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भारत में 40 डिग्री सामान्य, लेकिन यूरोप में जा रही लोगों की जान; आखिर क्यों नहीं झेल पा रहे गर्मी?

भारत में 40 डिग्री तापमान सामान्य माना जाता है, लेकिन यूरोप में यही गर्मी जानलेवा साबित हो रही है। जानिए आखिर क्यों फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों में हीटवेव से बढ़ रही हैं मौतें और इसके पीछे क्या हैं वैज्ञानिक कारण।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Mon, 29 Jun 2026 11:36:31

भारत में 40 डिग्री सामान्य, लेकिन यूरोप में जा रही लोगों की जान; आखिर क्यों नहीं झेल पा रहे गर्मी?

यूरोप इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है और कई देशों में हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। जिस 40 डिग्री सेल्सियस तापमान को भारत में गर्मियों के दौरान आम माना जाता है, वही यूरोप में लोगों की जान पर भारी पड़ रहा है। अकेले फ्रांस में गर्मी से एक हजार से अधिक लोगों की मौत होने की खबरें सामने आई हैं। इसके अलावा जर्मनी, ब्रिटेन, स्वीडन समेत कई यूरोपीय देशों में हीटवेव ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है।

स्थिति इतनी विकट हो गई है कि कई जगह स्कूलों को निर्धारित समय से पहले बंद करना पड़ रहा है। अभिभावकों से बच्चों को जल्द घर ले जाने की अपील की जा रही है। दफ्तरों में भी कामकाज प्रभावित हो रहा है और लोगों के लिए राहत पाने के विकल्प बेहद सीमित हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि तापमान भले ही 40 डिग्री दर्ज हो रहा हो, लेकिन उसका असर इससे कहीं अधिक महसूस हो रहा है।

यूरोप में गर्मी क्यों बन रही है 'साइलेंट किलर'?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस तापमान के साथ भारत के करोड़ों लोग हर साल रहते हैं, वही यूरोप में इतनी बड़ी त्रासदी का कारण क्यों बन रहा है? विशेषज्ञों के अनुसार इसकी एक प्रमुख वजह वहां के घरों की बनावट और जलवायु के अनुरूप तैयार की गई संरचना है। यूरोप में अधिकांश मकानों का निर्माण इस तरह किया जाता है कि वे सर्दियों में अंदर गर्माहट बनाए रखें और ठंड का असर कम से कम हो।

आमतौर पर वहां गर्मियों में तापमान बहुत अधिक नहीं पहुंचता, इसलिए भवनों की डिजाइन भी उसी हिसाब से तैयार की जाती है। लेकिन जब तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है तो यही मकान गर्मी को अपने भीतर रोक लेते हैं। नतीजतन घरों के अंदर का तापमान कई बार 50 डिग्री के आसपास जैसा महसूस होने लगता है, जिससे लोगों के लिए राहत मिलना बेहद मुश्किल हो जाता है।

पत्थर के मकान और एयर कंडीशनर की कमी बढ़ा रही मुश्किल

यूरोप के अधिकांश पुराने मकान पत्थरों से बने होते हैं। पत्थर दिन में धीरे-धीरे गर्म होते हैं, लेकिन एक बार गर्म होने के बाद उन्हें ठंडा होने में भी काफी समय लगता है। ऐसे में दिनभर की गर्मी रात तक घरों के भीतर बनी रहती है और लोगों को आराम नहीं मिल पाता। यही वजह है कि लगातार कई दिनों तक हीटवेव रहने पर स्थिति और गंभीर हो जाती है।

दूसरी बड़ी वजह एयर कंडीशनर का सीमित इस्तेमाल है। यूरोप में केवल लगभग 7 प्रतिशत घरों में ही एयर कंडीशनिंग की सुविधा उपलब्ध है। चूंकि वहां सामान्य परिस्थितियों में इसकी आवश्यकता कम पड़ती है, इसलिए अधिकतर लोग एसी नहीं लगाते। लेकिन इस बार अचानक बढ़ी गर्मी के कारण एयर कंडीशनर और कूलिंग उपकरणों की मांग तेजी से बढ़ गई है। कई स्थानों पर इनकी कमी भी देखने को मिल रही है।

सर्द मौसम के हिसाब से बने घर, गर्मी के लिए नहीं हैं तैयार

लंबे समय तक यूरोप में रह चुके रवि रंजन बताते हैं कि वहां के घरों का पूरा ढांचा ठंड से बचाने के उद्देश्य से तैयार किया जाता है। लोग बाहर भारी ऊनी कपड़े पहनते हैं, लेकिन घर के भीतर प्रवेश करते ही उन्हें उतार देते हैं क्योंकि अंदर का वातावरण पहले से गर्म रहता है। मकानों की दीवारें और निर्माण शैली ऐसी होती है कि सर्दी का असर न्यूनतम रहे।

ऐसी स्थिति में जब बाहरी तापमान 40 डिग्री तक पहुंच जाता है तो घरों के भीतर गर्मी और अधिक महसूस होने लगती है। उन्होंने बताया कि भारत की तरह यूरोप में लगभग हर घर में एसी, कूलर या पंखे नहीं होते। यहां तक कि टेबल फैन का चलन भी पिछले कुछ वर्षों में ही धीरे-धीरे बढ़ा है। इसलिए अचानक आई भीषण गर्मी वहां के लोगों के लिए असामान्य और बेहद कठिन साबित हो रही है।

आनुवांशिक अनुकूलन भी माना जा रहा एक कारण

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल भवनों की संरचना ही नहीं, बल्कि जैविक अनुकूलन भी इस स्थिति में भूमिका निभा सकता है। यूरोप के लोग हजारों वर्षों से ठंडे मौसम में रहने के अनुरूप विकसित हुए हैं। उनके शरीर ने सर्द जलवायु के साथ खुद को बेहतर तरीके से ढाल लिया है, जबकि अत्यधिक गर्म वातावरण में रहने का अनुभव अपेक्षाकृत कम रहा है।

यही कारण है कि अचानक आई तीव्र गर्मी का असर उनके शरीर पर अधिक पड़ता है। जब ऊंचा तापमान, गर्म घर, सीमित कूलिंग सुविधाएं और लगातार चल रही हीटवेव एक साथ मिलती हैं, तो यह स्थिति कई लोगों के लिए गंभीर स्वास्थ्य संकट का रूप ले लेती है। विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते जलवायु परिदृश्य को देखते हुए यूरोप को अब अपनी बुनियादी संरचना और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में भी गर्मी से निपटने के लिए व्यापक बदलाव करने होंगे।

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