सावन का पावन महीना भगवान शिव की आराधना और उपासना के लिए सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पूरे माह में आने वाले प्रत्येक सोमवार का विशेष महत्व होता है। कहा जाता है कि जो श्रद्धालु सावन सोमवार के दिन श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत रखकर भगवान शिव की पूजा करते हैं, उन पर भोलेनाथ की विशेष कृपा बनी रहती है। अविवाहित कन्याएं मनचाहे और योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए यह व्रत करती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं अपने दांपत्य जीवन में प्रेम, सुख और समृद्धि बनाए रखने की कामना से सावन सोमवार का व्रत रखती हैं। इतना ही नहीं, पुरुष भी इस व्रत को पूरी श्रद्धा के साथ कर सकते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सोमवार का संबंध चंद्रमा से माना जाता है और चंद्रमा मन का कारक ग्रह है। भगवान शिव अपने मस्तक पर चंद्रमा को धारण किए हुए हैं, इसलिए ऐसी मान्यता है कि वे अपने भक्तों के मन की भावनाओं को समझते हैं और उनकी सच्ची प्रार्थनाओं को स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि सावन सोमवार का महत्व अत्यंत विशेष माना गया है। यदि आप भी इस दिन व्रत रखने जा रहे हैं, तो पूजा के साथ सोमवार व्रत कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करें।
सोमवार व्रत की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में एक अत्यंत समृद्ध साहूकार रहता था। उसके पास धन-दौलत, वैभव और किसी भी प्रकार की भौतिक सुविधा की कोई कमी नहीं थी। इसके बावजूद वह भीतर से बहुत दुखी रहता था, क्योंकि उसकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की इच्छा से वह प्रतिदिन भगवान शिव की आराधना करता और प्रत्येक सोमवार को पूरे विधि-विधान से व्रत रखकर महादेव की पूजा करता था। उसकी अटूट श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि यह आपका सच्चा भक्त है, इसकी मनोकामना अवश्य पूरी कीजिए।
भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा कि साहूकार के भाग्य में संतान का योग नहीं है। यदि उसे पुत्र का वरदान दिया भी गया तो वह केवल 12 वर्ष तक ही जीवित रहेगा। यह सुनकर माता पार्वती ने महादेव से आग्रह किया कि भक्त की भक्ति को देखते हुए उसे पुत्र का आशीर्वाद अवश्य मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि सच्चे भक्त की प्रार्थना भी पूरी न हो, तो लोगों का विश्वास कमजोर पड़ सकता है। माता पार्वती के बार-बार अनुरोध करने पर भगवान शिव ने साहूकार को पुत्र का वरदान दे दिया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उस बालक की आयु केवल 12 वर्ष ही होगी।
पुत्र प्राप्ति से साहूकार और उसकी पत्नी अत्यंत प्रसन्न हुए, लेकिन पुत्र की अल्पायु की बात उनके मन को हमेशा परेशान करती रही। इसके बावजूद उन्होंने भगवान शिव की भक्ति और सोमवार के व्रत को कभी नहीं छोड़ा। समय बीतता गया और जब उनका पुत्र 11 वर्ष का हुआ, तब साहूकार ने उसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए उसके मामा के साथ काशी भेजने का निर्णय लिया। विदा करते समय उसने अपने साले से कहा कि यात्रा के दौरान जहां भी ठहरना, वहां यज्ञ कराना और ब्राह्मणों को भोजन कराकर आगे बढ़ना।
यात्रा के दौरान दोनों एक ऐसे नगर पहुंचे, जहां राजकुमारी का विवाह होने वाला था। जिस राजकुमार से उसका विवाह तय हुआ था, वह एक आंख से काना था। जब राजा ने साहूकार के सुंदर और तेजस्वी पुत्र को देखा तो उसके मन में विचार आया कि विवाह की सभी रस्में इसी युवक से पूरी करा दी जाएं, ताकि किसी को वर की वास्तविकता का पता न चले। राजा ने इसके बदले मामा को पर्याप्त धन देने का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।
विवाह की सभी रस्में पूरी होने के बाद साहूकार के पुत्र ने विदा होने से पहले राजकुमारी की चुनरी पर लिख दिया कि उसका वास्तविक विवाह उसी के साथ हुआ है, जबकि जिस युवक के साथ उसे विदा किया जाएगा, वह एक आंख से काना है। इसके बाद वह अपने मामा के साथ काशी के लिए रवाना हो गया। जब राजकुमारी ने यह संदेश पढ़ा, तो उसने काने राजकुमार के साथ जाने से साफ इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप राजा ने भी अपनी पुत्री को विदा नहीं किया और बारात वापस लौट गई।
उधर, मामा और भांजा काशी पहुंचकर पहले की तरह यज्ञ और धार्मिक कार्य करते रहे। एक दिन यज्ञ के दौरान साहूकार का पुत्र काफी देर तक बाहर नहीं आया। जब मामा उसे देखने भीतर पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि बालक के प्राण निकल चुके हैं। यह दृश्य देखकर वह विलाप करने लगे। उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती वहां से गुजर रहे थे। माता पार्वती ने रोने का कारण पूछा तो उन्हें पता चला कि यह वही बालक है, जिसे उनके आग्रह पर भगवान शिव ने जन्म का वरदान दिया था।
माता पार्वती ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि इस बालक को पुनः जीवन प्रदान कर दें, अन्यथा उसके माता-पिता यह दुख सहन नहीं कर पाएंगे। भगवान शिव ने कहा कि उसकी निर्धारित आयु पूरी हो चुकी है, लेकिन माता पार्वती के बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने अपनी कृपा से उस बालक को पुनर्जीवित कर दिया। कुछ ही क्षणों बाद वह 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करते हुए जीवित हो उठा। मामा और भांजे ने भगवान शिव का आभार व्यक्त किया और अपने नगर की ओर लौट पड़े।
वापसी के दौरान वे उसी राज्य में पहुंचे, जहां राजकुमारी का विवाह हुआ था। राजकुमारी ने साहूकार के पुत्र को पहचान लिया। इसके बाद राजा ने पूरे सम्मान के साथ अपनी पुत्री का विवाह उसी युवक से कराया और उसे धन-धान्य सहित विदा किया। जब साहूकार का पुत्र अपनी पत्नी के साथ घर लौटा तो माता-पिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसी रात भगवान शिव ने साहूकार को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि उसकी अटूट भक्ति और सोमवार व्रत से प्रसन्न होकर उन्होंने उसके पुत्र को नया जीवन प्रदान किया है। धार्मिक मान्यता है कि जो श्रद्धालु श्रद्धा और विश्वास के साथ सोमवार व्रत कथा का पाठ करता है या उसे सुनता है, भगवान शिव उसकी सभी बाधाओं को दूर करते हैं, मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं और उसके जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
नोट: यह जानकारी ज्योतिषीय मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। व्यक्तिगत जीवन में किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहेगा।














