
शारदीय नवरात्रि में नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की उपासना की जाती है। प्रत्येक दिन देवी का एक विशिष्ट रूप साधकों के लिए शक्ति और प्रेरणा का स्रोत होता है। नवरात्रि के दूसरे दिन की पूजा मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित होती है। यह स्वरूप साधना, तपस्या और त्याग का प्रतीक माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विधि-विधान से मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से तप, संयम, आत्मज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि इस दिन की आराधना से साधक के भीतर धैर्य और साहस का संचार होता है।
मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप और महत्व
पुराणों में वर्णन है कि पार्वतीजी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। वर्षों तक तप और उपवास करने के कारण उन्हें ‘ब्रह्मचारिणी’ नाम से जाना गया। उनकी यह साधना आत्मबल, दृढ़ निश्चय और संयम का प्रतीक है। मां ब्रह्मचारिणी की उपासना से भक्त कठिन परिस्थितियों का सामना धैर्यपूर्वक कर पाता है और जीवन में सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।
पूजन विधि
नवरात्रि के दूसरे दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करने के बाद माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। दीपक प्रज्वलित कर संकल्प लें और “ॐ ब्रह्मचारिण्यै नमः” मंत्र का जप करें। देवी को लाल या पीले वस्त्र अर्पित करें। चंदन, अक्षत, कुमकुम और पुष्प चढ़ाकर उनकी पूजा करें। धूप और कपूर से आरती करें और मिश्री, गुड़, शहद या शक्कर का भोग लगाएं।
आवश्यक पूजन सामग्री
लाल/पीला वस्त्र या कपड़े से ढका आसन
माता की प्रतिमा या चित्र
कलश, नारियल और आम्रपत्र
गंगाजल, रोली, अक्षत, कुमकुम और पंचमेवा
पुष्पमाला, बेलपत्र और चंदन
दीपक, धूपबत्ती और कपूर
मिश्री, गुड़, शक्कर, दूध, दही, घी, शहद (पंचामृत)
मौली/कलावा और सिंदूर
मां ब्रह्मचारिणी के मंत्र
“ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः”
या –
“दधाना कर पद्माभ्याम् अक्षमालाकमण्डलु।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥”
विशेष उपाय
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के समय गंगाजल में मिश्री डालकर अर्पण करना शुभ माना जाता है। यह साधक को धैर्य और स्पष्ट बुद्धि प्रदान करता है। पूजा पूर्ण होने के बाद किसी कन्या को खीर, मिश्री या दूध का प्रसाद देना विशेष फलदायी माना जाता है।
मां ब्रह्मचारिणी की कथा
कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए वर्षों तक कठोर तप किया। इस तपस्या के बल पर उन्हें ‘ब्रह्मचारिणी’ कहा गया। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसीलिए नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से भक्त को इच्छित वरदान की प्राप्ति होती है और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।














