
गुप्त नवरात्रि का छठा दिन—1 जुलाई 2025—देवी त्रिपुर भैरवी की उपासना के लिए अत्यंत विशिष्ट माना गया है। त्रिपुर भैरवी महाविद्याओं की छठी शक्ति हैं, जो साधक के भीतर की जड़ता को तोड़कर उसे ऊर्जा, तप और अनुशासन के मार्ग पर अग्रसर करती हैं। उनका नाम ही उनके स्वरूप का संकेत देता है—त्रिपुर यानी तीनों लोकों की अधिष्ठात्री, और भैरवी यानी तेजस्वी, उग्र और जाग्रत शक्ति।
गुप्त नवरात्रि की साधना में यह दिन आत्मसंयम, इच्छाशक्ति और साधनात्मक एकाग्रता को परखने का समय होता है।
देवी त्रिपुर भैरवी का स्वरूप और दार्शनिक प्रतीक
त्रिपुर भैरवी को रक्तवर्णा, त्रिनेत्री, चार भुजाओं वाली, खड्ग और त्रिशूल धारण किए हुए रूप में दर्शाया जाता है। वे शव पर विराजमान होती हैं, जिसका अर्थ है—मृत्यु और परिवर्तन के ऊपर अधिकार। उनके खुले बाल, जलती हुई आँखें और उग्र मुद्रा इस बात का संकेत देती हैं कि वे केवल डरावनी नहीं, बल्कि चेतना की तीव्रतम ज्वाला भी हैं।
उनकी पूजा साधक को यह सिखाती है कि बिना कठोर तप और आत्मसंयम के कोई भी गूढ़ साधना संभव नहीं। त्रिपुर भैरवी का मूल संदेश है—“अनुशासन ही आत्मविकास का द्वार है।”
त्रिपुर भैरवी और तांत्रिक साधना
त्रिपुर भैरवी तांत्रिक साधना की रक्षक देवी हैं। वे साधक के मन, वाणी और कर्म—तीनों को अनुशासित करने का कार्य करती हैं। उनकी साधना में न कोई आडंबर होता है, न कोई प्रदर्शन। यह साधना पूर्णतः आंतरिक और अति गंभीर होती है।
गुप्त नवरात्रि के छठे दिन उनकी उपासना साधक को जीवन की कठोर सच्चाइयों से रूबरू कराती है। यह दिन उस तप की शुरुआत है, जहाँ साधक अपने लक्ष्य की ओर बिना विचलित हुए आगे बढ़ने की हिम्मत पाता है।
षष्ठी तिथि और ज्योतिषीय स्थिति
षष्ठी तिथि स्वयं में स्थिरता, धैर्य और लक्ष्य के प्रति निष्ठा का प्रतीक मानी जाती है। 1 जुलाई को चंद्रमा की स्थिति साधना में मानसिक दृढ़ता को बल देने वाली है। साथ ही, शुक्र और मंगल की स्थिति उस आंतरिक ऊर्जा और आकर्षण को जाग्रत कर रही है, जो भैरवी साधना के लिए आवश्यक होती है।
इस दिन विशेष ध्यान, मौन व्रत और मानसिक शुद्धता से देवी की साधना करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
आधुनिक जीवन में त्रिपुर भैरवी की प्रासंगिकता
त्रिपुर भैरवी की साधना आज के युग में अत्यधिक प्रासंगिक है। जहाँ लोग लक्ष्य की दौड़ में बार-बार भटकते हैं, वहाँ यह साधना अनुशासन, निर्णय क्षमता और मानसिक एकाग्रता को मजबूत बनाती है। जीवन के संघर्षों में डटे रहने की शक्ति, अत्यधिक भावुकता से ऊपर उठने की समझ, और आत्म-प्रेरणा से जूझने की क्षमता—भैरवी साधना से ही संभव होती है।
गुप्त नवरात्रि का छठा दिन एक प्रकार का 'अग्निपथ' है—त्रिपुर भैरवी की साधना के माध्यम से साधक अपने भीतर की जड़ता, आलस्य और भ्रम को जला डालता है। यह दिन उस सत्य की खोज का समय है, जो तपस्या, अनुशासन और अटूट विश्वास से मिलती है। त्रिपुर भैरवी केवल देवी नहीं, बल्कि चेतना की उस मशाल का नाम है जो साधक के पथ को प्रकाशमान कर देती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक, तांत्रिक और सांस्कृतिक ग्रंथों पर आधारित है। इसमें उल्लिखित विवरण केवल जानकारी और आध्यात्मिक अध्ययन के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है।














