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स्पेस में 9 महीने बिताने के बाद धरती पर लौट रहीं सुनीता विलियम्स, इन स्वास्थ्य समस्याओं का करना पड़ सकता हैं सामना

पिछले 9 महीने से अंतरिक्ष में रहने के बाद, सुनीता विलियम्स और उनके साथी एस्ट्रोनॉट्स 19 मार्च को फ्लोरिडा के तट पर लौटने जा रहे हैं। जानें, अंतरिक्ष यात्रा के बाद उनके शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव और स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में।

Posts by : Nupur Rawat | Updated on: Tue, 18 Mar 2025 6:12:44

स्पेस में 9 महीने बिताने के बाद धरती पर लौट रहीं सुनीता विलियम्स, इन स्वास्थ्य समस्याओं का करना पड़ सकता हैं सामना

पिछले 9 महीने से अंतरिक्ष में रहने के बाद, अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और उनके साथ एस्ट्रोनॉट बुच विल्मोर समेत दो अन्य एस्ट्रोनॉट्स 19 मार्च को सुबह करीब 3:27 बजे फ्लोरिडा के तट पर सुरक्षित रूप से लौटने जा रहे हैं। ये चारों एस्ट्रोनॉट्स स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क के ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट से धरती पर आ रहे हैं। हालांकि, जब वे लंबे समय बाद पृथ्वी पर लौटेंगे, तो यह जानना महत्वपूर्ण है कि अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने के बाद उनके शरीर पर क्या प्रभाव पड़ सकते हैं और किन स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

अंतरिक्ष में जाने के दौरान, शरीर में कई बदलाव होते हैं। जब कोई अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी से बाहर जाता है, तो उसकी शारीरिक स्थिति में गिरावट आने लगती है। ग्रेविटी का अंतर शरीर पर गहरा प्रभाव डालता है, जिससे उन्हें चलने, खड़े होने और संतुलन बनाए रखने में कठिनाई होती है। हालांकि, अंतरिक्ष यात्रा के बाद विशेष डाइट और एक्सरसाइज से रिकवरी में मदद मिलती है, फिर भी स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, जैसे मांसपेशियों और हड्डियों का कमजोर होना, रक्त परिसंचरण में समस्या और मानसिक तनाव।

शरीर में हो सकती है खून की कमी

यूनिवर्सिटी ऑफ़ ओटावा द्वारा किए गए एक रिसर्च में 14 अंतरिक्ष यात्रियों की शारीरिक स्थिति पर अध्ययन किया गया था। इनमें ब्रिटेन के टिम पेक भी शामिल थे, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर छह महीने बिताए थे। इस अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि अंतरिक्ष में जाने पर इन अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं (रेड ब्लड सेल्स) की संख्या में महत्वपूर्ण कमी आ गई थी। रिसर्च में यह भी पता चला कि अंतरिक्ष में रेड ब्लड सेल्स का नष्ट होना बढ़ जाता है, और यह पूरे मिशन के दौरान लगातार होता रहता है। हालांकि, इस प्रक्रिया के कारणों का अभी तक पता नहीं चल सका, लेकिन जब ये अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी पर लौटे, तो उन्हें कमजोरी और थकान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

मांसपेशियां और हड्डियां कमजोर होने से चलने-फिरने में दिक्कत

पृथ्वी पर हमारा शरीर गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ काम करता है, जिससे मांसपेशियां और हड्डियां मजबूत बनी रहती हैं। लेकिन अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण का अभाव होने के कारण मांसपेशियों का इस्तेमाल कम हो जाता है, और वे कमजोर होने लगती हैं। इसके अतिरिक्त, स्पेस में हड्डियों पर किसी प्रकार का वजन नहीं पड़ता, जिससे उनका घनत्व धीरे-धीरे कम होने लगता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रत्येक महीने में हड्डियों का घनत्व लगभग 1% कम हो जाता है। अगर लंबे समय तक हड्डियों पर कोई दबाव नहीं पड़ा तो यह कमजोर होती जाती हैं, जिससे चलने-फिरने, उठने-बैठने और सामान्य शारीरिक गतिविधियों में दिक्कतें आने लगती हैं।

इसलिए अंतरिक्ष यात्रा के बाद, अंतरिक्ष यात्रियों को विशेष व्यायाम और फिजिकल थेरेपी की आवश्यकता होती है ताकि उनकी मांसपेशियों और हड्डियों को फिर से मजबूत किया जा सके। इसके अलावा, वजन बढ़ाने के लिए खास डाइट भी दी जाती है, ताकि उनका शारीरिक संतुलन और ताकत लौट सके। इस प्रक्रिया को पुनर्वास (rehabilitation) कहा जाता है, और यह महत्वपूर्ण होती है ताकि अंतरिक्ष यात्री अपने सामान्य जीवन में वापस लौट सकें।

हृदय संबंधी समस्याएं और रक्त परिसंचरण

अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने के कारण हृदय पर भी दबाव पड़ता है। गुरुत्वाकर्षण के बिना, शरीर के अंगों को रक्त और तरल पदार्थ की समान मात्रा में आपूर्ति करने में कठिनाई होती है, जिससे रक्त परिसंचरण में बदलाव आता है। कुछ अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी पर लौटने के बाद हृदय संबंधी समस्याएं और रक्त प्रवाह में गड़बड़ी का सामना करना पड़ा। इसलिए, उन्हें विशेष निगरानी और चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है ताकि उनके हृदय और रक्त परिसंचरण प्रणाली की स्थिति को ठीक किया जा सके।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं

न केवल शारीरिक बदलाव होते हैं, बल्कि अंतरिक्ष यात्रियों की मानसिक स्थिति भी प्रभावित होती है। लंबे समय तक अकेलेपन, उच्च दबाव और कार्य के दबाव के कारण मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। कुछ अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी पर लौटने के बाद अवसाद (depression) और चिंता (anxiety) जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके कारण, मानसिक स्वास्थ्य के उपचार और थेरेपी की भी आवश्यकता होती है ताकि वे सामान्य जीवन जीने के योग्य बन सकें।

इम्यून सिस्टम पर असर

अंतरिक्ष में ज्यादा समय बिताने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) पर गहरा असर पड़ सकता है। जीरो-ग्रैविटी के कारण शरीर का इम्यून सिस्टम पूरी तरह से काम नहीं कर पाता, जिससे शरीर के अंदर मौजूद बैक्टीरिया और वायरस से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है। यह अंतरिक्ष यात्रियों को बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकता है। इसके अलावा, अंतरिक्ष में उच्च स्तर के विकिरण (radiation) का प्रभाव भी शरीर पर पड़ता है, जिससे उनका इम्यून सिस्टम और भी कमजोर हो सकता है। लगातार उच्च विकिरण के संपर्क में रहने से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। जब एस्ट्रोनॉट पृथ्वी पर लौटते हैं, तो उनका इम्यून सिस्टम सामान्य लोगों की तरह काम नहीं करता और उन्हें संक्रमण या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इस वजह से अंतरिक्ष यात्रियों की स्वास्थ्य स्थिति की नियमित निगरानी और उपचार जरूरी होता है।

सूंघने की क्षमता कमजोर होना


अंतरिक्ष में समय बिताने के दौरान, एस्ट्रोनॉट्स का खून ऊपर की ओर बहने लगता है, जिससे चेहरे में सूजन आ सकती है और नाक बंद हो सकती है। इस प्रक्रिया को "फ्लुइड शिफ्ट" कहा जाता है, जिसमें शरीर के तरल पदार्थों का वितरण प्रभावित होता है। इस कारण नाक के अंदर और आसपास की नलिकाओं में सूजन और जमा होने लगती है। नाक के मार्ग में जमा हुई परतें सूंघने की क्षमता को कम कर सकती हैं। जब एस्ट्रोनॉट्स पृथ्वी पर लौटते हैं, तो उन्हें इस समस्या का सामना करना पड़ता है और उन्हें सामान्य रूप से सूंघने में कठिनाई होती है। इसके अलावा, अंतरिक्ष में लंबे समय तक लेटे रहने की वजह से रक्त प्रवाह और लसीका प्रणाली में बदलाव आता है, जो सूंघने की क्षमता को और प्रभावित करता है।

आंखों की समस्याएं

अंतरिक्ष में रहने से एस्ट्रोनॉट्स को दृष्टि में समस्याएं भी हो सकती हैं। जीरो-ग्रैविटी के कारण शरीर के अंदर मौजूद तरल पदार्थ आंखों में जमा हो सकते हैं, जिससे आंखों का दबाव बढ़ जाता है और दृष्टि में धुंधलापन या अन्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इससे अंतरिक्ष यात्रियों को वापस पृथ्वी पर लौटने के बाद भी कुछ समय तक दृष्टि की समस्याएं हो सकती हैं। वैज्ञानिकों ने इस पर काम करना शुरू कर दिया है, ताकि भविष्य में ऐसी समस्याओं से निपटने के लिए उपाय विकसित किए जा सकें।

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