
दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं—एक वो जो ईश्वर में अटूट श्रद्धा रखते हैं और हर मोड़ पर उसका नाम लेते हैं और दूसरे वो, जिन्होंने आस्था से दूरी बना ली है। कुछ लोग मंदिर-मस्जिद-गिरिजाघर की राह पकड़ते हैं, तो कुछ लोग विज्ञान, तर्क और अनुभवों के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब लोग खुद से सवाल करने लगे हैं, तो ईश्वर पर विश्वास भी उसी अनुपात में कम होता दिखाई दे रहा है।
दुनिया में सबसे अधिक आबादी ईसाई धर्म मानने वालों की है, जो सदियों से अपने धर्म की शिक्षाओं को लेकर चलते आ रहे हैं। इसके बाद मुस्लिम समुदाय आता है, जिनकी संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। इन दोनों के बाद आते हैं वो लोग जो खुद को किसी भी ईश्वर से नहीं जोड़ते – यानी नास्तिक और फिर हैं हिंदू धर्म के अनुयायी। लेकिन जिस तेजी से आस्था की ज़मीन खिसक रही है, उससे नास्तिकों की संख्या भी बढ़ रही है – और यह बदलाव सिर्फ पश्चिमी देशों में ही नहीं, भारत जैसे परंपरावादी देश में भी देखा जा रहा है।
दुनिया में कितने हैं नास्तिक?
आज की तारीख में करीब 190 करोड़ लोग खुद को नास्तिक बताते हैं। ये वो लोग हैं, जो किसी संगठित धर्म या ईश्वर की संकल्पना को नहीं मानते। साल 2010 में इनकी संख्या 160 करोड़ थी, यानी सिर्फ 15 साल में यह आंकड़ा 30 करोड़ तक बढ़ चुका है। इनमें से ज्यादातर लोग ऐसे होते हैं जो किसी धर्म में पैदा हुए थे, लेकिन वक्त, अनुभव या व्यक्तिगत सोच ने उन्हें इस रास्ते से अलग कर दिया। और ये बदलाव खासतौर पर ईसाई बहुल देशों में तेज़ी से देखा जा रहा है, जहां अब युवा पीढ़ी परंपराओं से सवाल पूछ रही है।
कौन-कौन से देश हैं सबसे बड़े नास्तिक?
ग्लोबल रिपोर्ट्स के मुताबिक, दुनिया के 89% नास्तिक सिर्फ 10 देशों में रहते हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से अकेले चीन में ही 67% नास्तिक लोग हैं। वहां सरकार की नीतियां, समाज का ढांचा और शिक्षा पद्धति ने धर्म से दूरी को बढ़ावा दिया है।
इसके बाद यूके और फ्रांस जैसे देशों में एक समय 50% आबादी खुद को ईसाई कहती थी, लेकिन अब वहां करीब 40% लोग खुद को नास्तिक मानते हैं।
अमेरिका में नास्तिकों की संख्या साल 2020 तक 10.09 करोड़ पहुंच गई थी।
जापान में 7.26 करोड़,
वियतनाम में 6.64 करोड़,
जर्मनी में 3.02 करोड़,
रूस में 2.96 करोड़,
ब्राजील और फ्रांस दोनों में 2.81 करोड़,
यूके में 2.71 करोड़ और
साउथ कोरिया में 2.50 करोड़ लोग नास्तिक हैं।
भारत में क्या है स्थिति?
अगर बात भारत की करें, तो यहां अब भी आस्था की पकड़ मजबूत मानी जाती है, लेकिन धीरे-धीरे बदलाव दिख रहा है। साल 2010 में भारत में सिर्फ 30,000 लोग खुद को नास्तिक कहते थे, वहीं 2020 तक यह संख्या बढ़कर 50,000 हो गई। यह भले ही वैश्विक आंकड़ों के मुकाबले कम हो, लेकिन 10 साल में 67% की वृद्धि बताती है कि सोच में बदलाव हो रहा है।
भारत में बौद्ध धर्म के 33% लोग ऐसे हैं जो किसी संगठित धर्म या ईश्वर में विश्वास नहीं करते।
आखिर में यह कहा जा सकता है कि जैसे-जैसे समाज में शिक्षा, तर्क और आत्म-विश्लेषण की भावना बढ़ रही है, लोग खुद से सवाल कर रहे हैं—"क्या हम जो मानते हैं, वही सत्य है?" और शायद यही सवाल, उन्हें ईश्वर से दूर और सोच की गहराई की ओर ले जा रहा है।














