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बंगाल के कानून नहीं मान सकते तो कहीं और चले जाएं, मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने हुमायूं कबीर को दी कड़ी नसीहत

पश्चिम बंगाल में पशु वध नियंत्रण नियमों को लेकर सियासत तेज, मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने हुमायूं कबीर को दिया सख्त जवाब, जानें नए आदेश और जुर्माने से जुड़े नियमों की पूरी जानकारी।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Fri, 22 May 2026 6:28:39

बंगाल के कानून नहीं मान सकते तो कहीं और चले जाएं, मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने हुमायूं कबीर को दी कड़ी नसीहत

पश्चिम बंगाल की सियासत एक बार फिर तीखे बयानों को लेकर सुर्खियों में है। राज्य सरकार में मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने शुक्रवार को हाल ही में जारी उस अधिसूचना का खुलकर बचाव किया, जिसमें पशु वध नियंत्रण से जुड़े नियमों को सख्ती से लागू करने की बात कही गई है। उन्होंने दावा किया कि ये प्रावधान कोई नए नहीं हैं, बल्कि 1950 से कानून के रूप में मौजूद हैं, लेकिन पहले की सरकारों ने वोट बैंक की राजनीति के चलते इन्हें प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया।

एएनआई से बातचीत में मंत्री ने आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के प्रमुख हुमायूं कबीर पर भी तीखा हमला बोला। कबीर ने राज्य में भाजपा नीत सरकार के फैसलों का विरोध करते हुए कहा था कि धार्मिक बलि (कुर्बानी) किसी भी हाल में जारी रहेगी, क्योंकि यह सदियों पुरानी परंपरा है। इसी बयान पर पलटवार करते हुए अग्निमित्रा पॉल ने कहा कि जो लोग बंगाल के कानून नहीं मान सकते, उन्हें यहां रहने का अधिकार नहीं है और वे चाहें तो किसी अन्य जगह या देश में जा सकते हैं।

मंत्री का सख्त रुख और विवादित बयान

मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने साफ कहा कि अगर हुमायूं कबीर बंगाल में रहना चाहते हैं, तो उन्हें राज्य के कानूनों का पालन करना ही होगा। उन्होंने कहा कि कानून सभी के लिए समान हैं और उनका पालन करना अनिवार्य है। पॉल ने आगे कहा कि यदि किसी को नियम स्वीकार नहीं हैं, तो वह किसी अन्य राज्य या देश में जाकर रह सकता है, लेकिन बंगाल में रहकर कानून तोड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राज्य में लागू यह नियम 1950 से अस्तित्व में है, लेकिन पिछली सरकारों ने इसे लागू नहीं किया क्योंकि वे वोट बैंक की राजनीति में उलझी रहीं। मंत्री ने दोहराया कि कानून से समझौता नहीं किया जा सकता और सभी नागरिकों को इसके दायरे में रहना होगा।

सरकार की अधिसूचना में क्या है प्रावधान

यह विवाद तब और बढ़ गया जब पश्चिम बंगाल सरकार ने हाल ही में एक अधिसूचना जारी की, जिसमें पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950 के तहत कई सख्त नियम लागू किए गए। नए आदेश के अनुसार ‘फिटनेस सर्टिफिकेट’ केवल तभी जारी किया जाएगा जब नगरपालिका अध्यक्ष या पंचायत समिति प्रमुख, किसी सरकारी पशु चिकित्सक के साथ मिलकर इस बात की पुष्टि करें कि संबंधित पशु 14 वर्ष से अधिक आयु का हो गया है या फिर बीमारी, चोट, शारीरिक विकृति या अन्य गंभीर कारणों से काम करने अथवा प्रजनन के लिए अक्षम हो चुका है।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह प्रमाणपत्र दोनों अधिकारियों की लिखित सहमति के बाद ही मान्य होगा, ताकि प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे और किसी प्रकार की अनियमितता न हो।

नियम तोड़ने पर सजा और जुर्माने का प्रावधान

अधिसूचना में यह भी कहा गया है कि सार्वजनिक स्थानों पर पशु वध पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। अब पशु का वध केवल नगरपालिका द्वारा अधिकृत बूचड़खाने या स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्धारित स्थानों पर ही किया जा सकेगा।

इन नियमों का उल्लंघन करने पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। दोषी पाए जाने पर अधिकतम छह महीने तक की जेल, 1,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों सजाएं एक साथ दी जा सकती हैं। सरकार ने इसे कानून व्यवस्था और पशु नियंत्रण व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक जरूरी कदम बताया है।

अदालत में पहुंचा मामला, हाईकोर्ट का फैसला

सरकार के इस फैसले के खिलाफ कई याचिकाएं कलकत्ता हाई कोर्ट में दायर की गईं, जिनमें अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि नए दिशा-निर्देश व्यवहारिक रूप से कई कठिनाइयां पैदा कर सकते हैं और पुराने कानून के अनुपालन को लेकर भी सवाल उठाए।

हालांकि, सुनवाई के बाद कलकत्ता हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ईद-उल-अजहा जैसे अवसरों से पहले बिना अनिवार्य फिटनेस सर्टिफिकेट के किसी भी मवेशी या भैंस के वध पर लगाए गए प्रतिबंध को फिलहाल बरकरार रखा जाएगा।

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