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बिहारियों की ‘दीदी’ के लिए वफादारी, शत्रुघ्न के बाद कीर्ति आजाद भी संकट में ममता के साथ खड़े

पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर बढ़ते असंतोष के बीच शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद ने ममता बनर्जी के प्रति अपनी वफादारी दोहराई है। पार्टी में जारी बगावत और राजनीतिक उठापटक के बावजूद दोनों नेताओं ने स्पष्ट किया है कि वे किसी भी परिस्थिति में ‘दीदी’ का साथ नहीं छोड़ेंगे। जहां एक ओर कई नेता अलग राह चुन रहे हैं, वहीं ये दोनों बिहारी चेहरे ममता के समर्थन में मजबूती से खड़े नजर आ रहे हैं।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Fri, 12 Jun 2026 8:55:14

बिहारियों की ‘दीदी’ के लिए वफादारी, शत्रुघ्न के बाद कीर्ति आजाद भी संकट में ममता के साथ खड़े

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी में जारी खींचतान के बीच कई नेता और जनप्रतिनिधि अलग राह पकड़ते नजर आ रहे हैं। हालांकि इस राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में पार्टी के दो प्रमुख बिहारी चेहरे—शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद—ने साफ संकेत दिया है कि वे ममता बनर्जी का साथ छोड़ने के मूड में नहीं हैं और संकट की इस घड़ी में उनके साथ मजबूती से खड़े रहेंगे।

जहां एक ओर पार्टी के भीतर बगावत और असहमति की खबरें सुर्खियों में हैं, वहीं दूसरी ओर टीएमसी नेतृत्व के प्रति वफादारी जताने वाले नेताओं की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे माहौल में शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद का रुख राजनीतिक रूप से काफी अहम माना जा रहा है। दोनों नेताओं ने संकेत दिया है कि राजनीतिक मुश्किलों के बावजूद वे पार्टी नेतृत्व पर अपना भरोसा बनाए हुए हैं।

शत्रुघ्न सिन्हा ने अफवाहों पर लगाया विराम

आसनसोल से सांसद और ‘बिहारी बाबू’ के नाम से लोकप्रिय शत्रुघ्न सिन्हा ने पार्टी छोड़ने या किसी बागी गुट का हिस्सा बनने की चर्चाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पिछले कुछ दिनों से उनकी चुप्पी को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं, लेकिन अब उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है।

मीडिया से बातचीत के दौरान सिन्हा ने कहा कि जब वे अपने राजनीतिक जीवन के कठिन दौर से गुजर रहे थे, तब ममता बनर्जी ने उन पर विश्वास जताया था। ऐसे में वह भी मुश्किल समय में उनका साथ छोड़ने की कल्पना नहीं कर सकते। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका किसी भी बागी खेमे से कोई संबंध नहीं है और जिन दस्तावेजों या पत्रों की चर्चा हो रही है, उनमें उनका कोई हस्ताक्षर नहीं है।

उन्होंने अपने अंदाज में कहा कि वह स्वयं के लिए “तीन लाइन का व्हिप” जारी कर रहे हैं—पहली बात, वे पहले भी तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी के साथ थे; दूसरी, आज भी उनके साथ हैं; और तीसरी, आगे भी उनके साथ ही रहेंगे। उन्होंने यह भी दोहराया कि फिलहाल किसी अन्य राजनीतिक विकल्प पर विचार करने का उनका कोई इरादा नहीं है।

पुराने रिश्तों का दिया हवाला


पूर्व केंद्रीय मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि राजनीति में उनके कई दलों के नेताओं से अच्छे संबंध हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे पार्टी बदलने वाले हैं। उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद जब राजनीतिक परिस्थितियां उनके पक्ष में नहीं थीं, तब ममता बनर्जी उन चुनिंदा नेताओं में शामिल थीं जिन्होंने उन पर भरोसा जताया।

सिन्हा ने कहा कि राजनीतिक जीवन में रिश्तों और विश्वास की अहम भूमिका होती है। उनके मुताबिक, जब कोई नेता कठिन समय में आपके साथ खड़ा रहता है, तो उसके संघर्ष के समय उससे दूरी बनाना उचित नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि वे हर परिस्थिति में ममता बनर्जी के साथ खड़े रहने का फैसला कर चुके हैं।

बागी खेमे में शामिल होने की खबरों को बताया गलत

हाल के दिनों में सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में ऐसी चर्चाएं तेज थीं कि शत्रुघ्न सिन्हा भी असंतुष्ट नेताओं के संपर्क में हैं। कुछ रिपोर्टों में उनका नाम कथित बागी सांसदों की सूची में भी जोड़ा गया था। हालांकि उन्होंने इन दावों को पूरी तरह निराधार बताया।

सिन्हा ने कहा कि राजनीति में अफवाहें तेजी से फैलती हैं और कई बार बिना किसी तथ्य के बातें प्रचारित कर दी जाती हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोग सच बोल रहे हैं, जबकि कुछ केवल भ्रम फैलाने का काम कर रहे हैं। इसलिए उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करना जरूरी समझा।

‘मैं विद्रोही स्वभाव का हूं, लेकिन पार्टी विरोधी नहीं’

अपनी बेबाक शैली के लिए मशहूर शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि वह स्वभाव से विद्रोही जरूर हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे पार्टी विरोधी गतिविधियों का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा कि वह हमेशा अपनी राय खुलकर रखते हैं और जो सही लगता है, वही बोलते हैं।

उन्होंने कहा कि स्पष्टवादिता को कभी-कभी गलत तरीके से पेश किया जाता है, लेकिन उनकी निष्ठा को लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, ममता बनर्जी एक संघर्षशील और मजबूत नेता हैं, जिन्होंने कई कठिन राजनीतिक परिस्थितियों का सामना किया है और आगे भी मजबूती से खड़ी रहेंगी।

चुनावी प्रदर्शन का भी किया जिक्र

शत्रुघ्न सिन्हा ने हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों का उल्लेख करते हुए कहा कि हार के बावजूद तृणमूल कांग्रेस का जनाधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। उन्होंने दावा किया कि पार्टी को अभी भी बड़ी संख्या में मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है और उसका वोट प्रतिशत इस बात का संकेत देता है कि वह पश्चिम बंगाल की राजनीति में अब भी एक प्रमुख शक्ति बनी हुई है।

कीर्ति आजाद का तीखा हमला, बागी नेताओं को बताया पार्टी के लिए खतरा

शत्रुघ्न सिन्हा के बाद अब बर्धमान-दुर्गापुर से सांसद कीर्ति आजाद भी खुलकर ममता बनर्जी के समर्थन में उतर आए हैं। उन्होंने न केवल पार्टी नेतृत्व के प्रति अपनी निष्ठा दोहराई, बल्कि बागी नेताओं पर भी जमकर हमला बोला। टीएमसी के प्रमुख बिहारी चेहरों में शामिल कीर्ति आजाद ने आरोप लगाया कि पार्टी में टूट पैदा करने के लिए बाहरी दबाव और राजनीतिक प्रलोभनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

उन्होंने दावा किया कि भारतीय जनता पार्टी केंद्रीय एजेंसियों जैसे ईडी और सीबीआई के डर का माहौल बनाकर तथा राजनीतिक लाभ का लालच देकर तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। आजाद ने पार्टी छोड़ने वाले नेताओं पर निशाना साधते हुए उन्हें ‘‘विश्वासघाती’’ करार दिया और कहा कि ऐसे लोग संगठन की पीठ में छुरा घोंपने का काम कर रहे हैं। अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए उन्होंने कुछ बागी नेताओं की तुलना ‘‘चूहों’’ से भी की, जो संकट के समय सबसे पहले जहाज छोड़ देते हैं।

ममता बनर्जी को बताया ‘घायल शेरनी’

कीर्ति आजाद ने ममता बनर्जी के लंबे राजनीतिक संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने अपने करियर में कई कठिन परिस्थितियों का सामना किया है और हर बार पहले से अधिक मजबूती के साथ वापसी की है। उन्होंने ममता की तुलना एक ‘‘घायल शेरनी’’ से करते हुए कहा कि मौजूदा संकट भी उन्हें कमजोर नहीं कर पाएगा।

आजाद के अनुसार, पार्टी के विरोधी यह मान रहे हैं कि टीएमसी टूट की स्थिति में है, लेकिन आने वाले समय में यही नेतृत्व फिर से संगठन को एकजुट कर सकता है। उन्होंने भरोसा जताया कि ममता बनर्जी राजनीतिक और संगठनात्मक दोनों स्तरों पर स्थिति को संभालने में सक्षम हैं।

बागी सांसदों के दावों पर उठाए सवाल

बागी गुट की ओर से यह दावा किया जा रहा है कि उन्हें लगभग 20 सांसदों का समर्थन हासिल है। हालांकि कीर्ति आजाद ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि दिल्ली में काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में आयोजित बैठक में कथित तौर पर केवल 13 सांसद ही मौजूद थे, इसलिए बड़े समर्थन के दावे वास्तविकता से काफी दूर हैं।

उनका कहना था कि कुछ नेता संख्या बल को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं ताकि यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी का बड़ा हिस्सा उनके साथ है, जबकि जमीनी स्थिति इससे अलग है। आजाद ने दावा किया कि टीएमसी के अधिकांश सांसद और कार्यकर्ता अभी भी ममता बनर्जी के नेतृत्व में भरोसा रखते हैं।

कल्याण बनर्जी और अभिषेक बनर्जी विवाद पर भी बोले

पार्टी के भीतर वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के बीच चल रही खींचतान पर भी कीर्ति आजाद ने अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि कल्याण बनर्जी एक भावुक और स्पष्टवादी नेता हैं, जिन्होंने वर्षों तक पार्टी और ममता बनर्जी का साथ दिया है।

आजाद ने कहा कि किसी भी बड़े राजनीतिक दल में मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन ऐसे मुद्दों को बातचीत और संगठनात्मक प्रक्रिया के माध्यम से सुलझाया जा सकता है। उन्होंने विश्वास जताया कि ममता बनर्जी जल्द ही इस विवाद का समाधान निकाल लेंगी और पार्टी को एकजुट रखने में सफल होंगी।

टीएमसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष लगातार बढ़ता गया। शुरुआत में जो नाराजगी सीमित स्तर पर दिखाई दे रही थी, वह अब एक बड़े राजनीतिक संकट का रूप ले चुकी है। नेतृत्व, संगठनात्मक फैसलों और भविष्य की रणनीति को लेकर कई नेताओं ने खुलकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

बताया जा रहा है कि ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में करीब 64 विधायकों ने अलग गुट बना लिया है। इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर चल रहे संकट को और गहरा कर दिया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह टीएमसी के इतिहास की सबसे गंभीर आंतरिक चुनौतियों में से एक हो सकती है।

दिल्ली तक पहुंचा बगावत का असर


पार्टी में बढ़ते असंतोष की गूंज अब राष्ट्रीय राजनीति में भी सुनाई देने लगी है। दिल्ली में काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को एक पत्र सौंपकर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है।

इस गुट में सायोनी घोष और पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान जैसे चर्चित नामों के शामिल होने की खबरें भी सामने आई हैं। इसके अलावा कुछ राज्यसभा सांसदों और अन्य नेताओं के इस्तीफे की चर्चाओं ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से इन दावों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

संकट के दौर में ममता को मिला मजबूत सहारा

ऐसे समय में जब पार्टी के कई पुराने और प्रभावशाली नेता अलग राह चुनते दिखाई दे रहे हैं, शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद का खुला समर्थन ममता बनर्जी के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। दोनों नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह संदेश देने की कोशिश की है कि राजनीतिक संकट चाहे जितना बड़ा क्यों न हो, वे पार्टी नेतृत्व के साथ खड़े रहेंगे।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल से बाहर के प्रभावशाली चेहरों का यह समर्थन टीएमसी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने में मदद कर सकता है। फिलहाल पार्टी के भीतर जारी उठापटक के बीच इतना स्पष्ट है कि शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद ने ममता बनर्जी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए संकेत दे दिया है कि वे किसी भी परिस्थिति में ‘दीदी’ का साथ नहीं छोड़ेंगे।

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