
दिल्ली दंगों से जुड़े यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) केस में हाई कोर्ट ने मंगलवार (2 सितंबर) को अहम फैसला सुनाया। अदालत ने छात्र कार्यकर्ताओं उमर खालिद, शरजील इमाम समेत कई आरोपियों की जमानत याचिकाएं नामंजूर कर दीं। इस आदेश को सभी आरोपियों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
पीठ का निर्णय
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति शालिंदर कौर की खंडपीठ ने इस मामले में 9 जुलाई को सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। मंगलवार को अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि याचिकाकर्ताओं को जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता। जिनकी याचिकाएं खारिज हुईं उनमें उमर खालिद और शरजील इमाम के अलावा मोहम्मद सलीम खान, शिफा उर रहमान, अतहर खान, मीरान हैदर, अब्दुल खालिद सैफी और गुलफिशा फातिमा शामिल हैं।
गिरफ्तारी की पृष्ठभूमि
दिल्ली पुलिस ने शरजील इमाम को 25 अगस्त 2020 को हिरासत में लिया था, जबकि उमर खालिद की गिरफ्तारी 14 सितंबर 2020 को हुई। अन्य आरोपियों को भी अलग-अलग समय पर गिरफ्तार किया गया था। ये सभी फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं और कई बार अदालत का दरवाजा खटखटा चुके हैं।
अभियोजन पक्ष का पक्ष
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, अभियोजन पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि यह महज दंगों का मामला नहीं है बल्कि योजनाबद्ध साजिश का नतीजा था। उनका तर्क था कि इस पूरी रणनीति के पीछे देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने का उद्देश्य था।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी अदालत में यह दलील दी कि केवल लंबी अवधि की हिरासत जमानत देने का आधार नहीं बन सकती।
दंगों की पृष्ठभूमि
फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) के विरोध प्रदर्शनों के बीच उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा भड़क उठी थी। इस भीषण दंगे में 53 लोगों की जान गई और 700 से ज्यादा लोग घायल हुए। पुलिस की जांच रिपोर्ट में दावा किया गया था कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे योजनाबद्ध षड्यंत्र था, जिसकी कड़ियां कई जगहों से जुड़ी हुई हैं।
लंबित याचिकाओं पर फैसला
शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, खालिद सैफी और अन्य सह-आरोपियों की जमानत याचिकाएं 2022 से ही दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित थीं। समय-समय पर विभिन्न पीठों ने इन पर सुनवाई की, लेकिन मंगलवार को अदालत ने सभी याचिकाओं को अस्वीकार कर दिया।














