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गरीबों के खाते में कहा से आएंगे 72 हजार रुपए जिसका राहुल गांधी ने किया है वादा, पूरी रिपोर्ट

यूनिवर्सल बेसिक इनकम (Universal Basic Income) एक निश्चित आय है, जो देश के सभी नागरिकों- गरीब, अमीर, नौकरीपेशा, बेरोजगार को सरकार से मिलती है।

Posts by : Priyanka Maheshwari | Updated on: Mon, 25 Mar 2019 3:33:20

गरीबों के खाते में कहा से आएंगे 72 हजार रुपए जिसका राहुल गांधी ने किया है वादा, पूरी रिपोर्ट

देश से गरीबी को जड़ से हटाने का कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने वादा कर दिया है. न्यूनतम आय गारंटी देने का दावा करते हुए राहुल गांधी ने कहा अगर पार्टी जीत दर्ज करती है तो सरकार देश के सबसे गरीब 20 प्रतिशत जनता को 72 हजार रुपये सालाना देगी। राहुल गांधी ने कहा कि इस योजना से पांच करोड़ परिवार यानि 25 करोड़ लोगों को फायदा होगा। राहुल गांधी ने कहा कि हम दो तरह का हिंदुस्तान नहीं चाहते हैं। गरीबों को भी न्याय मिलना चाहिए। राहुल गांधी ने कहा, "कांग्रेस सत्ता में आयी तो 20 फीसद सबसे गरीब परिवारों को सालाना 72 हज़ार रूपये सीधे अकाउंट में देंगे।" कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि हमने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कर्जमाफी का वादा किया था उसे पूरा किया। हमारी सरकार बनी तो न्यूनतम आय गारंटी वादे को भी पूरा करेंगे। उन्होंने कहा, ''यह बहुत ही प्रभावशाली और सोची समझी योजना है। हमने योजना पर कई अर्थशास्त्रियों से विचार विमर्श किया है।'' राहुल ने ने कहा, ''हमने योजना के वित्तीय प्रभावों का अध्ययन किया है। गरीबी पर आखिरी वार शुरू हो गया है।'' राहुल गांधी से पहले मोदी सरकार में पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन 'इकोनॉमिक सर्वे' में यूनिवर्सल बेसिक इनकम की वकालत कर चुके हैं।

आखिर क्या है यूनिवर्सल बेसिक इनकम (Universal Basic Income)?

Outlook की एक खबर के मुताबिक, यूनिवर्सल बेसिक इनकम (Universal Basic Income) एक निश्चित आय है, जो देश के सभी नागरिकों- गरीब, अमीर, नौकरीपेशा, बेरोजगार को सरकार से मिलती है। इस आय के लिए किसी तरह का काम करने या पात्रता होने की शर्त नहीं रहती। आदर्श स्थिति है कि समाज के हर सदस्य को जीवन-यापन के लिए न्यूनतम आय का प्रावधान होना चाहिए।

क्यों है इस स्कीम की जरूरत?

- यूनिवर्सल बेसिक इनकम से लोगों के जीवनस्तर में बहुत हद तक बदलाव आ सकता है। इससे असमानता को पाटने में मदद मिलेगी और गरीबी खत्म की जा सकती है। लोग इससे अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होंगे, जो इतनी सारी योजनाओं के लागू होने के बाद भी नहीं हो पा रही है।

- महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान, ओडिशा, झारखंड और बिहार के कई इलाकों में सरकारी नीतियों की उपेक्षा के कारण लोगों को अपना बुनियादी हक नहीं मिल पाया है। पिछले एक साल में सिर्फ झारखंड राज्य में भूख के कारण कई मौतों ने सिस्टम पर सवाल खड़े किए थे। किसानों की आत्महत्या और बेरोजगारी दर में बढ़ोतरी इस योजना को मुख्य काट हो सकता है।

- भारत इस साल वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) में 119 देशों की सूची में 103वें नंबर पर आया था। वहीं मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) की 189 देशों की सूची में 130वें नंबर पर है। इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में भारत 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर है। जो देश के लोगों के औसत जीवन स्तर को बयां करता है। इसलिए भी यूबीआई की जरूरत महसूस की जा रही है।

UBI पर क्या कहता है इकोनॉमिक सर्वे?

आर्थिक सर्वेक्षण गरीबी कम करने की कोशिश में विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं के विकल्प के रूप में यूनिवर्सल बेसिक इनकम को लागू करने की वकालत करता है। यह बताता है कि गरीबों की मदद करने का एक अधिक कुशल तरीका उन्हें UBI के माध्यम से सीधे संसाधन प्रदान करना होगा। यह मौजूदा अनेक कल्याणकारी योजनाओं और विभिन्न प्रकार के सब्सिडी का एक बेहतर विकल्प होगा।

किसने दिया था ये आइडिया?

'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' का सुझाव लंदन यूनिवर्सिटी के प्रफेसर गाय स्टैंडिंग ने दिया था। मध्य प्रदेश की एक पंचायत में पायलट प्रॉजेक्ट के तौर पर ऐसी स्कीम को लागू किया गया था, जिसके बेहद सकारात्मक नतीजे आए।

इंदौर के 8 गांवों की 6,000 की आबादी के बीच 2010 से 2016 के बीच इस स्कीम का प्रयोग किया। इसमें पुरुषों और महिलाओं को 500 और बच्चों को हर महीने 150 रुपये दिए गए। इन 5 सालों में इनमें अधिकतर ने इस स्कीम का लाभ मिलने के बाद अपनी आय बढ़ा ली।

स्कीम की ये खामियां भी


- इस स्कीम को लागू करने की कई खामियां भी हैं। मसलन, लोगों के हाथ में पैसे आने से उनकी खरीदने की शक्ति जरूर बढ़ेगी, लेकिन इससे एक खास वर्ग में आक्रोश भी हैदा हो सकता है।

- जो व्यक्ति छोटे कामों को कर उतनी कमाई कर रहा है (जितना यूबीआई के तहत मिले तो), ऐसे में किसी को बिना काम किए इतने पैसे उपलब्ध कराना विरोधाभास पैदा करेगा।

- वहीं, इस स्कीम को व्यावहारिक तौर पर भारत में लागू करना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी। क्योंकि, इसे चुनाव के मद्देनज़र वोट बैंक को साधने के लिए लोक-लुभावन योजना ही माना जा रहा है।

- इस स्कीम के लागू होने में आंकड़े भी एक समस्या है। गरीबी रेखा की परिभाषा तय नहीं है। आधार कार्ड सारे निवासियों को दे दिया गया है, यहां तक कि भारत में रह रहे बाहरी लोगों को भी आधार कार्ड दिया गया है। इनमें बांग्लादेशी लोग भी हैं। तो क्या जिनके पास आधार कार्ड है, उन सबके लिए बेसिक इनकम सुनिश्चित की जाएगी।

क्या होगा यूबीआई देने का आधार?


यूनिवर्सल बेसिक इनकम किस तरीके से लागू होगी? इसके तहत कितने रुपये मिलेंगे, फिलहाल इसपर कुछ भी तय नहीं हुआ है। हाल ही में लोकसभा में बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने यूबीआई का मसला उठाते हुए कहा था कि देश में गरीबी हटाने के लिए 10 करोड़ गरीब परिवारों के खाते में 3,000 रुपये डाले जाने चाहिए। फिलहाल सरकार हर मंत्रालयों से राय ले रही है।

इन देशों में है ऐसी सुविधा

विश्व के कई देशों में सरकारें इसी तरह की सुविधाएं दे रही हैं। इसमें ब्राजील, कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, जर्मनी, आयरलैंड जैसे देश शामिल हैं।
(इनपुट News18 के साथ)

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