर भी तय होते हैं।














