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राम मंदिर चढ़ावा चोरी: 2000 से शुरू हुआ खेल, फिर रोज लाखों तक पहुंची हेराफेरी; पूछताछ में आरोपियों ने खोले कई अहम राज

अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में पुलिस रिमांड के दौरान आरोपियों ने कई बड़े खुलासे किए। 2,000 रुपये से शुरू हुई चोरी रोज लाखों तक पहुंची, रैकेट के काम करने का तरीका भी सामने आया।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Sat, 11 Jul 2026 10:05:53

राम मंदिर चढ़ावा चोरी: 2000 से शुरू हुआ खेल, फिर रोज लाखों तक पहुंची हेराफेरी; पूछताछ में आरोपियों ने खोले कई अहम राज

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के मामले में गिरफ्तार तीनों आरोपियों से पुलिस लगातार पूछताछ कर रही है। पुलिस रिमांड के दौरान आरोपी करुणेश पांडेय, लवकुश तिवारी और अनुकल्प मिश्र ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं। पूछताछ में उन्होंने बताया कि चढ़ावे में हेराफेरी की शुरुआत सबसे पहले अविनाश शुक्ला ने की थी। शुरुआत में वह अकेले रकम निकालता था, लेकिन बाद में करुणेश उसके साथ जुड़ गया। धीरे-धीरे अनुकल्प समेत अन्य लोग भी इस पूरे खेल का हिस्सा बनते गए और फिर यह संगठित तरीके से चलने वाला एक रैकेट बन गया, जिसमें रोजाना अधिक से अधिक रकम निकालने की होड़ लग गई।

आरोपियों ने बताया कि शुरुआत में उन्होंने बेहद कम रकम निकाली ताकि किसी को शक न हो। पहले दो-दो हजार रुपये चुराए गए, लेकिन जब लगातार कई दिनों तक किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया और न ही किसी तरह की जांच हुई, तो उनका हौसला बढ़ता चला गया। इसके बाद चोरी की रकम 15-20 हजार रुपये प्रतिदिन तक पहुंच गई और बाद में यह आंकड़ा बढ़ते-बढ़ते एक व्यक्ति द्वारा रोजाना एक लाख से लेकर तीन लाख रुपये तक निकालने तक पहुंच गया। पुलिस सूत्रों के अनुसार ये सभी खुलासे रिमांड के दौरान हुई पूछताछ में सामने आए हैं।

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक हिरासत के दौरान तीनों आरोपी मानसिक दबाव में नजर आए। पूछताछ के बीच वे कई बार रोने लगते थे और रात में ठीक से सो भी नहीं पा रहे थे। यदि कुछ देर के लिए नींद आती भी थी तो घबराकर अचानक उठ जाते और फिर भावुक हो जाते। अधिकारियों का कहना है कि लगातार पूछताछ के दौरान आरोपियों ने पूरे घटनाक्रम के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

तलाशी की व्यवस्था नहीं होने का उठाया फायदा


पूछताछ में सामने आया कि शुरुआती दौर में केवल दो लोगों ने इस चोरी की शुरुआत की थी, लेकिन बाद में उनके करीबी भी इसमें शामिल होते गए। धीरे-धीरे यह नेटवर्क बड़ा होता गया और कई लोग चढ़ावे की गिनती के दौरान रकम निकालने लगे। आरोपियों का कहना है कि सबसे बड़ी वजह यह रही कि चढ़ावे की गणना के समय किसी भी कर्मचारी या संबंधित व्यक्ति की तलाशी नहीं ली जाती थी। इसी कमी का फायदा उठाकर वे बिना किसी डर के नकदी बाहर निकालते रहे।

उन्होंने पुलिस को बताया कि चोरी की गई रकम को तुरंत बाहर ले जाना जोखिम भरा होता था। इसलिए पहले उसे मंदिर परिसर में बाथरूम की सीवर लाइन के लिए खोदे गए गड्ढे में छिपा दिया जाता था। वहां पहले से बने रैक और ऊपर लगे कवर के कारण किसी को उस स्थान पर शक नहीं होता था। बाद में अनुकूल अवसर मिलने पर नकदी को जेबों और जुराबों में छिपाकर मंदिर परिसर से बाहर ले जाया जाता था।

कम रकम से शुरू होकर लाखों तक पहुंचा लालच

आरोपियों ने स्वीकार किया कि शुरुआत में पकड़े जाने का डर बना रहता था, इसलिए केवल दो-दो हजार रुपये ही निकाले जाते थे। जब कई दिनों तक किसी प्रकार की जांच या पूछताछ नहीं हुई तो उनका आत्मविश्वास बढ़ गया। इसके बाद वे एक बार में 10 से 15 हजार रुपये तक आसानी से निकालने लगे। उन्होंने बताया कि वे जानबूझकर शर्ट को पैंट के अंदर नहीं रखते थे, जिससे जेबों में रखी नोटों की गड्डियां बाहर से दिखाई न दें। किसी ने कभी उनकी तलाशी नहीं ली और न ही कोई संदेह व्यक्त किया।

धीरे-धीरे लालच इतना बढ़ गया कि चोरी की रकम लगातार बढ़ती चली गई। आरोपियों के अनुसार, पहले रोजाना 15-15 हजार रुपये निकालने की कोशिश होती थी, लेकिन बाद में यह एक तरह की प्रतिस्पर्धा बन गई। जो जितनी अधिक रकम निकाल सकता था, वह उतनी निकालने लगा। कई बार एक व्यक्ति अकेले ही एक से तीन लाख रुपये तक चुरा लेता था। उन्होंने पुलिस के सामने स्वीकार किया कि समय के साथ अधिक से अधिक पैसा बटोरने की होड़ लग गई थी और इस लालच में उन्हें यह भी एहसास नहीं रहा कि वे भगवान को चढ़ाई गई श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी धनराशि पर हाथ डाल रहे हैं।

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पूछताछ के दौरान आरोपियों ने पूरे रैकेट के संचालन की जानकारी तो विस्तार से दी, लेकिन अब तक उनमें अपने कृत्य को लेकर कोई खास पश्चाताप नजर नहीं आया। वे पूरे घटनाक्रम को सामान्य ढंग से बताते रहे और सवालों के जवाब भी सहजता से देते रहे।

जेल में मिले 'सलाहकार', परिवारों पर भी पड़ा असर

पूछताछ में आरोपियों ने यह भी बताया कि जेल पहुंचने के बाद गंभीर मामलों में बंद कुछ पुराने कैदियों ने उन्हें कानूनी प्रक्रिया को लेकर सलाह देना शुरू कर दिया। उनके अनुसार, वे कैदी उन्हें समझाते रहे कि डकैती जैसे गंभीर मामलों के आरोपी भी कई बार कानूनी राहत पा जाते हैं, जबकि उन पर तो चोरी का मामला है। इसलिए उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है और समय आने पर जमानत भी मिल सकती है।

हालांकि आरोपियों ने यह भी माना कि जैसे-जैसे मामला सार्वजनिक होता गया, उन्हें अपने कृत्य की गंभीरता का एहसास होने लगा। राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी की चर्चा उनके गांव और शहर के मोहल्लों तक पहुंच गई, जिससे उनके परिवार सामाजिक दबाव का सामना करने लगे। आरोपियों ने बताया कि इस घटना के बाद पड़ोसियों और परिचितों ने भी उनके परिवारों से दूरी बनानी शुरू कर दी। तब उन्हें महसूस हुआ कि उन्होंने केवल कानून ही नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े स्थान पर चोरी कर एक बहुत बड़ी गलती की है।

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