विपक्षी गठबंधन INDIA की हालिया बैठक के दौरान समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की एक टिप्पणी ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। अपनी स्पष्टवादिता और बेबाक शैली के लिए पहचाने जाने वाले अखिलेश ने बातचीत के दौरान ऐसा संकेत दिया, जिसने कांग्रेस नेताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया। बताया जा रहा है कि दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित गठबंधन की महत्वपूर्ण बैठक में उन्होंने कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं से अनौपचारिक चर्चा के दौरान ऐसी बात कही, जिसके बाद पार्टी के भीतर कई तरह की अटकलें शुरू हो गईं।
सूत्रों के मुताबिक बातचीत के दौरान अखिलेश यादव ने कहा कि उन्हें पूरी जानकारी है कि कांग्रेस के भीतर कौन-कौन से लोग उनके और समाजवादी पार्टी के खिलाफ लगातार बयानबाजी कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने किसी नेता का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके इस बयान ने वहां मौजूद कांग्रेस नेताओं को असहज जरूर कर दिया। कई नेता यह समझने की कोशिश करते रहे कि आखिर उनका संकेत किस व्यक्ति या समूह की ओर था।
अखिलेश के इस बयान की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि उन्होंने आरोप तो लगाए, लेकिन किसी का नाम सार्वजनिक नहीं किया। यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर अलग-अलग स्तर पर इस बात को लेकर चर्चाएं शुरू हो गईं। कुछ नेताओं का मानना है कि यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश कांग्रेस के उन नेताओं की ओर इशारा हो सकती है, जो लंबे समय से समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की रणनीति को लेकर असहमति जताते रहे हैं।
राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस के कई क्षेत्रीय और वरिष्ठ नेता निजी बैठकों में अक्सर इस बात को उठाते रहे हैं कि समाजवादी पार्टी के साथ लगातार चुनावी तालमेल कांग्रेस की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को कमजोर कर रहा है। उनका तर्क है कि गठबंधन की राजनीति के कारण राज्य में पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक और संगठनात्मक ढांचा प्रभावित हुआ है।
इसी वजह से कांग्रेस के कुछ नेता समय-समय पर पार्टी नेतृत्व को सुझाव देते रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अपनी अलग राजनीतिक जमीन तैयार करनी चाहिए। कई नेताओं ने सपा के साथ रिश्तों को लेकर अधिक संतुलित और सतर्क रुख अपनाने की भी वकालत की है। माना जा रहा है कि ऐसी चर्चाओं की जानकारी अखिलेश यादव तक भी पहुंचती रही है, जिससे उनके मन में नाराजगी पैदा हुई।
करीब दो वर्षों के अंतराल के बाद आयोजित INDIA गठबंधन की इस महत्वपूर्ण बैठक में केवल अखिलेश यादव ने ही अपनी नाराजगी जाहिर नहीं की। राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव और वामपंथी दलों के प्रतिनिधियों ने भी कांग्रेस के कुछ राजनीतिक फैसलों और कार्यशैली पर सवाल उठाए। सहयोगी दलों ने कांग्रेस नेतृत्व को यह संदेश देने की कोशिश की कि गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते उसकी भूमिका समन्वयक और जोड़ने वाली ताकत की होनी चाहिए।
बैठक में मौजूद कई नेताओं ने यह भी महसूस किया कि राज्यों में सहयोगी दलों के साथ सीधी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा गठबंधन की भावना को कमजोर कर सकती है। क्षेत्रीय दलों का मानना था कि यदि विपक्षी एकता को मजबूत रखना है तो सभी सहयोगियों के हितों और राजनीतिक वास्तविकताओं का सम्मान करना आवश्यक है।
चर्चा के दौरान सहयोगी दलों की शिकायतों को सुनने के बाद राहुल गांधी ने अपेक्षाकृत नरम और सकारात्मक रुख अपनाया। उन्होंने सहयोगी दलों की चिंताओं को गंभीरता से लेने का आश्वासन दिया और गठबंधन को मजबूत बनाए रखने के लिए मिलकर काम करने की बात कही। राहुल ने यह भी संकेत दिया कि विपक्षी एकजुटता को बनाए रखना मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में बेहद जरूरी है।
बैठक के राजनीतिक पहलुओं के बीच एक हल्का-फुल्का और दिलचस्प प्रसंग भी चर्चा में रहा। पश्चिम बंगाल चुनावों के दौरान जिस तरह झालमुड़ी चर्चा का विषय बनी थी, उसी तरह इस बैठक में भी एक खाद्य पदार्थ को लेकर मजेदार बातचीत हुई। शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और सांसद संजय राउत पारिवारिक कार्यक्रम में व्यस्त होने के कारण वर्चुअल माध्यम से बैठक में शामिल हुए थे।
बैठक के दौरान कुछ नेताओं की नजर संजय राउत पर गई, जो स्क्रीन पर कुछ खाते हुए दिखाई दे रहे थे। इसे देखकर कई नेताओं ने अनुमान लगाया कि वह मुंबई की प्रसिद्ध भेलपुरी का आनंद ले रहे होंगे। इसी दौरान तृणमूल कांग्रेस के एक नेता ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी कर दी कि राउत अकेले ही भेलपुरी का मजा ले रहे हैं।
हालांकि बैठक के दौरान संजय राउत ने इस विषय पर कुछ नहीं कहा, लेकिन बाद में उन्होंने संबंधित टीएमसी नेता को संदेश भेजकर स्थिति स्पष्ट की। राउत ने बताया कि वह भेलपुरी नहीं खा रहे थे, बल्कि महाराष्ट्र का लोकप्रिय पारंपरिक व्यंजन पोहा खा रहे थे। इस छोटे से मजाकिया प्रसंग ने गंभीर राजनीतिक चर्चाओं के बीच माहौल को कुछ हल्का जरूर कर दिया।
फिलहाल अखिलेश यादव की टिप्पणी और सहयोगी दलों की नाराजगी ने यह साफ संकेत दे दिया है कि INDIA गठबंधन के भीतर कई मुद्दों पर अब भी खुलकर संवाद और बेहतर समन्वय की जरूरत है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इन मतभेदों को किस तरह संभालते हैं और विपक्षी एकता को कितना मजबूत बनाए रख पाते हैं।













