
मनोज बाजपेयी स्टारर वेब सीरीज उस वक्त से सुर्खियों में आ गई, जब इसके मेकर्स ने Netflix के ‘नेक्स्ट ऑन नेटफ्लिक्स 2026’ इवेंट के दौरान इसका पहला टीज़र पेश किया। शुरुआती झलक सामने आते ही यह प्रोजेक्ट चर्चा में आ गया, लेकिन वजह कहानी या कलाकार नहीं बल्कि इसका टाइटल बना। ‘पंडित’ जैसे सम्मानजनक शब्द को ‘घूसखोर’ के साथ जोड़ने पर आपत्ति जताई जाने लगी और देखते ही देखते यह मामला विवाद का रूप ले बैठा।
गुरुवार को दिल्ली हाई कोर्ट में वेब सीरीज की रिलीज़ पर रोक लगाने की मांग को लेकर एक याचिका दाखिल की गई। इसी बीच FMC की ओर से मेकर्स और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स को टाइटल के कथित अनधिकृत इस्तेमाल को लेकर नोटिस भेजा गया। मामला यहीं नहीं रुका, लखनऊ में भी मेकर्स के खिलाफ FIR दर्ज की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि इस वेब सीरीज का नाम और कंटेंट धार्मिक व जातिगत भावनाओं को ठेस पहुंचाता है और सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा सकता है। बढ़ते दबाव के बाद मेकर्स ने ‘घूसखोर पंडित’ का टीज़र यूट्यूब से हटा लिया।
टीज़र हटाया गया, लेकिन चर्चा नहीं थमी
टीज़र हटाए जाने के बाद जब यूट्यूब पर ‘घूसखोर पंडित’ सर्च किया गया, तो स्क्रीन पर साफ संदेश दिखा—“यह वीडियो अपलोडर द्वारा हटा दिया गया है।” हालांकि वीडियो डिलीट होने के बावजूद उसकी चर्चा थमी नहीं। सोशल मीडिया पर लोग इसे खोज-खोजकर देखने लगे। मशहूर पैपराजी पेज योगेन शाह ने भी इस टीज़र को अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर किया, जिसके बाद यह और ज्यादा वायरल हो गया। फैंस और दर्शक अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर टीज़र में ऐसा क्या था, जिसने इतना बड़ा विवाद खड़ा कर दिया।
सोशल और लीगल जिम्मेदारी पर बहस
‘घूसखोर पंडित’ से जुड़ा विवाद एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि OTT प्लेटफॉर्म पर दिखाए जाने वाले कंटेंट की सामाजिक और कानूनी जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए। यह मामला इस बात को रेखांकित करता है कि क्रिएटिव फ्रीडम के साथ-साथ समाज के विभिन्न वर्गों की संवेदनशीलता का ध्यान रखना भी जरूरी है। इंडस्ट्री और दर्शकों के बीच इस मुद्दे पर दो राय साफ नजर आ रही है—एक वर्ग इसे रचनात्मक स्वतंत्रता का हिस्सा मान रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे सामाजिक शांति और सौहार्द के लिए खतरा बता रहा है।
कहां से शुरू हुआ पूरा विवाद
नेटफ्लिक्स के ‘नेक्स्ट ऑन नेटफ्लिक्स’ इवेंट में जैसे ही ‘घूसखोर पंडित’ का टीज़र सामने आया, विवाद ने जन्म ले लिया। मुंबई के वकील आशुतोष दुबे ने नेटफ्लिक्स और प्रोडक्शन टीम को कानूनी नोटिस भेजते हुए टाइटल पर आपत्ति जताई। नोटिस में कहा गया कि ‘घूसखोर’ शब्द आमतौर पर रिश्वत लेने वालों के लिए इस्तेमाल होता है, जबकि ‘पंडित’ शब्द धार्मिक विद्वानों, समाज में सम्मानित वर्ग और एक विशिष्ट समुदाय की पहचान से जुड़ा है। दोनों शब्दों का एक साथ इस्तेमाल अपमानजनक है और समुदाय विशेष की गरिमा को ठेस पहुंचाता है।
‘पंडित’ शब्द के इस्तेमाल पर कड़ा ऐतराज
लीगल नोटिस में यह भी कहा गया कि ‘पंडित’ शब्द भारतीय संस्कृति और परंपरा में गहरी जड़ें रखता है। यह विद्वता, नैतिक मूल्यों, आध्यात्मिक अधिकार और सामाजिक सम्मान का प्रतीक रहा है। नोटिस में तर्क दिया गया कि किसी सम्मानित समुदाय को भ्रष्टाचार जैसे शब्द से जोड़ना गलत संदेश देता है। भ्रष्टाचार किसी व्यक्ति की नैतिक कमजोरी हो सकता है, लेकिन उसे किसी पूरे समुदाय की पहचान के रूप में पेश नहीं किया जा सकता। ऐसे टाइटल से समाज में नकारात्मक और भड़काऊ माहौल बन सकता है।
नीरज पांडे ने दिया सफाई बयान
डायरेक्टर नीरज पांडे ने इस पूरे विवाद पर अपनी वेब सीरीज को लेकर आधिकारिक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “हमारी फिल्म पूरी तरह से एक फिक्शनल कॉप ड्रामा है। ‘पंडित’ शब्द का इस्तेमाल केवल एक काल्पनिक किरदार के उपनाम के तौर पर किया गया है। हम समझते हैं कि टाइटल से कुछ दर्शकों की भावनाएं आहत हुई हैं और हम उन भावनाओं का सम्मान करते हैं।” उन्होंने आगे बताया कि इन चिंताओं को ध्यान में रखते हुए फिलहाल सभी प्रमोशनल मटेरियल हटाने का फैसला लिया गया है। उनका कहना है कि किसी भी कंटेंट को पूरी कहानी के संदर्भ में समझा जाना चाहिए, न कि कुछ हिस्सों के आधार पर उसका आंकलन किया जाए।













