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इंदिरा गांधी ने लालकिले के नीचे डलवाया था टाइम कैप्सूल, हुआ था हंगामा

विपक्ष के लोगों ने आरोप लगाया था कि इस कालपत्र में इंदिरा ने अपने परिवार का महिमामंडन किया है। हालांकि इंदिरा सरकार के इस कालपत्र में क्या लिखा था, उसका राज आज तक नहीं खुला।

Posts by : Priyanka Maheshwari | Updated on: Tue, 28 Jul 2020 2:28:34

इंदिरा गांधी ने लालकिले के नीचे डलवाया था टाइम कैप्सूल, हुआ था हंगामा

अयोध्या में राम मंदिर की नींव में 200 फीट नीचे टाइम कैप्सूल को डालने का फैसला लिया गया है। इसमें मंदिर की पूरी डिटेल होगी। टाइम कैप्सूल एक कंटेनर की तरह होता है। यह हर तरह के मौसम का सामना कर सकता है। आमतौर पर भविष्य में लोगों के साथ कम्युनिकेशन करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। इससे पुरातत्वविदों या इतिहासकारों को स्टडी में मदद मिलती है। इतिहास पर नजर डालें तो साल 1973 में पूर्व पीएम इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने भी ऐसा ही एक टाइम कैप्सूल लाल किले के 32 फीट नीचे डलवाया था। इसे कालपत्र का नाम दिया गया था। विपक्ष के लोगों ने आरोप लगाया था कि इस कालपत्र में इंदिरा ने अपने परिवार का महिमामंडन किया है। हालांकि इंदिरा सरकार के इस कालपत्र में क्या लिखा था, उसका राज आज तक नहीं खुला।

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साल 1970 के शुरुआती दिनों की बात है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सफलता के चरम पर थीं। उनकी ताकतवर शख्सियत ने भारत की राजनीति को नया आकार देने में मदद की थी। उस समय उन्होंने लाल किले के परिसर में टाइम कैप्सूल दफन करवाया था। इस बारे में Netaji: Rediscovered नाम की किताब में डिटेल से बताया गया है। इस किताब को कनाईलाल बासु ने लिखा है।

सरकार चाहती थी कि आजादी के 25 साल बाद की स्थिति को संजोकर रखा जाए। इसके लिए टाइम कैप्सूल बनाने का आइडिया दिया गया। आजादी के बाद 25 सालों में देश की उपलब्धि और संघर्ष के बारे में उसमें उल्लेख किया जाना था। इंदिरा गांधी की सरकार ने उस टाइम कैप्सूल का नाम कालपात्र रखा था।

अतीत की अहम घटनाओं को दर्ज करने का काम इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्ट्रिकल रिसर्च (आईसीएचआर) को सौंपा गया था। मद्रास क्रिस्चन कॉलेज के इतिहास के प्रफेसर एस।कृष्णासामी को पूरी पाण्डुलिपि तैयार करने का काम सौंपा गया था। लेकिन इसको पूरा होने से पहले ही प्रॉजेक्ट विवादों में फंस गया।

कहा जाता है कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 15 अगस्त, 1973 को इसे लाल किले के परिसर में दफन किया था। इसके बाद इस कालपात्र पर विवाद की स्थितियां बनने लगीं। इस कालपात्र को लेकर उस समय काफी हंगामा मचा था। विपक्ष का कहना था कि इंदिरा गांधी ने टाइम कैप्सूल में अपना और अपने वंश का महिमामंडन किया है। जनता पार्टी ने चुनाव से पहले लोगों से वादा किया कि पार्टी कालपात्र को खोदकर निकालेगी और देखेगी कि इसमें क्या है।

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1977 में कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। सरकार गठन के कुछ दिनों बाद टाइम कैप्सूल को निकाला गया लेकिन जनता पार्टी की सरकार ने इस बात का खुलासा नहीं किया कि उस टाइम कैप्सूल में क्या था। फिलहाल अभी तक उसके बारे में कुछ पता नहीं चल सका।

बता दे, टाइम कैप्सूल एक कंटेनर की तरह होता है जिसे विशिष्ट सामग्री से बनाया जाता है। टाइम कैप्सूल हर तरह के मौसम का सामना करने में सक्षम होता है, उसे जमीन के अंदर काफी गहराई में दफनाया जाता है। काफी गहराई में होने के बावजूद भी हजारों साल तक न तो उसको कोई नुकसान पहुंचता है और न ही वह सड़ता-गलता है।

30 नवंबर 2017 को स्पेन के बर्गोस में करीब 400 साल पुराना टाइम कैप्सूल निकला था। यह ईसा मसीह की मूर्ति के रूप में था। मूर्ति के भीतर 1777 के आसपास की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जानकारियां थीं।

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