सनी देओल को पर्दे पर देखते ही दर्शकों के जेहन में सबसे पहले क्या आता है? एक ऐसा अभिनेता जिसकी भारी आवाज, आंखों का गुस्सा, दमदार संवाद और जबरदस्त एक्शन लंबे समय से उसकी पहचान रहे हैं। 'ढाई किलो का हाथ' से लेकर 'तारीख पर तारीख' और 'गदर' के तारा सिंह तक सनी देओल ने अपनी एक ऐसी छवि बनाई, जिसे बदलने की कोशिश करना भी आसान नहीं था। लेकिन 'बंटवारा 1947' में राजकुमार संतोषी ने सनी देओल के उसी स्थापित व्यक्तित्व के साथ वह प्रयोग किया है, जो शायद अब तक किसी निर्देशक ने इतनी गहराई से नहीं किया।
यहां सनी देओल सिर्फ मारते-पीटते, दहाड़ते या बड़े-बड़े संवाद बोलते अभिनेता नहीं हैं। यहां उनका हथियार उनका गुस्सा नहीं, बल्कि उनकी आंखें हैं। उनकी खामोशी बोलती है, चेहरे पर उभरती बेचैनी कहानी कहती है और कई ऐसे दृश्य हैं जहां बिना किसी जोरदार संवाद के सनी दर्शक तक वह दर्द पहुंचा देते हैं, जिसे महसूस करना आसान नहीं है। यही 'बंटवारा 1947' की सबसे बड़ी उपलब्धि और सनी देओल के करियर के सबसे दिलचस्प अभिनय प्रयोगों में से एक बन जाती है।
राजकुमार संतोषी ने सनी की ताकत को खत्म नहीं किया, बल्कि उनकी ताकत का एक बिल्कुल अलग इस्तेमाल किया है। जिस अभिनेता को दर्शक पर्दे पर दुश्मनों की धुनाई करते देखने के आदी रहे हैं, उसी अभिनेता को यहां टूटते हुए रिश्तों, उजड़ते घरों और बंटते परिवारों के बीच खड़ा कर दिया गया है। सनी का किरदार जब चिल्लाता नहीं, तब भी उसकी तकलीफ सुनाई देती है। जब वह हाथ नहीं उठाता, तब भी भीतर चल रहा संघर्ष दिखाई देता है। और यही वह जगह है जहां सनी देओल अपने स्टारडम से बाहर निकलकर एक अभिनेता के रूप में दिखाई देते हैं।
सनी देओल के लिए 'बंटवारा 1947' क्यों खास है?
सनी देओल के करियर में कई यादगार भूमिकाएं रही हैं, लेकिन उनके किरदारों का एक बड़ा हिस्सा उनकी मजबूत और आक्रामक छवि के आसपास ही घूमता रहा है। दर्शकों ने उन्हें एक्शन करते देखा, दुश्मनों को चुनौती देते देखा और उनकी आवाज में गुस्से की ताकत महसूस की। 'गदर' ने तो उनकी इस छवि को लगभग स्थायी पहचान दे दी।
लेकिन 'बंटवारा 1947' में संतोषी ने उसी अभिनेता से भावनाओं का वह संसार खुलवाने की कोशिश की है, जिसे उनकी पिछली फिल्मों में उतनी जगह नहीं मिली। यहां उनका दर्द अंदर दबा हुआ है। वह परिस्थितियों से लड़ना चाहते हैं, लेकिन हर समस्या का समाधान ताकत से नहीं निकाला जा सकता। विभाजन का समय ही ऐसा था जहां आदमी अपने सामने अपने घर, रिश्ते और भरोसे को टूटता हुआ देख रहा था।
सनी इस बेबसी को बहुत प्रभावी ढंग से निभाते हैं। उनकी आंखों में गुस्से से ज्यादा चिंता दिखाई देती है। उनके चेहरे पर जीत की खुशी से ज्यादा किसी अपने को खो देने का डर दिखाई देता है। यही बदलाव दर्शक को चौंकाता है।
सनी देओल की तारीफ सिर्फ इसलिए नहीं होनी चाहिए कि वह लंबे समय बाद एक अलग तरह की भूमिका में दिखाई दिए हैं। तारीफ इसलिए भी बनती है क्योंकि उन्होंने अपनी स्थापित छवि को खुद पीछे छोड़ने का साहस दिखाया है।
एक अभिनेता के लिए अपनी सबसे सफल छवि से बाहर निकलना आसान नहीं होता। खासकर तब, जब दर्शक उससे एक खास तरह के अभिनय की उम्मीद करने लगें। सनी ने यहां उस उम्मीद को चुनौती दी है।
कई दृश्यों में उनकी आवाज का उतार-चढ़ाव, संवाद बोलने का तरीका और चेहरे के भाव बताते हैं कि वह किरदार को केवल निभा नहीं रहे, बल्कि उसकी मानसिक स्थिति को समझने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ दृश्यों में उनकी चुप्पी ही संवाद बन जाती है।
यही वह सनी देओल हैं जिन्हें शायद दर्शकों ने लंबे समय बाद इस तरह देखा है।
संतोषी ने सनी से क्या करवाया?
राजकुमार संतोषी और सनी देओल की जोड़ी पहले भी यादगार काम कर चुकी है, लेकिन 'बंटवारा 1947' में दोनों का रिश्ता केवल अभिनेता और निर्देशक का नहीं रह जाता। संतोषी ने सनी के स्टारडम को कहानी के लिए इस्तेमाल करने के बजाय उसे कहानी के पीछे रखा है। यह एक महत्वपूर्ण फैसला है।
फिल्म में सनी देओल का नाम अपने आप में दर्शक खींचने के लिए काफी है, लेकिन संतोषी ने उन्हें ऐसा किरदार दिया है जहां स्टार सनी देओल से ज्यादा महत्व उस इंसान को दिया गया है, जो 1947 की उथल-पुथल में अपने आसपास की दुनिया को टूटते हुए देख रहा है।
यही वजह है कि फिल्म के कई दृश्यों में आपको 'सनी देओल' नहीं, बल्कि उनका किरदार दिखाई देता है। किसी अभिनेता के लिए इससे बड़ी उपलब्धि क्या होगी कि दर्शक कुछ देर के लिए उसकी स्टार छवि भूल जाए और उसके किरदार के साथ जुड़ जाए?
'गदर' के बाद सबसे बड़ा बदलाव
यहां 'गदर' का जिक्र स्वाभाविक
है। विभाजन की पृष्ठभूमि और सनी देओल होने के कारण दर्शक दोनों फिल्मों की
तुलना करेंगे। लेकिन दोनों फिल्मों का मिजाज बिल्कुल अलग है।
'गदर'
में सनी का तारा सिंह अपने परिवार और प्रेम के लिए पूरी व्यवस्था से भिड़
जाता है। वहां उनका गुस्सा कहानी की ऊर्जा है। 'बंटवारा 1947' में वही सनी
एक ऐसी दुनिया में खड़े हैं जहां हर तरफ अनिश्चितता है और हर फैसला किसी
रिश्ते की कीमत मांगता है। इसलिए यहां ताकत दिखाने से ज्यादा जरूरी है दर्द
को महसूस करना।
और सनी देओल ने इस बदलाव को स्वीकार किया है।
यही
कारण है कि 'बंटवारा 1947' को केवल एक और विभाजन आधारित फिल्म या सनी देओल
की एक और फिल्म कहकर नहीं देखा जाना चाहिए। यह उनके अभिनय की छवि में
बदलाव की कोशिश भी है।













