लॉकडाउन में अपनी मरम्मत करते हुए खुद को संवारने में जुटी प्रकृति

इंसानों के लिए कोरोना वायरस महामारी बनकर आया है लेकिन प्रकृति के लिए ये वरदान साबित हुआ है। इंसान को छोड़ दें तो ग्रह पर अन्य सभी तरह के जीवों के लिए यह जीवन को बेहतर करने वाला समय है और ऐसे समय में जब इंसान ने काम से ब्रेक ले लिया है तब प्रकृति अपनी मरम्मत करते हुए खुद को संवारने में जुट गई है।

कोरोना महामारी के बहाने इंसान को इस बात का अहसास हो गया है कि प्रकृति को संतुलन पर लाने के लिए कुछ करने की नहीं बल्कि कुछ न करने की जरूरत है। प्रकृति खुद अपने आप को ठीक कर लेती है और ऐसा ही हो रहा है। बीते दिनों में कई खबरें सामने आईं कि कैसे इस साल कछुए और अन्य समुद्री जीव बड़ी संख्या में तटों पर आना शुरु हो गए हैं, सड़कों पर जानवर नजर आ रहे हैं, पंजाब से हिमाचल प्रदेश के पहाड़ नजर आने लगे हैं और सबसे बड़ी बाद गंगा- यमुना को सरकार करोड़ो खर्च करने के बाद भी साफ नहीं कर पाई वह लगातार निर्मल होती जा रही है। प्रदूषण भी अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच गया है। अब इसमें एक और उदाहरण जुड़ गया है।
सुधर गई ओज़ोन परत की सेहत

इतिहास में ओजोन परत में हुआ सबसे बड़ा छेद अब भर गया है। दुनिया में बड़े पैमाने पर औद्योगिक गतिविधियां बंद हैं इस बीच असामान्य वायुमंडलीय परिस्थितियों के कारण आर्कटिक के ऊपर ओजोन परत में 10 लाख वर्ग किलोमीटर का सबसे बड़ा छेद भर गया है।

यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट (ECMWF) द्वारा कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (C3S) और कोपरनिकस एटमॉस्फेरिक मॉनिटरिंग सर्विसेज (CAMS) ने इस बात की पुष्टि की है।

वैज्ञानिक लगातार पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाने वाली ओज़ोन के इस छेद पर लगातार नजर बनाए हुए थे। हालांकि अभी लॉकडाउन और ओजोन परत के छेद भरने के बीच कोई सीधा संबंध नहीं मिला है लेकिन इस घटना का अध्ययन लगातार किया जा रहा है।

धरती के ऊपर वायुमंडल में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के ऊपर ओजोन लेयर मौजूद है। इससे पहले लॉकडाउन में दक्षिणी ध्रुव के ओजोन लेयर के छेद को कम होने की बात सामने आई थी। मार्च- अप्रैल महीने में उत्तरी ध्रुव की ओजोन लेयर पर एक बड़ा छेद नजर आया था, जिसके बाद वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि यह अब तक का इतिहास का सबसे बड़ा छेद है जो 10 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला था। लॉकडाउन से सीधा संबंध नहीं

फिलहाल छेद के बंद होने का लॉकडाउन के प्रदूषण के स्तर में कमी के साथ फिलहाल कोई सीधा संंबंध सामने नहीं आया है। यह ध्रुवीय भंवर और उच्च ऊंचाई वाली धाराओं की वजह से हुआ है जो ध्रुवीय क्षेत्रों में ठंडी हवा लाने के लिए जिम्मेदार हैं। विशेष रूप से जुलाई से सितंबर के दौरान दक्षिणी ध्रुव पर अंटार्कटिक के ऊपर ओजोन परत में इस तरह के छेद काफी आम हैं लेकिन, इस बार बीते अप्रैल में आर्कटिक के ऊपर देखा गया ओजोन परत का छेद असामान्य था, जो कि अब भर गया है।

वैज्ञानिक लगातार इस घटना का अध्ययन कर रहे हैं, और इस बात पर भी ध्यान दिया जा रहा है कि जैसे पर्यावरण के अन्य कई पहलुओं पर लॉकडाउन का सकारात्मक असर पड़ा है, क्या उसका संबंध ओज़ोन के छेद भरने से भी है या नहीं।