आज हैं शनि प्रदोष व्रत, जानें इसका महत्व, पूजन विधि और व्रत कथा
By: Ankur Mundra Sat, 24 Apr 2021 08:18:49
हिन्दू धर्म में हर दिन का आध्यात्मिक महत्व होता है। आज प्रदोष का व्रत हैं जो कि त्रयोदशी तिथि के दिन किया जाता हैं। हर माह की तेरस को प्रदोष का व्रत मनाया जाता हैं। आज शनिवार को प्रदोष व्रत आने से इसे शनि प्रदोष व्रत के रूप में पूजा जाता हैं। शनि प्रदोष व्रत में शनि के साथ ही शिव का भी आशीर्वाद प्राप्त होता हैं। आज के दिन किया गया व्रत और पूजन आपकी सभी मनोकामनाओं की पूर्ती के साथ ही सुख-समृद्धि लाने का काम करता हैं। तो आइये जानते हैं शनि प्रदोष व्रत के महत्व, पूजन विधि और व्रत कथा के बारे में।
प्रदोष व्रत का महत्व
प्रदोष व्रत की पूजा प्रदोष काल में यानी सूर्यास्त के बाद की जाती है, इसी वजह से प्रदोष व्रत शनिवार 24 अप्रैल को ही माना जा रहा है, क्योंकि आज ही शाम से त्रयोदशी तिथि लग रही है। मान्यता है कि शनि प्रदोष का व्रत रखने के बाद शनि से जुड़ी वस्तुओं का दान करना चाहिए। ऐसा करने से शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या में आपको राहत मिलती है। वहीं कुछ लोग प्रदोष का व्रत संतान की प्राप्ति के लिए भी रखते हैं।
ऐसे रखें व्रत और पूजाविधि
शास्त्रों में शिवजी को शनिदेव का आराध्य माना गया है, इसलिए प्रदोष में शनि की पूजा करने से आपकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है और शनि की दशा में भी राहत मिलती है। शनि प्रदोष में शनि स्त्रोत का पाठ करना भी जरूरी माना जाता है। प्रदोष व्रत के दिन सुबह शीघ्र स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान शंकर और माता पार्वती को स्नान करवाएं। उसके बाद बेलपत्र, भांग, धतूरा, फूल, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। इसके साथ ही भगवान को लौंग, इलाइची, अक्षत, पान और सुपारी भी चढ़ाएं और इत्र भी अर्पित करें। प्रदोष अगर शनिवाार को पड़े तो स्टील की कटोरी में तिल का तेल डालिए और अपना चेहरा उसमें देखिए और शनिदेव का ध्यान कीजिए। फिर इस तेल को डाकोत को दान कर दीजिए। इसके साथ ही आप काली उड़द, काले तिल और जौ भी दान कर सकते हैं। इस दिन काली गाय और काले कुत्ते को तेल से चुपड़ी मीठी रोटी खिलाने से भी आपकी सोई किस्मत जाग जाती है।
शनि प्रदोष व्रत की कथा
प्राचीनकाल में एक सेठजी थे। उनके घर में हर प्रकार की सुख-सुविधाएं थीं। लेकिन संतान नहीं होने के कारण सेठ और सेठानी हमेशा दुःखी रहते थे। काफी सोच-विचार करके सेठजी ने अपना काम नौकरों को सौंप दिया और खुद सेठानी के साथ तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। अपने नगर से बाहर निकलने पर उन्हें एक साधु मिले जो ध्यानमग्न बैठे थे। सेठजी ने सोचा, क्यों न साधु से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा की जाए। सेठ और सेठानी साधु के निकट बैठ गए। साधु ने जब आंखें खोलीं तो उन्हें ज्ञात हुआ कि सेठ और सेठानी काफी समय से आशीर्वाद की प्रतीक्षा में बैठे हैं। साधु ने सेठ और सेठानी से कहा कि मैं तुम्हारा दुःख जानता हूं। तुम शनि प्रदोष व्रत करो, इससे तुम्हें संतान सुख प्राप्त होगा। साधु ने सेठ-सेठानी प्रदोष व्रत की विधि बताई। दोनों साधु से आशीर्वाद लेकर तीर्थयात्रा के लिए आगे चल पड़े। तीर्थयात्रा से लौटने के बाद सेठ और सेठानी दोनों ने मिलकर शनि प्रदोष व्रत किया इसके प्रभाव से उनके घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ।
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