
प्रभास की आगामी फिल्म ‘स्पिरिट’ का ऑडियो टीज़र उनके जन्मदिन के मौके पर जारी किया गया। इसमें बिना किसी दृश्य के केवल आवाज़ के सहारे एक जबरदस्त ड्रामा खड़ा किया गया है। इस बातचीत में प्रभास एक ऐसे पुलिस अधिकारी के रूप में उभरते हैं, जिसकी मर्दानगी और बहादुरी की कोई सीमा नहीं। टीज़र के अंत में उनकी भारी आवाज़ सुनाई देती है—“मिस्टर सुपरिटेंडेंट, बचपन से मेरी एक बुरी आदत है।” सोशल मीडिया पर #OneBadHabit ट्रेंड बन गया।
चूंकि यह फिल्म संदीप रेड्डी वांगा के निर्देशन में बनी है, जिन्होंने ‘अर्जुन रेड्डी’, ‘कबीर सिंह’ और ‘एनिमल’ जैसी विवादास्पद फिल्मों में पुरुषों की आक्रामक और ‘टॉक्सिक’ छवि पेश की थी, इसलिए दर्शक पहले से ही उत्सुक और आशंकित हैं कि कहीं ‘स्पिरिट’ भी उसी राह पर न चल पड़े।
सिनेमा में लौटती मर्दानगी और टॉक्सिसिटी
यह कहना जल्दबाजी होगी कि ‘स्पिरिट’ में प्रभास भी उसी ‘टॉक्सिक’ हीरो क्लब का हिस्सा बनेंगे या वांगा इस बार अपनी छवि से हटकर प्रभास की सुपरस्टार लोकप्रियता को ध्यान में रखेंगे। लेकिन एक बात साफ है—मुख्यधारा का सिनेमा एक बार फिर ज़हरीली मर्दानगी के पुराने जाल में लौटता दिख रहा है।
दीवाली पर रिलीज़ हुई ‘एक दीवाने की दीवानियत’ में हर्षवर्धन राणे का किरदार एक जुनूनी प्रेमी के रूप में सामने आया जो सोनम बाजवा के किरदार का पीछा करता रहता है। वहीं आनंद एल. राय की अगली फिल्म ‘तेरे इश्क में’ में धनुष का किरदार एक ठुकराया प्रेमी है जो कृति सेनन के किरदार को ‘सजा देने’ के लिए उसके पीछे पड़ा है। टीज़र में वह कहता है, “नई ज़िंदगी शुरू कर रही है, पुराने पाप तो धो ले,” और उसके सिर पर गंगाजल उड़ेल देता है।
‘एनिमल’ सिंड्रोम का असर
रणबीर कपूर की 2023 की फिल्म ‘एनिमल’ ने इस प्रवृत्ति को और बल दिया। रणबीर का किरदार रणविजय सिंह अपने पिता के प्रेम की कमी से एक हिंसक, स्त्री-विरोधी इंसान बन जाता है। फिल्म में वह नायिका से कहता है कि उसका “बड़ा पेल्विस है”, जो ‘हेल्दी बच्चों’ के लिए उपयुक्त है। इस संवाद को लेकर खूब विवाद हुआ, लेकिन फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 900 करोड़ से अधिक की कमाई की। नतीजा यह हुआ कि ‘एनिमल’ के बाद कई फिल्में उसी तरह के ‘एंटी-हीरो’ को केंद्र में रखकर बन रही हैं—यहां तक कि ‘एनिमल पार्क’ नाम से इसका सीक्वल भी 2027 में शुरू होने की खबर है।
‘एनिमल’ से पहले वांगा ने ‘कबीर सिंह’ और ‘अर्जुन रेड्डी’ के जरिए यह रास्ता बनाया था, जहां हीरो प्रेम में असफल होने के बाद हिंसा और आत्मविनाश की राह पकड़ता है। यह दुखद प्रेमकथा ‘देवदास’ जैसी क्लासिक थीम से मिलती-जुलती तो थी, मगर उसे देखने का नज़रिया पूरी तरह बदल चुका था—अब वह प्रेम का नहीं, मर्दानगी का प्रतीक बन गया था।
लव रंजन का ‘टॉक्सिक ह्यूमर’
इसी धारा में एक और नाम है—लव रंजन। 2011 में आई उनकी फिल्म ‘प्यार का पंचनामा’ ने तीन युवकों की प्रेम में ‘नाकामी’ और स्त्रियों के प्रति कटाक्षपूर्ण दृष्टिकोण को हंसी के रूप में परोसा। यह फिल्म सफल रही और इसके बाद उन्होंने ‘प्यार का पंचनामा 2’, ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ और ‘तू झूठी मैं मक्कार’ जैसी फिल्मों से वही फॉर्मूला दोहराया।
अब उनका नया प्रोजेक्ट ‘दे दे प्यार दे 2’ फिर उसी दिशा में बढ़ता दिख रहा है। इस फिल्म में अजय देवगन एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति हैं जो अपने से काफी छोटी लड़की (रकुल प्रीत सिंह) से प्रेम करते हैं। 2019 की पहली किस्त की तरह इस बार भी उम्र के अंतर वाले रिश्ते और ‘पुरुष वर्चस्व’ को रोमांटिक अंदाज़ में दिखाया गया है।
टॉक्सिसिटी का पुराना इतिहास
अगर थोड़ा पीछे जाएं तो बॉलीवुड के इतिहास में ‘टॉक्सिक हीरो’ कोई नई बात नहीं है। सत्तर और अस्सी के दशक में हीरो का नायिका से ‘छेड़छाड़ वाला गीत’ फिल्म का जरूरी हिस्सा होता था। अक्सर कहानी में गरीब हीरो अमीर, घमंडी लड़की को ‘सुधार’ देता था, जो आखिर में प्रेम में पड़कर उसकी झोपड़ी में आ बसती थी।
2010 के दशक में ‘रांझणा’, ‘ये जवानी है दीवानी’ और ‘रामलीला’ जैसी फिल्मों में भी नायक का प्रेम जुनून की हदें पार करता दिखा। यह ‘पुरुष प्रभुत्व’ का एक ग्लैमरस रूप था, जिसे दर्शकों ने रोमांस समझकर स्वीकार किया।
क्यों लौट रहा है टॉक्सिक हीरो?
इस सवाल का सबसे आसान जवाब है—बॉक्स ऑफिस लॉजिक। जब इंडस्ट्री लगातार असफल फिल्मों से जूझ रही हो, तब वह वही दिखाती है जो बिकता है। ‘एनिमल’ ने 915 करोड़, ‘कबीर सिंह’ ने 377 करोड़ और ‘एक दीवाने की दीवानियत’ ने भी अपने 25 करोड़ के बजट पर 43 करोड़ से ज्यादा की कमाई की।
संख्या ही सब कुछ कहती है। आज के समय में जब इंस्टाग्राम रील्स पर चंद सेकंड में हिंसा, प्रेम और जुनून सब कुछ मिल जाता है, तब बड़े पर्दे पर उसी ‘एड्रेनालिन’ को परोसना दर्शकों को खींचने का आसान जरिया बन गया है।
मुख्यधारा का भारतीय सिनेमा एक बार फिर उस दौर में लौट रहा है जहां मर्दानगी को ‘माचो स्वैग’ और स्त्रियों के प्रति हिंसक रवैये को ‘पैशन’ के रूप में बेचा जा रहा है। प्रभास की ‘स्पिरिट’ चाहे इस प्रवृत्ति को दोहराए या उससे अलग राह दिखाए, पर इतना तय है कि ‘टॉक्सिक हीरो’ अब सिर्फ एक किरदार नहीं, बल्कि सिनेमा के लिए ‘सेलिंग पॉइंट’ बन चुका है।














