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‘कांतारा’ की अग्नि के पीछे: ऋषभ और प्रगति शेट्टी की आस्था, समर्पण और सिनेमा की अनकही कहानी

उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि कंतारा एक ऐसी घटना बन जाएगी - यह फिल्म भाषाई बाधाओं को पार करते हुए, एक राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाएगी और इसका प्रीक्वल, कंतारा चैप्टर 1, एक आध्यात्मिक और सिनेमाई घटना में बदल जाएगा।

Posts by : Rajesh Bhagtani | Updated on: Wed, 08 Oct 2025 11:47:38

‘कांतारा’ की अग्नि के पीछे: ऋषभ और प्रगति शेट्टी की आस्था, समर्पण और सिनेमा की अनकही कहानी

जब 'कंतारा' पहली बार रिलीज़ हुई थी, तो यह एक साधारण, क्षेत्रीय फिल्म थी जिसमें बड़े सपने थे और कोई उम्मीद नहीं थी। ऋषभ शेट्टी और उनकी पत्नी प्रगति शेट्टी के लिए, यह बस अपनी संस्कृति, अपनी ज़मीन और अपनी मान्यताओं से जुड़ी एक कहानी कहने के बारे में था। कांतारा चैप्टर 1 के प्रदर्शन के बाद हाल ही में दोनों कलाकारों ने इंडिया टुडे डॉट इन के साथ बातचीत करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि 'कंतारा' एक ऐसी घटना बन जाएगी - यह फिल्म भाषाई बाधाओं को पार करते हुए, एक राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाएगी और इसका प्रीक्वल, 'कंतारा चैप्टर 1', एक आध्यात्मिक और सिनेमाई घटना में बदल जाएगा।

प्रगति शेट्‌टी उस शुरुआत को विस्मय के साथ याद करती हुए कहती हैं: "पहली 'कंतारा' हमारे लिए एक बहुत छोटी क्षेत्रीय फिल्म थी। हमें उम्मीद नहीं थी कि यह इतनी बड़ी घटना बन जाएगी। यह सफ़र अपने आप में ख़ास है। यह और भी बड़ा होता जा रहा है।" इस निरंतर बढ़ते ब्रह्मांड के पीछे ऋषभ शेट्टी हैं - निर्देशक, लेखक और मुख्य अभिनेता - एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिन्हें प्रगति सिर्फ़ अपना जीवनसाथी नहीं मानतीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखती हैं जिसे ईश्वर ने उस राह पर चलने के लिए चुना है जिस पर वह चल रहे हैं।

उन्होंने बातचीत का क्रम जारी रखते हुए ऋषभ के बारे में कहा, "मेरा मानना है कि ऋषभ ईश्वर की संतान हैं। अगर वह ऐसे नहीं होते, तो एक निर्देशक, लेखक और अभिनेता होने के नाते 'कंतारा' जैसी बड़ी परियोजना को अंजाम नहीं दे पाते। उन्हें भी हमारी तरह 24 घंटे मिलते हैं। लेकिन वह उन घंटों को पूरी तैयारी में लगाते हैं। आप उन्हें 3-4 घंटे से ज़्यादा सोते हुए नहीं देखेंगे। उनकी कार्यशैली भक्तिमय है - न केवल अनुशासन में, बल्कि इस बात में भी कि उनकी कहानियाँ पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, लोककथाओं और रीति-रिवाजों में कितनी गहराई से निहित हैं।"

‘कांतारा’ की अग्नि के पीछे: ऋषभ और प्रगति शेट्टी की आस्था, समर्पण और सिनेमा की अनकही कहानी

ऋषभ शेट्टी का काम उनके लिए केवल पेशा नहीं, बल्कि पूजा है। उनका सिनेमा लोककथाओं, परंपराओं और धार्मिक अनुष्ठानों की गहराइयों से जन्म लेता है। बातचीत के इसी क्रम को जारी रखते हुए ऋषभ ने कहा, “हम हर साल अपने मंदिर के त्योहारों को पूरी श्रद्धा से निभाते हैं। जब हम ‘दैवकोला’ में जाते हैं, तो जो भावना वहाँ होती है, वही भावना हम शूटिंग के दौरान बनाए रखते हैं।” यह जुड़ाव ही उनकी फिल्मों को एक असाधारण आत्मा देता है।

प्रगति इस गहनता को समझती भी हैं और उसका हिस्सा भी बनती हैं। जहाँ ऋषभ पूरी तरह अपने काम में डूबे रहते हैं, वहीं प्रगति परिवार और जीवन के बाकी हिस्सों को संभालती हैं। “जब कोई व्यक्ति इतना समर्पित और मेहनती हो, तो मैं चाहती हूँ कि वह अपनी ऊर्जा केवल अपने काम में लगाए। बाकी सबकी जिम्मेदारी मैं उठाती हूँ,” वह कहती हैं। लेकिन प्रगति सिर्फ एक समर्थक पत्नी नहीं हैं — वह ‘कांतारा चैप्टर 1’ की कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर भी हैं। उनके लिए यह अब तक का सबसे बड़ा और चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट रहा। “हर किरदार का लुक मुझ पर निर्भर था। यह फिल्म मेरे लिए एक यूनिवर्सिटी जैसी रही,” उन्होंने मुस्कराते हुए कहा।

दो छोटे बच्चों की परवरिश और फिल्म की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था। “ऋषभ को शायद ही कभी 3–4 घंटे से ज्यादा सोते देखा हो। वह अपने शरीर, अभिनय, लेखन और निर्देशन पर एक साथ काम करते हैं। मुझे बच्चों की पूरी जिम्मेदारी निभानी होती है। लेकिन यह शिकायत नहीं, गर्व की बात है,” प्रगति बताती हैं। उनकी माँ इस सफर में उनका सबसे बड़ा सहारा रही हैं, जो लंबे शूटिंग शेड्यूल के दौरान उनके साथ रहती हैं।

ऋषभ शेट्टी के लिए ‘कांतारा’ केवल एक फिल्म नहीं, एक आध्यात्मिक दायित्व है। “हमने कभी सफलता के बारे में नहीं सोचा। बस एक सच्ची कहानी कहना चाहते थे। अब दर्शकों को पसंद आ रही है, तो बस आभार व्यक्त करते हैं,” उन्होंने कहा। यही विनम्रता और ईमानदारी उनकी कला की पहचान है।

‘कांतारा’ का संसार श्रद्धा, त्याग और जुनून से बना है — एक ऐसा संगम, जहाँ लोककथा सिनेमा में रूपांतरित होती है और आस्था कैमरे की रोशनी में सांस लेती है। इस संसार के केंद्र में हैं ऋषभ और प्रगति शेट्टी — पति-पत्नी, कलाकार, साधक। उनके लिए यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक पुकार है — अपनी संस्कृति को सिनेमा के जरिए अमर करने की पुकार।

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