
हर व्यक्ति के लिए ईश्वर में आस्था और श्रद्धा के मायने अलग हो सकते हैं। किसी के लिए भगवान शक्ति का स्रोत होते हैं, तो किसी के लिए सुकून और सहारा। आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में जहां हर कोई मानसिक शांति की तलाश में है, वहीं कुछ लोग ध्यान और साधना का मार्ग अपनाते हैं, जबकि कई लोग मंदिर जाकर पूजा-पाठ और ईश्वर से जुड़ाव के माध्यम से उस शांति को महसूस करते हैं।
इस आध्यात्मिक यात्रा में कई बार ऐसी घटनाएं होती हैं जो यह यकीन दिलाती हैं कि ईश्वर हमारे आसपास ही मौजूद हैं। उनमें से एक अनुभव ऐसा है जो कई भक्तों को होता है — मंदिर में प्रवेश करते ही उनकी आंखें नम हो जाती हैं। कुछ लोग इसे इमोशनल कमजोरी समझ लेते हैं, लेकिन प्रेमानंद महाराज इसे एक विशेष आध्यात्मिक संकेत मानते हैं।
जब आस्था आंखों से झलकने लगे
प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज का मानना है कि जब कोई भक्त सच्चे हृदय से भगवान से जुड़ता है, तो उसका भावुक हो जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। यह रोना किसी दुःख का नहीं, बल्कि उस आत्मिक आनंद का प्रतीक होता है, जो व्यक्ति को ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव कराता है।
महाराज कहते हैं कि इस तरह के आंसू यह दिखाते हैं कि भक्त की साधना गहराई तक पहुंच चुकी है और उसका आत्मिक जुड़ाव ईश्वर से स्थापित हो चुका है। यह ईश्वर की कृपा का संकेत होता है और माना जाता है कि जब आंखें अपने आप भर आएं, तो समझिए भगवान ने आपकी पुकार सुन ली है और आपकी प्रार्थनाओं की पूर्ति अब दूर नहीं।
ईश्वर की उपस्थिति के और भी होते हैं संकेत
ऐसे भावनात्मक अनुभवों के अलावा, कुछ भौतिक घटनाएं भी भगवान के संकेत मानी जाती हैं। प्रेमानंद महाराज के अनुसार, यदि पूजा करते समय देवी-देवता की मूर्ति या तस्वीर से अचानक फूल गिर जाए, तो इसे बेहद शुभ माना जाता है।
यह संकेत दर्शाता है कि ईश्वर न केवल आपकी उपस्थिति से प्रसन्न हैं, बल्कि उन्होंने आपकी भक्ति को स्वीकार भी कर लिया है। कई बार यह भी माना जाता है कि इस संकेत के बाद कोई शुभ समाचार या कार्य आपके जीवन में प्रवेश करने वाला होता है।
भक्ति में भाव ही है सबसे बड़ा माध्यम
सच्ची भक्ति में तर्क या प्रदर्शन नहीं, बल्कि भाव का महत्व होता है। जब दिल से की गई आराधना आंखों से आंसुओं के रूप में प्रकट हो, तो उसे दुर्बलता नहीं बल्कि आध्यात्मिक पूर्णता का प्रतीक समझना चाहिए। प्रेमानंद महाराज के अनुसार, ऐसे लक्षणों को पहचानकर समझना चाहिए कि ईश्वर आपको देख और सुन रहे हैं।
मंदिर में जब मन और आत्मा ईश्वर की उपस्थिति से स्पर्शित होते हैं, तो वह पल केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि दिव्य अनुभूति का क्षण बन जाता है। और उस क्षण बहने वाला हर एक आंसू ईश्वर के प्रति आपकी सच्ची भक्ति का मौन लेकिन गूंजता हुआ प्रमाण होता है।














