
भारतीय विज्ञापन जगत ने आज एक महान हस्ती को खो दिया। पीयूष पांडे, जिन्हें ‘एड गुरु’ कहा जाता है, ने हिंदी भाषा को विज्ञापनों की आत्मा बना दिया। उनके क्रिएटिव आइडियाज ने ब्रांड्स को घर-घर तक पहुँचाया और आम भाषा को सरल, जीवंत और दिलचस्प बनाया। 23 अक्टूबर 2025 को उनका निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार 25 अक्टूबर को सुबह 11 बजे होगा।
पीयूष पांडे भारतीय विज्ञापन उद्योग के ऐसे सितारे थे जिन्होंने हिंदी भाषा को विज्ञापन की आत्मा बना दिया। उनके विज्ञापन केवल ब्रांड को बेचते नहीं थे, बल्कि कहानी कहते थे, भावना जगाते थे और लोगों के दिलों को छूते थे।
पांडे के करियर में कई ऐसे विज्ञापन हैं, जिन्होंने न केवल ब्रांड की पहचान बनाई बल्कि भारतीय दर्शकों के दिलों में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। आइए जानते हैं उनके पांच सबसे यादगार विज्ञापनों के बारे में:
1. फेविकॉल का ट्रक वाला विज्ञापन (2007)
इस विज्ञापन में, एक ट्रक पर ढेर सारे लोग बैठे हुए होते हैं, और ऊबड़-खाबड़ सड़क पर भी गिरते नहीं। पांडे ने साधारण गोंद को फेविकॉल बना दिया।
प्रभाव:
इस विज्ञापन ने फेविकॉल को केवल एक गोंद से बढ़ाकर हर घर में पहचान दिला दी। लोग इस एड की अद्भुत कल्पना और हास्य से मंत्रमुग्ध हो गए। यह केवल एक उत्पाद का प्रचार नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रतीक बन गया, जिसने फेविकॉल को राष्ट्रीय आइकॉन की तरह स्थापित कर दिया।
2. कैडबरी डेयरी मिल्क – क्रिकेट वाला विज्ञापन (2007)
एक बच्चा छक्का मारता है और खुशी में पूरा मोहल्ला झूम उठता। पांडे की आवाज और “कुछ खास है जिंदगी में” की लाइन ने इसे बेहद यादगार बना दिया।
प्रभाव:
यह विज्ञापन केवल चॉकलेट बेचने तक सीमित नहीं रहा। इसमें क्रिकेट के उत्साह और जीत की भावना को पारिवारिक और सामाजिक संबंधों के साथ जोड़कर लोगों के दिलों में खुशियों का जश्न बिठा दिया गया। यह हर उम्र के दर्शकों के लिए भावनात्मक रूप से जुड़ने वाला अनुभव बन गया।
3. एशियन पेंट्स – “हर घर कुछ कहता है” (2002)
इस विज्ञापन में एक परिवार की कहानी दिखाई गई, जहां पिता की यादें दीवारों पर जीवित हो उठती हैं।
प्रभाव:
“हर घर कुछ कहता है” का संदेश लोगों के घरों और उनके व्यक्तिगत अनुभवों से गहरे जुड़ा। इसने एशियन पेंट्स को केवल एक पेंट ब्रांड से अधिक, एक भावनात्मक पहचान और यादगार प्रतीक में बदल दिया। विज्ञापन ने घरों को रंगों और यादों के माध्यम से जीवन्त किया और यह हर घर में बात का विषय बन गया।
4. हच (वोडाफोन) – पग वाला विज्ञापन (2003)
एक प्यारा पग बच्चे का पीछा करता है, और यह मोबाइल नेटवर्क की विश्वसनीयता और दोस्ती का प्रतीक बनता है।
प्रभाव:
इस विज्ञापन ने मोबाइल कनेक्टिविटी और विश्वास को सरल, प्यारे और यादगार तरीके से प्रस्तुत किया। “भाई, हच है ना!” जैसे डायलॉग्स ने इसे घर-घर में प्रसिद्ध किया। यह केवल नेटवर्क की पहचान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोगों के मन में संबंध और भरोसे की भावना को भी जोड़ने वाला अभियान बन गया।
पल्स पोलियो – “दो बूंदें जिंदगी की”
सरल लेकिन जीवनदायिनी संदेश: बच्चों को पोलियो की दवा दें।
प्रभाव:
इस विज्ञापन ने समाज में स्वास्थ्य और सुरक्षा के संदेश को बेहद प्रभावी ढंग से पहुंचाया। इसकी सरलता और स्पष्टता ने इसे हर परिवार तक पहुँचने योग्य और यादगार बना दिया। यह बच्चों की सुरक्षा और पोलियो उन्मूलन के प्रयासों में एक स्थायी छाप छोड़ गया।
राजनीति में पांडे की छाप: बीजेपी – “अब की बार, मोदी सरकार” (2014)
राजनीतिक विज्ञापन के क्षेत्र में भी पीयूष पांडे की छाप अमिट रही। 2014 के आम चुनाव के दौरान, उन्होंने बीजेपी के लिए तैयार किया था “अब की बार, मोदी सरकार” का स्लोगन। यह केवल एक वाक्य नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक और भावनात्मक संदेश था जिसने करोड़ों भारतीयों के दिलों तक सीधे पहुँच बनाई।
इस स्लोगन की ताकत इसका सरलता और प्रत्यक्षता में निहित था। यह आम जनता के लिए याद रखना आसान था और एक स्पष्ट संदेश देता था: समय है बदलाव का, नया नेतृत्व आए। पांडे ने इसे इस तरह तैयार किया कि यह चुनावी प्रचार की सभी भाषाओं और प्लेटफॉर्म्स पर सहज रूप से अपनाया जा सके।
सिर्फ शब्दों की सुंदरता ही नहीं, बल्कि इसके भावनात्मक जुड़ाव और सामूहिक उम्मीदों को व्यक्त करने की क्षमता ने इसे प्रभावशाली बनाया। लोगों ने इसे केवल पढ़ा नहीं, बल्कि महसूस किया। यह स्लोगन मोदी की छवि और पार्टी के संदेश को एक सशक्त पहचान दे गया।
नतीजा यह हुआ कि यह राजनीतिक नारा जनता के मानस में बैठ गया, सोशल मीडिया, टीवी और जनसभाओं में हर जगह गूँजने लगा। यही एक लाइन बीजेपी की राजनीतिक यात्रा में “ब्रांडिंग और पहचान” का निर्णायक मोड़ बन गई।
संक्षेप में, पीयूष पांडे ने इस सरल लेकिन सशक्त संदेश के जरिए बीजेपी को चुनावी धरातल पर जीवित और मजबूत कर दिया, और यह साबित किया कि विज्ञापन और स्लोगन केवल ब्रांड ही नहीं, बल्कि राजनीति में भी जनता के मन में बदलाव ला सकते हैं।
पीयूष पांडे ने विज्ञापन की दुनिया में कला, सरलता और भावनात्मक गहराई को मिलाकर अद्भुत काम किया। उनके विज्ञापन और स्लोगन केवल ब्रांड या पार्टी के प्रचार का हिस्सा नहीं रहे, बल्कि लोगों के दिलों में स्मृति, भावना और पहचान के प्रतीक बन गए। उनकी यह छाप भारतीय विज्ञापन जगत और समाज पर सदैव अमिट रहेगी।














