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क्रिप्टोकरेंसी अब भारतीय कानून में ‘संपत्ति’ मानी जाएगी, मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

मद्रास हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि क्रिप्टोकरेंसी को भारतीय कानून में संपत्ति माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही यह कानूनी मुद्रा नहीं है, लेकिन इसमें संपत्ति के सभी आवश्यक गुण मौजूद हैं, जिससे इसे ‘वर्चुअल डिजिटल एसेट’ का दर्जा दिया जा सकता है।

Posts by : Kratika Maheshwari | Updated on: Sun, 26 Oct 2025 1:44:07

क्रिप्टोकरेंसी अब भारतीय कानून में ‘संपत्ति’ मानी जाएगी, मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

मद्रास हाईकोर्ट ने हालिया फैसले में स्पष्ट किया है कि क्रिप्टोकरेंसी को भारतीय कानून के अंतर्गत संपत्ति माना जाएगा। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि भले ही क्रिप्टोकरेंसी को कानूनी मुद्रा (legal tender) का दर्जा नहीं मिला हो, फिर भी उसमें संपत्ति के वे गुण मौजूद हैं जो इसे अधिकारों और हितों की श्रेणी में लाते हैं — इसलिए इसे 'वर्चुअल डिजिटल एसेट' के रूप में देखा जा सकता है।

जस्टिस आनंद वेंकटेश का मत


जस्टिस आनंद वेंकटेश ने अपने निर्णय में कहा कि क्रिप्टो न तो पारंपरिक भौतिक संपत्ति है और न ही मुद्रा, पर यह ऐसी ऐसी डिजिटल संपत्ति है जिसे कोई व्यक्ति अपने पास रख सकता है, ट्रस्ट कर सकता है या उस पर वैधानिक दावे बनाए जा सकते हैं। यह निर्णय एक याचिका पर आया जिसमें निवेशक की XRP होल्डिंग्स को वजीरएक्स पर हुए साइबर हमले के बाद फ्रीज कर दिया गया था।

मामला क्या था — नुकसान और होल्डिंग


याचिकाकर्ता ने कोर्ट में बताया कि उन्होंने जनवरी 2024 में वजीरएक्स पर कुल ₹1,98,516 का निवेश कर 3,532.30 XRP खरीदे थे। जुलाई 2024 में वजीरएक्स प्लेटफॉर्म पर एक बड़े साइबर हमले की सूचना आई, जिसमें मुख्यतः Ethereum और ERC-20 टोकन चोरी हुए। कंपनी ने उस हमले के कारण लगभग 230 मिलियन डॉलर के नुकसान का हवाला दिया और सभी उपयोगकर्ताओं के खातों को अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया गया — जिससे याचिकाकर्ता अपने XRP तक पहुंच न पा सकी।

निवेशक की दलील

निवेशक ने दलील दी कि उनके XRP, हैक किए गए टोकन्स से अलग हैं और वजीरएक्स ने उन टोकन्स को ट्रस्ट-कस्टोडियन की तरह संभाला हुआ था। इसलिए कंपनी को उनके XRP का पुनःवितरण, उपयोग या किसी री-एलोकेशन (reallocation) की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए—जब तक विवाद का निपटारा न हो जाए।

कंपनी का रुख और सिंगापुर कनेक्शन


वजीरएक्स के भारतीय संचालन की जिम्मेदार Zanmai Labs ने कोर्ट को बताया कि वास्तविक स्वामित्व सिंगापुर की Zettai Pte Ltd के पास है और हैक के बाद सिंगापुर हाईकोर्ट के मार्गदर्शन में एक पुनर्गठन योजना लागू की जा रही है। इस योजना के तहत कंपनी ने कहा कि नुकसान को 'प्रो-राटा' आधार पर सभी उपयोगकर्ताओं में बांटा जाएगा।

अदालत ने अधिकार क्षेत्र स्वीकारा

मगर मद्रास हाईकोर्ट ने यह तर्क स्वीकार किया कि निवेश लेन-देन भारत से ही हुआ था और इसलिए भारतीय न्यायिक अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) इस मामले पर लागू होता है। जस्टिस वेंकटेश ने अपने विस्तृत 54-पन्नों के फैसले में तर्क दिए कि किन आधारों पर क्रिप्टोकरेंसी को संपत्ति माना जा सकता है।

संपत्ति के गुण: पहचान, हस्तांतरण और नियंत्रण

अदालत ने कहा कि ब्लॉकचेन पर मौजूद डिजिटल टोकन — जिन्हें पहचाना जा सकता है, ट्रांसफर किया जा सकता है और निजी कुंजी (private key) के जरिये नियंत्रित किया जा सकता है — ये सब गुण पारंपरिक संपत्ति के समान हैं। इसी तर्क के साथ कोर्ट ने अतीत के कुछ राष्ट्रीय मामलों का संदर्भ दिया, जिनमें संपत्ति को व्यापक वैधानिक हित या मूल्यवान अधिकार माना गया था।

विदेशी फैसलों का भी हवाला

निर्णय में न्यायालय ने कुछ अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का भी जिक्र किया, जहां विदेशी न्यायालयों ने क्रिप्टो संबंधी विवादों में डिजिटल टोकन को संपत्ति के रूप में माना। इन उदाहरणों ने मद्रास हाईकोर्ट के दृष्टिकोण को समर्थन दिया कि वैधानिक और व्यावहारिक दृष्टि से क्रिप्टो पर संपत्ति-आधारित अधिकार लागू किए जा सकते हैं।

कोर्ट का निष्कर्ष और आदेश

अदालत ने पाया कि वजीरएक्स पर हुए हैक में केवल Ethereum और ERC-20 टोकन ही प्रभावित हुए थे, जबकि आवेदक के 3,532.30 XRP पूरी तरह से अलग थे। अतः Zanmai Labs द्वारा उन XRP पर दावा करना या उन्हें पुनःवितरित करने की कोई योजना लागू करना न्यायोचित नहीं माना गया। यदि सिंगापुर में चल रही पुनर्गठन प्रक्रिया के तहत आवेदक की संपत्ति का मूल्य घटा दिया गया, तो वे कमजोर पक्ष बन जाते — इसलिए उन्हें न्यायिक सुरक्षा दी जानी चाहिए।

अंततः मद्रास हाईकोर्ट ने Zanmai Labs और उसके निदेशकों को निर्देश दिया कि वे आवेदक के XRP को न तो बांटें, न पुनः आवंटित करें और न ही पुनर्वितरित करें — जब तक कि मध्यस्थता (arbitration) या अन्य वैध समाधान द्वारा स्पष्ट नहीं किया जाता।

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