अयोध्या स्थित राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित अनियमितताओं और चोरी के आरोपों को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) पर समाजवादी पार्टी ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाने वाले सपा नेता और पूर्व मंत्री तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय ने कहा है कि जिस मामले में अब तक कोई एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई है, उसमें एसआईटी जांच शुरू करना ही सवालों के घेरे में है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन अधिकारियों को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है, उनमें से कुछ स्वयं विभिन्न मामलों में जांच के दायरे में रहे हैं, ऐसे में उनसे निष्पक्षता की उम्मीद करना मुश्किल है।
पवन पांडेय ने कहा कि राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए दान और आभूषणों से संबंधित आरोप बेहद गंभीर हैं। उनका कहना है कि यदि मंदिर के चढ़ावे में किसी प्रकार की हेराफेरी या गड़बड़ी हुई है, तो यह केवल भक्तों की आस्था के साथ खिलवाड़ नहीं बल्कि उस भरोसे के साथ भी विश्वासघात है, जिसके आधार पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद ट्रस्ट का गठन हुआ था। उन्होंने मांग की कि इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए और स्वतंत्र रूप से जांच की निगरानी करनी चाहिए।
गौरतलब है कि राज्य सरकार ने इस मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन किया है। इस टीम की अगुवाई लखनऊ मंडल के आयुक्त विजय विश्वास पंत कर रहे हैं। उनके साथ लखनऊ रेंज की आईजी किरण एस और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन को भी जांच दल में शामिल किया गया है। यह टीम सोमवार से राम मंदिर में चढ़ावे के रूप में प्राप्त नकदी और आभूषणों में कथित गड़बड़ियों के आरोपों की जांच कर रही है।
सूत्रों के अनुसार, एसआईटी ने ट्रस्ट से जुड़े कई अधिकारियों, कर्मचारियों और अन्य संबंधित लोगों से पूछताछ शुरू कर दी है। जांच का मुख्य फोकस उन कर्मचारियों पर रखा गया है जो मंदिर में प्राप्त दान की गिनती और उससे संबंधित प्रक्रियाओं में शामिल रहे हैं। जांच दल ने ट्रस्ट प्रशासन से ऐसे सभी कर्मचारियों का विस्तृत ब्योरा भी मांगा है। बताया जा रहा है कि आवश्यकता पड़ने पर कर्मचारियों के साथ-साथ उनके परिजनों की संपत्तियों और वित्तीय लेन-देन की भी पड़ताल की जा सकती है।
प्रेस वार्ता के दौरान पवन पांडेय ने कहा कि जब जांच टीम के कुछ सदस्यों की निष्पक्षता को लेकर पहले से सवाल मौजूद हैं, तब ऐसी जांच पर जनता का भरोसा कायम रखना कठिन होगा। उन्होंने दोहराया कि चूंकि राम मंदिर ट्रस्ट का गठन सर्वोच्च न्यायालय की प्रक्रिया के तहत हुआ था, इसलिए इस मामले की जांच भी किसी स्वतंत्र और उच्चस्तरीय एजेंसी अथवा सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कराई जानी चाहिए। उन्होंने अदालत से स्वतः संज्ञान लेने की अपील भी की।
सपा नेता ने आगे मांग रखी कि जब तक पूरे मामले की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को अस्थायी रूप से भंग किया जाए। इसके साथ ही उन्होंने ट्रस्ट के मौजूदा पदाधिकारियों और ट्रस्टियों के मंदिर परिसर में प्रवेश पर भी रोक लगाने की बात कही। उनका कहना था कि जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए ऐसे कदम आवश्यक हैं ताकि किसी प्रकार का प्रभाव या हस्तक्षेप न हो सके।
पवन पांडेय ने इस दौरान उन आरोपों का भी जिक्र किया जो खुद को ट्रस्ट का पूर्व लेखा प्रभारी बताने वाले महिपाल सिंह ने लगाए थे। उनके अनुसार, महिपाल सिंह ने पहले कथित वित्तीय अनियमितताओं की शिकायत की थी, लेकिन उन आरोपों की जांच करने के बजाय उन्हें ही पद से हटा दिया गया। पांडेय ने कहा कि इस पूरे प्रकरण पर ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों को खुलकर जवाब देना चाहिए और जनता के सामने स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि भविष्य में मंदिर प्रबंधन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए अयोध्या के संत-महंतों, धार्मिक विद्वानों तथा शंकराचार्यों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। साथ ही मंदिर से जुड़े कर्मचारियों की नियुक्ति प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए, ताकि भविष्य में किसी प्रकार के विवाद या संदेह की स्थिति उत्पन्न न हो और श्रद्धालुओं का विश्वास बना रहे।













