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नौतपा के 9 दिन क्यों बरसती है आग? जानिए गर्मी न होने पर क्या होगा नुकसान

नौतपा के 9 दिन क्यों मानी जाती है भीषण गर्मी का प्रतीक? जानें वैज्ञानिक कारण, ज्योतिषीय मान्यता, पारंपरिक परंपराएं और यदि इस दौरान गर्मी न पड़ी तो खेती और पर्यावरण को क्या नुकसान हो सकता है।

Posts by : Kratika Maheshwari | Updated on: Sat, 24 May 2025 12:36:14

नौतपा के 9 दिन क्यों बरसती है आग? जानिए गर्मी न होने पर क्या होगा नुकसान

मई का महीना आमतौर पर भीषण गर्मी और लू के लिए जाना जाता है, लेकिन इस बार स्थिति कुछ अलग है। चक्रवात के कारण देश के कई हिस्सों में बारिश हुई, जिससे तापमान सामान्य से नीचे बना हुआ है। ऐसे में लोगों को अब नौतपा को लेकर चिंता सताने लगी है। नौतपा वे नौ दिन होते हैं जब सूर्य की तपन अपने चरम पर होती है और ऐसा माना जाता है कि धरती पर जैसे आग बरस रही हो। इसे नवताप भी कहा जाता है। सवाल यह उठता है कि आखिर इन नौ दिनों में ही इतनी प्रचंड गर्मी क्यों पड़ती है? क्या कहता है विज्ञान? क्या होती हैं इससे जुड़ी परंपराएं और यदि इस दौरान बारिश हो जाए तो क्या इसका कोई नुकसान होता है?

ज्योतिष के अनुसार, जेठ महीने में सूर्य 15 दिनों तक रोहिणी नक्षत्र में रहता है और पहले नौ दिन सबसे अधिक गर्मी पड़ती है। इन्हीं नौ दिनों को नौतपा कहा जाता है। यह अवधि आमतौर पर मई के अंत से जून के पहले सप्ताह तक होती है। इस बार भी नौतपा 25 मई से शुरू होगा। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, जेठ के इन शुरुआती नौ दिनों में सूर्य और पृथ्वी की दूरी सबसे कम होती है, जिससे सूर्य की किरणें सीधी और तीव्र रूप में धरती पर पड़ती हैं और भीषण गर्मी होती है। खगोलीय दृष्टि से 25 मई 2025 को सुबह 3:27 बजे सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करेगा और 8 जून तक इसी नक्षत्र में रहेगा। हालांकि सबसे अधिक प्रभाव पहले नौ दिनों में दिखाई देगा क्योंकि तब सूर्य की किरणें सीधे धरती पर पड़ती हैं।

अब सवाल यह है कि सिर्फ यही नौ दिन क्यों सबसे अधिक गर्म होते हैं? वैज्ञानिकों के अनुसार, जैसे घड़ी की सुइयों से समय का पता चलता है, वैसे ही आकाशीय घटनाओं की भी एक घड़ी होती है, जिसके अनुसार सूर्य रोहिणी नक्षत्र के सामने आता है। यह समय खासतौर पर मध्य भारत के लिए अत्यधिक गर्मी लेकर आता है। हालांकि वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि तापमान में वृद्धि का सीधा संबंध नक्षत्रों से नहीं बल्कि पृथ्वी और सूर्य की निकटता से होता है। वास्तव में पृथ्वी जब सूर्य की परिक्रमा करते हुए एक विशेष स्थिति में पहुंचती है, तब सूर्य के पीछे वृषभ तारामंडल का तारा रोहिणी आ जाता है। यही वह समय होता है जब सूरज और धरती के बीच की दूरी सबसे कम होती है और यह स्थिति लगभग नौ दिनों तक रहती है।

इतिहास में झांके तो रिपोर्ट्स बताती हैं कि करीब साल 1000 में सूर्य और रोहिणी की यह स्थिति 11 मई को बनती थी, तब भी नौ दिनों तक प्रचंड गर्मी पड़ती थी। संभवतः तभी से इस अवधि को नौतपा कहा जाने लगा।

भारतीय परंपरा में नौतपा का कृषि से गहरा संबंध है। एक कहावत कहती है—"दोएमूसा, दोएकातरा, दोए तिड्डी, दोएताव। दोयांरा बादी जळ हरै, दोए बिसर, दोए बाव।।" इसका अर्थ है कि यदि नौतपा के पहले दो दिन लू न चली तो चूहों की संख्या बढ़ जाएगी, अगले दो दिन लू न चली तो फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट पनपेंगे, फिर दो दिन लू न पड़ी तो टिड्डियों के अंडे खत्म नहीं होंगे, अगले दो दिन लू न पड़ी तो बुखार और अन्य बीमारियों के जीवाणु बच जाएंगे, और यदि अंतिम दो दिन लू नहीं चली तो जहरीले जीव-जंतु जैसे सांप-बिच्छू नियंत्रण से बाहर हो जाएंगे और आंधियों से फसलों को भारी नुकसान हो सकता है। इस परंपरा के पीछे वैज्ञानिक तर्क भी है कि गर्मी की अधिकता से खेतों में रहने वाले हानिकारक जीवों का सफाया हो जाता है।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, नौतपा की गर्मी खेती के लिए अत्यंत आवश्यक होती है। जितनी अधिक गर्मी और लू चलेगी, मानसून उतना ही अच्छा रहेगा। इससे खेतों में मौजूद नमी बढ़ेगी और कीटों व जीवों का प्रजनन चक्र टूटेगा। इससे किसानों को फसलें बचाने के लिए अधिक प्रयास नहीं करने पड़ेंगे। यदि नौतपा के दौरान गर्मी नहीं पड़ती या बारिश हो जाती है, तो इसका प्रभाव मानसून पर भी पड़ सकता है और बारिश की मात्रा कम हो सकती है। साथ ही हानिकारक जीव-जंतु भी खेतों में बच जाते हैं, जिससे फसलों को नुकसान पहुंच सकता है।

नौतपा के दौरान दान का भी विशेष महत्व होता है। भारत में इस समय शीतल चीजें जैसे पानी का घड़ा, सत्तू, पंखा, छाता, आम, नारियल और सफेद वस्त्र दान करने की परंपरा है। यह परंपरा गरुड़, पद्म और स्कंद पुराणों में भी उल्लेखित है और इसका उद्देश्य राह चलते या जरूरतमंद लोगों को गर्मी से राहत पहुंचाना होता है। भीषण गर्मी में जल दान को भी पुण्य का कार्य माना गया है। इस दौरान प्याऊ लगाना और प्यासे लोगों को पानी पिलाना शुभ होता है। यदि कोई अजनबी भी दरवाजा खटखटाकर पानी मांगे तो उसे इंकार नहीं करना चाहिए।

साथ ही, नौतपा के दौरान कुछ कार्यों को न करने की परंपरा भी रही है। जैसे इस समय निर्माण कार्य और खुदाई से बचने की सलाह दी जाती है क्योंकि इससे वास्तु दोष उत्पन्न हो सकता है। विवाह, सगाई, मुंडन जैसे शुभ कार्यों से भी परहेज किया जाता है। लंबी यात्राएं, विशेषकर बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए वर्जित मानी जाती हैं। इस समय मांसाहार, मदिरा और मसालेदार भोजन से भी बचने को कहा गया है। क्रोध, वाद-विवाद और मानसिक उत्तेजना से दूर रहने की सलाह दी जाती है, क्योंकि अधिक गर्मी मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकती है। इसलिए नौतपा को तप-साधना का समय माना गया है ताकि लोग अधिक से अधिक समय घर के भीतर रहें और सूर्य की तेज किरणों से सुरक्षित रह सकें।

इस प्रकार, नौतपा केवल मौसम की एक अवधि नहीं, बल्कि एक ऐसा समय है जिसका महत्व भारतीय परंपरा, कृषि और विज्ञान तीनों दृष्टिकोणों से गहराई से जुड़ा हुआ है।

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