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DSP अमीषा कौन हैं? पहली ही पोस्टिंग में सुलझाया आगरा का चर्चित बाथरूम हत्याकांड, IPS पिता की विरासत को बढ़ाया आगे

आगरा के चर्चित बाथरूम हत्याकांड का खुलासा करने वाली DSP अमीषा की प्रेरक कहानी जानिए। पहली ही पोस्टिंग में बिना डिजिटल सबूत के उन्होंने जटिल मर्डर मिस्ट्री सुलझाकर अपनी जांच क्षमता का परिचय दिया।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Sun, 05 Jul 2026 8:45:03

DSP अमीषा कौन हैं? पहली ही पोस्टिंग में सुलझाया आगरा का चर्चित बाथरूम हत्याकांड, IPS पिता की विरासत को बढ़ाया आगे

उत्तर प्रदेश के आगरा में सामने आए चर्चित बाथरूम हत्याकांड का पुलिस ने पर्दाफाश कर दिया है। सिकंदरा थाना क्षेत्र में पति सुरेंद्र शर्मा की हत्या कर शव को बाथरूम में दफनाने के सनसनीखेज मामले में मुख्य आरोपी पत्नी रूबी शर्मा को 4 जुलाई 2026 को जेल भेज दिया गया। इस जटिल हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने का श्रेय आगरा की सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) एवं डीएसपी अमीषा को दिया जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि अमीषा के पिता विनोद कुमार सिंह भी उत्तर प्रदेश पुलिस में आईपीएस अधिकारी रह चुके हैं। संयोग ऐसा रहा कि जिस वर्ष उनके पिता सेवानिवृत्त हुए, उसी वर्ष अमीषा ने डीएसपी के रूप में पुलिस सेवा में कदम रखा।

पहली तैनाती में मिला सबसे उलझा हुआ मर्डर केस

एक समाचार चैनल से बातचीत के दौरान डीएसपी अमीषा ने बताया कि वह वर्ष 2022 बैच की अधिकारी हैं और 14 फरवरी 2025 से आगरा में सहायक पुलिस आयुक्त के रूप में कार्यरत हैं। यह उनकी पहली फील्ड पोस्टिंग है। उन्होंने बताया कि अपने करियर की शुरुआत में ही उन्हें ऐसा मामला मिला, जिसमें एक पत्नी ने अपने पति की हत्या कर शव को घर के बाथरूम में दफना दिया। इस तरह का अपराध उनके लिए भी पहली बार था और इसकी जांच किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं थी।

उन्होंने कहा कि इस मामले की सबसे पेचीदा बात यह थी कि हत्या की आरोपी स्वयं मृतक की पत्नी निकली। इतना ही नहीं, उसी महिला ने सबसे पहले पुलिस थाने पहुंचकर पति की गुमशुदगी दर्ज कराई थी, जिससे शुरुआती जांच पूरी तरह दूसरी दिशा में चली गई।

पत्नी पर किसी को नहीं हुआ संदेह, इसलिए बढ़ती गई जांच की मुश्किल

डीएसपी अमीषा के मुताबिक, 26 मई 2026 को रूबी शर्मा अपने देवर अनिल शर्मा के साथ सिकंदरा थाने पहुंची थी। दोनों ने पुलिस को बताया कि सुरेंद्र शर्मा अचानक लापता हो गए हैं और काफी तलाश के बावजूद उनका कोई पता नहीं चल रहा। पुलिस ने गुमशुदगी दर्ज कर जांच शुरू कर दी।

मामले की गंभीरता को देखते हुए एसीपी अमीषा स्वयं घटनास्थल पर पहुंचीं और बारीकी से निरीक्षण किया। उन्होंने रूबी शर्मा, परिजनों, पड़ोसियों और अन्य परिचितों से विस्तार से पूछताछ की। शुरुआती जांच में किसी भी व्यक्ति ने रूबी पर शक नहीं जताया। उसका व्यवहार पूरी तरह सामान्य था और इसी वजह से जांच लगातार उलझती चली गई। पुलिस को हर पहलू पर नए सिरे से पड़ताल करनी पड़ी।

भरतपुर की घटना बनी जांच की अहम कड़ी

जांच आगे बढ़ने पर पुलिस के हाथ एक महत्वपूर्ण जानकारी लगी। पता चला कि 15 और 16 मई 2026 को सुरेंद्र शर्मा राजस्थान के भरतपुर स्थित अपने रिश्तेदारों के यहां गया था। वहां शराब के नशे में उसका विवाद हो गया था। रिश्तेदारों ने इस घटना के बाद रूबी शर्मा को फोन कर शिकायत की और यहां तक कहा कि यदि ऐसा व्यवहार जारी रहा तो वे पुलिस में शिकायत दर्ज कराएंगे।

इस विवाद के बाद सुरेंद्र आगरा लौट आया, लेकिन 18 मई के बाद वह अचानक गायब हो गया। इसके बावजूद जब भी पड़ोसी या रिश्तेदार उसके बारे में पूछते, रूबी बिना किसी घबराहट के बेहद सहज अंदाज में यही कहती कि सुरेंद्र किसी काम से बाहर गए हैं और जल्द लौट आएंगे। उसके चेहरे पर न चिंता दिखाई देती थी और न ही किसी तरह की बेचैनी, जिससे किसी को उस पर संदेह नहीं हुआ।

कोई डिजिटल सबूत न होने से उलझता गया सुरेंद्र शर्मा मर्डर केस

डीएसपी अमीषा के मुताबिक, आज के दौर में अधिकांश हत्या के मामलों में पुलिस मोबाइल फोन, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर), लोकेशन ट्रैकिंग, चैट हिस्ट्री या आपसी रिश्तों से जुड़े डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाती है। लेकिन सुरेंद्र शर्मा हत्याकांड पूरी तरह अलग था। इस मामले में न तो मोबाइल फोन कोई अहम सुराग दे पाया और न ही किसी प्रेम प्रसंग या अवैध संबंध जैसी कोई बात सामने आई, जिससे जांच की दिशा तय हो सके।

सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि हत्या की आरोपी रूबी शर्मा खुद पुलिस के सामने अपने पति की तलाश में परेशान पत्नी का किरदार निभा रही थी। वह परिजनों के साथ मिलकर खोजबीन का दिखावा भी कर रही थी। यही कारण था कि पुलिस के सामने वही एकमात्र प्रत्यक्ष गवाह भी थी और वही इस पूरे अपराध की मुख्य आरोपी भी निकली। इसी वजह से मामला लगातार उलझता चला गया और शुरुआती दिनों में जांच किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी।

घरेलू हिंसा बनी जांच की सबसे अहम कड़ी

सुरेंद्र शर्मा और रूबी शर्मा की दो बेटियां हैं। घटना वाले दिन दोनों बच्चियां अपनी दादी के साथ ताऊ के घर गई हुई थीं, इसलिए घर में केवल पति-पत्नी मौजूद थे। पुलिस जांच में सामने आया कि सुरेंद्र शर्मा किसी नियमित रोजगार से नहीं जुड़ा था और शराब पीने का आदी था। नशे की हालत में वह अक्सर अपनी पत्नी के साथ मारपीट करता था। परिवार का अधिकांश खर्च भी उसकी मां की पेंशन से चलता था।

जब जांच के दौरान घरेलू हिंसा और लगातार होने वाले विवादों की जानकारी पुलिस को मिली, तो अधिकारियों ने इसी पहलू को केस की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मानते हुए रूबी शर्मा पर संदेह गहराना शुरू किया। शुरुआती पूछताछ में उसने लगातार भ्रामक जानकारी देकर पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन जब साक्ष्यों के आधार पर उससे सख्ती से सवाल किए गए तो आखिरकार वह टूट गई और उसने पूरी साजिश का खुलासा कर दिया।

नींद की गोलियों से बेहोश किया, फिर रची खौफनाक साजिश

डीएसपी अमीषा के अनुसार, पूछताछ में रूबी शर्मा ने स्वीकार किया कि उसने पूरे अपराध को बेहद सुनियोजित तरीके से अकेले अंजाम दिया था। यही वजह रही कि कई सप्ताह तक किसी को हत्या की भनक तक नहीं लगी।

रूबी ने बताया कि भरतपुर में सुरेंद्र शर्मा के शराब के नशे में रिश्तेदारों से झगड़ा करने के बाद उसे यह डर सताने लगा था कि मामला पुलिस तक पहुंचेगा और परिवार को कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। इसी आशंका के बीच जब सुरेंद्र घर लौटा, तो उसने उसके भोजन में 15 से 20 नींद की गोलियां मिला दीं। गहरी नींद में जाने के बाद उसने उसकी हत्या कर दी और फिर शव को ठिकाने लगाने की योजना पर अमल शुरू कर दिया।

बाथरूम में दफनाया शव, फिर ऊपर बनवा दिया पक्का फर्श

पुलिस जांच में सामने आया कि घर के बाथरूम का फर्श उस समय कच्चा था। हत्या के बाद रूबी ने शव को घसीटकर बाथरूम तक पहुंचाया और वहीं छोड़ दिया। अगले दिन उसने मजदूरों से मिट्टी मंगवाई, लेकिन किसी को शक न हो, इसलिए मिट्टी सीधे घर के भीतर नहीं डलवाई बल्कि सड़क किनारे उतरवाई।

इसके बाद वह बाल्टियों में मिट्टी भर-भरकर घर के अंदर ले जाती रही और बाथरूम में पड़े शव पर डालती रही। जब शव पूरी तरह मिट्टी के नीचे दब गया, तब उसने एक राजमिस्त्री को बुलाकर उसी स्थान पर सीमेंट का पक्का फर्श बनवा दिया। चूंकि हत्या के बाद बहुत कम समय बीता था, इसलिए न तो शव से तेज दुर्गंध उठी और न ही राजमिस्त्री या आसपास के लोगों को किसी तरह का संदेह हुआ। इस तरह हत्या का राज लंबे समय तक जमीन के नीचे दफन रहा।

नायब तहसीलदार से एसीपी तक का सफर, प्रेरणा बनीं डीएसपी अमीषा

इस बहुचर्चित हत्याकांड का खुलासा करने वाली डीएसपी अमीषा की अपनी सफलता की कहानी भी काफी प्रेरणादायक है। उनका जन्म 12 मई 1997 को लखनऊ में हुआ। उनके पिता विनोद कुमार सिंह उत्तर प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस सेवा (PPS) से पदोन्नत होकर भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में पहुंचे विनोद कुमार सिंह वर्ष 2022 में डीआईजी जेल के पद से सेवानिवृत्त हुए थे।

उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद अमीषा ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) की परीक्षा की तैयारी शुरू की। अपने पहले प्रयासों में उन्होंने नायब तहसीलदार के पद पर सफलता हासिल की और प्रशासनिक सेवा में कदम रखा।

पिता की राह पर चलीं, पहली पोस्टिंग में ही जीता भरोसा

हालांकि अमीषा का सपना अपने पिता की तरह खाकी वर्दी पहनने का था। उन्होंने तैयारी जारी रखी और वर्ष 2022 में डीएसपी (पुलिस उपाधीक्षक) के पद पर चयनित हो गईं। संयोग से नायब तहसीलदार के रूप में भी उनकी तैनाती आगरा में ही रही थी, जिससे उन्हें स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था का अनुभव पहले से मिल चुका था।

डीएसपी बनने के बाद उनकी पहली पोस्टिंग आगरा ग्रामीण क्षेत्र में हुई। इसके बाद इसी वर्ष फरवरी में उन्होंने आगरा शहर में सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) का कार्यभार संभाला। पहली शहरी पोस्टिंग के दौरान ही उन्हें अपने करियर के सबसे चुनौतीपूर्ण मामलों में से एक की जांच मिली। सीमित सुराग, डिजिटल साक्ष्यों की अनुपस्थिति और आरोपी की चतुराई के बावजूद उन्होंने व्यवस्थित जांच, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और लगातार पूछताछ के आधार पर इस बहुचर्चित बाथरूम हत्याकांड का पर्दाफाश कर अपनी पेशेवर क्षमता का परिचय दिया।

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