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निर्जला एकादशी 2025: व्रत की तिथि, महत्व, कथा और संपूर्ण पूजा विधि

निर्जला एकादशी, हिंदू पंचांग के अनुसार, साल की सभी एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ मानी जाती है। यह एकादशी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की होती है और इसका व्रत रखना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है। निर्जला का अर्थ है — बिना जल के। इस दिन उपासक न तो अन्न खाते हैं और न ही जल पीते हैं। इसी कारण इसे सभी व्रतों में सबसे कठिन भी माना गया है।

Posts by : Rajesh Bhagtani | Updated on: Sun, 01 June 2025 11:20:42

निर्जला एकादशी 2025: व्रत की तिथि, महत्व, कथा और संपूर्ण पूजा विधि

निर्जला एकादशी, हिंदू पंचांग के अनुसार, साल की सभी एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ मानी जाती है। यह एकादशी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की होती है और इसका व्रत रखना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है। निर्जला का अर्थ है — बिना जल के। इस दिन उपासक न तो अन्न खाते हैं और न ही जल पीते हैं। इसी कारण इसे सभी व्रतों में सबसे कठिन भी माना गया है।

निर्जला एकादशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त


—तिथि प्रारंभ: 6 जून 2025 (रात्रि 2:15 बजे)

—तिथि समाप्त: 7 जून 2025 (प्रातः 4:47 बजे)

—व्रत रखने की तिथि (उदय काल मान्य): 6 जून 2025, शुक्रवार

इस वर्ष यह व्रत दो रूपों में मनाया जाएगा:


—स्मार्त निर्जला एकादशी: 6 जून को

—वैष्णव निर्जला एकादशी: 7 जून को

स्मार्त व्रत वे लोग रखते हैं जो सामान्य गृहस्थ जीवन में रहते हैं, जबकि वैष्णव व्रत विशेष रूप से श्रीविष्णु के वैष्णव भक्तों के लिए होता है।

निर्जला एकादशी का महत्व

निर्जला एकादशी को “भीमसेनी एकादशी” भी कहा जाता है, क्योंकि इस व्रत की पौराणिक कथा महाभारत के पात्र भीम से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि पांडवों में केवल भीम ही खाने-पीने के अत्यंत प्रेमी थे और वे एकादशी का व्रत नहीं कर पाते थे। जब ऋषि व्यास ने उन्हें बताया कि केवल निर्जला एकादशी का व्रत करने से सभी 24 एकादशियों का फल प्राप्त हो सकता है, तब भीम ने यह कठिन व्रत रखा। इसलिए इसे “भीम एकादशी” भी कहा जाता है।

इस व्रत को रखने से...

—सभी पाप नष्ट हो जाते हैं

—मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है

—जीवन में शांति, संतोष और सुख-समृद्धि आती है

—भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है

पूजा विधि

निर्जला एकादशी व्रत का पालन पूरी निष्ठा और नियम से करना चाहिए। इस दिन व्रती को सुबह से अगले दिन पारण तक जल, अन्न या फल तक नहीं लेना होता। पूजा विधि इस प्रकार है:

—प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठें और स्नान कर स्वच्छ, पीले या सफेद वस्त्र धारण करें।

—घर के पूजा स्थान पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।

—जल, पंचामृत, फूल, तुलसी, पीले वस्त्र आदि से भगवान विष्णु का पूजन करें।

—व्रत का संकल्प लें — "मैं आज निर्जला एकादशी व्रत पूर्ण श्रद्धा से रख रहा/रही हूँ, कृपया मेरी पूजा स्वीकार करें।"

—दिनभर भगवान विष्णु के नाम का जप करें — "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"

—विष्णु सहस्रनाम और गीता पाठ करें।

—शाम को दीप जलाएं और आरती करें।

—रातभर जागरण करें या शांत भाव से हरिनाम जपते रहें।

—अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय के बाद किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं और दान दें।

—दोपहर में पारण करें — फलाहार या हल्का भोजन ग्रहण करें।

व्रत की कठिनाई और सावधानियाँ

निर्जला एकादशी का व्रत कठिन है क्योंकि इसमें जल भी वर्जित होता है। इसलिए इस व्रत को रखने से पहले अपने स्वास्थ्य का विचार अवश्य करें।

—यदि किसी को स्वास्थ्य समस्या हो (जैसे मधुमेह, रक्तचाप आदि), तो वे फलाहारी निर्जला व्रत या केवल आंशिक निर्जला व्रत रख सकते हैं।

—वृद्ध, गर्भवती स्त्रियाँ या रोगी व्यक्ति जल ले सकते हैं, परंतु श्रद्धा बनाए रखें।

दान और सेवा का महत्व

इस दिन पानी पिलाना, छाता दान करना, कुंभ या वस्त्र दान, और ब्राह्मण भोजन कराना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। खासतौर पर गर्मी के इस समय में प्यासे जीवों को पानी पिलाना ईश्वर सेवा के बराबर माना गया है।

निर्जला एकादशी से जुड़े आध्यात्मिक लाभ

—मन शुद्ध होता है

—आत्मा शांति अनुभव करती है

—क्रोध, लोभ, मोह पर नियंत्रण आता है

—भक्ति भाव जागृत होता है

—परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है

निर्जला एकादशी 2025 केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आत्म-संयम, तप और भक्ति का प्रतीक है। यह जीवन के भौतिक मोह को त्याग कर आत्मा की ओर लौटने का आह्वान है। यदि यह व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक किया जाए, तो व्यक्ति के समस्त पाप मिट जाते हैं और ईश्वर की कृपा सदैव बनी रहती है।

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