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ममता बनर्जी को एक और सियासी झटका, करीबी सहयोगी चंद्रिमा भट्टाचार्य ने TMC के सभी पदों से दिया इस्तीफा

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। ममता बनर्जी की करीबी नेता चंद्रिमा भट्टाचार्य ने TMC के प्रदेश अध्यक्ष समेत सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया है। उनके इस फैसले से पार्टी की अंदरूनी राजनीति और सियासी हलचल तेज हो गई है।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Sat, 04 Jul 2026 2:50:46

ममता बनर्जी को एक और सियासी झटका, करीबी सहयोगी चंद्रिमा भट्टाचार्य ने TMC के सभी पदों से दिया इस्तीफा

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की करीबी मानी जाने वाली वरिष्ठ नेता चंद्रिमा भट्टाचार्य ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद सहित सभी संगठनात्मक जिम्मेदारियों से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना त्यागपत्र सीधे ममता बनर्जी को भेज दिया है। उनके इस फैसले ने राज्य की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है और पार्टी के भीतर चल रही हलचल को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।

जिम्मेदारी संभालने के कुछ ही सप्ताह बाद छोड़ा पद

सबसे अहम बात यह है कि चंद्रिमा भट्टाचार्य ने प्रदेश अध्यक्ष का कार्यभार संभालने के लगभग एक महीने के भीतर ही पद छोड़ने का फैसला लिया है। बीते महीने 3 तारीख को ममता बनर्जी ने उन्हें तृणमूल कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया था। उस समय इसे संगठन को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया था, लेकिन इतने कम समय में उनका इस्तीफा पार्टी नेतृत्व के लिए अप्रत्याशित माना जा रहा है।

चंद्रिमा ने केवल प्रदेश अध्यक्ष का पद ही नहीं छोड़ा, बल्कि पार्टी के भीतर निभा रही अन्य सभी जिम्मेदारियों से भी खुद को अलग कर लिया है। हालांकि, उनके इस्तीफे के पीछे की वजह को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

ममता की सबसे भरोसेमंद नेताओं में रही हैं चंद्रिमा

चंद्रिमा भट्टाचार्य लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस का प्रमुख चेहरा रही हैं और उन्हें ममता बनर्जी की विश्वसनीय सहयोगियों में गिना जाता रहा है। पश्चिम बंगाल सरकार में उन्होंने कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली है। वित्त, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, भूमि एवं भूमि सुधार, शरणार्थी तथा पुनर्वास जैसे अहम मंत्रालयों में उन्होंने मंत्री के रूप में कार्य किया है।

राजनीतिक जीवन के साथ-साथ उनका कानूनी क्षेत्र से भी गहरा जुड़ाव रहा है। तेज-तर्रार वक्ता और अनुभवी प्रशासक के रूप में उनकी पहचान बनी रही है, जिसकी वजह से संगठन और सरकार दोनों में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलती रही हैं।

राजनीतिक चुनौती के बीच बढ़ी TMC की मुश्किलें

ऐसे समय में जब ममता बनर्जी पहले से ही कई राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही हैं, चंद्रिमा भट्टाचार्य का इस्तीफा पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता पार्टी से दूरी बनाते दिखाई दिए हैं, जिससे संगठन के भीतर असंतोष और गुटबाजी की चर्चाएं लगातार तेज हुई हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के प्रभावशाली नेताओं का लगातार अलग होना आगामी रणनीति और संगठनात्मक मजबूती के लिए चुनौती बन सकता है। ऐसे में नेतृत्व के सामने कार्यकर्ताओं और नेताओं का भरोसा बनाए रखना बड़ी परीक्षा होगी।

विधानसभा चुनाव के बाद लगातार बदल रहे हैं राजनीतिक समीकरण

हालिया विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को मिली हार के बाद से पार्टी के भीतर उठापटक का दौर लगातार जारी है। चुनावी नतीजों के बाद ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को लेकर भी कई तरह की राजनीतिक चर्चाएं सामने आई हैं। इसी बीच कई नेता संगठन छोड़ चुके हैं, जबकि कुछ अन्य नेताओं के भी अलग रुख अपनाने की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं।

चंद्रिमा भट्टाचार्य को हमेशा ममता बनर्जी के सबसे करीबी नेताओं में गिना जाता रहा है। ऐसे में उनका इस्तीफा केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे विपक्ष को भी तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधने का नया अवसर मिल सकता है।

पहले भी सामने आ चुकी है बगावत की तस्वीर

चंद्रिमा भट्टाचार्य के इस्तीफे से पहले भी तृणमूल कांग्रेस में असंतोष खुलकर सामने आ चुका है। इससे पहले पार्टी के 20 सांसदों के बगावती रुख अपनाने की खबरें चर्चा में रही थीं। उस समय इस समूह ने अलग राजनीतिक राह अपनाने और नेशनल सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में विलय की इच्छा भी जताई थी।

अब चंद्रिमा भट्टाचार्य के इस्तीफे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या तृणमूल कांग्रेस आने वाले समय में संगठनात्मक संकट से उबर पाएगी या फिर पार्टी के भीतर असंतोष का सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। फिलहाल राजनीतिक हलकों की नजर ममता बनर्जी की अगली रणनीति और पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर टिकी हुई है।

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