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14 वर्षों में किसी मुख्यमंत्री ने नहीं उठाया ऐसा कदम, अब कावेरी विवाद पर सीधे बातचीत की राह पर थलपति विजय; उठ रहे कई सवाल

कावेरी जल विवाद को लेकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने कर्नाटक के डी.के. शिवकुमार से सीधी बातचीत की पहल की है। 14 साल बाद प्रस्तावित इस बैठक को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज है, क्योंकि यह तमिलनाडु की तीन दशक पुरानी रणनीति से अलग कदम माना जा रहा है।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Tue, 28 Jul 2026 8:47:59

14 वर्षों में किसी मुख्यमंत्री ने नहीं उठाया ऐसा कदम, अब कावेरी विवाद पर सीधे बातचीत की राह पर थलपति विजय; उठ रहे कई सवाल

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय और कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच जल्द ही महत्वपूर्ण बैठक होने की संभावना है। कावेरी जल विवाद को लेकर प्रस्तावित यह मुलाकात राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि मुख्यमंत्री थलपति विजय का यह कदम तमिलनाडु की पिछले तीन दशकों से चली आ रही नीति से अलग माना जा रहा है। अब तक राज्य की सरकारें इस विवाद के समाधान के लिए अदालतों, ट्रिब्यूनल और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण पर भरोसा करती रही हैं, जबकि मुख्यमंत्रियों के स्तर पर सीधी बातचीत से आमतौर पर दूरी बनाए रखी गई। लेकिन विजय ने पारंपरिक रुख से हटकर संवाद की पहल की है।

तमिलनाडु का लंबे समय से यह मानना रहा है कि कावेरी जैसा जटिल और संवेदनशील मुद्दा केवल दो मुख्यमंत्रियों के बीच बातचीत से हल नहीं हो सकता। इस विवाद में इतिहास, कानूनी अधिकार, कृषि और क्षेत्रीय भावनाएं गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री विजय ने सीधे संवाद के जरिए समाधान खोजने का रास्ता अपनाया है। उन्होंने जल संकट को लेकर डी.के. शिवकुमार के साथ 31 जुलाई से 3 अगस्त के बीच बैठक का प्रस्ताव दिया है। यदि यह वार्ता होती है, तो पिछले 14 वर्षों में यह पहला अवसर होगा जब दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री कावेरी मुद्दे पर आमने-सामने बैठकर द्विपक्षीय चर्चा करेंगे।

परंपरा से अलग रास्ते पर चल रहे हैं विजय

पिछले 30 वर्षों से चेन्नई का रुख यह रहा है कि कावेरी विवाद को संस्थागत व्यवस्थाओं के माध्यम से ही सुलझाया जाना चाहिए। राज्य सरकारें कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA), ट्रिब्यूनल के आदेशों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आधार पर अपने अधिकारों की मांग करती रही हैं। तमिलनाडु की यह भी धारणा रही कि राजनीतिक बातचीत कई बार कानूनी स्थिति को कमजोर कर सकती है।

हालांकि, मुख्यमंत्री विजय की रणनीति अलग दिखाई दे रही है। वह कानूनी अधिकारों से कोई समझौता किए बिना दोनों राज्यों के बीच संवाद स्थापित करना चाहते हैं, ताकि संकट के समय पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके और टकराव की स्थिति को कम किया जा सके। उनका मानना है कि औपचारिक कानूनी प्रक्रियाओं के साथ-साथ संवाद का रास्ता भी खुला रहना चाहिए।

क्यों जरूरी हुई यह पहल?

तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में इस समय किसानों के सामने गंभीर जल संकट खड़ा हो गया है। ट्रिब्यूनल के प्रावधानों के अनुसार 1 जून से 23 जुलाई के बीच तमिलनाडु को करीब 32 हजार मिलियन क्यूबिक फीट पानी मिलना चाहिए था, लेकिन राज्य को केवल 3.5 टीएमसी पानी ही प्राप्त हुआ है।

तमिलनाडु का तर्क है कि भले ही इस वर्ष मानसून कमजोर रहा हो, लेकिन कर्नाटक को कम से कम 3 टीएमसी अतिरिक्त पानी तत्काल छोड़ना चाहिए था। पानी की कमी के कारण कावेरी डेल्टा क्षेत्र की फसलें प्रभावित हो रही हैं और किसानों के बीच चिंता बढ़ती जा रही है। ऐसे हालात में विजय की यह पहल तत्काल राहत की उम्मीद के रूप में देखी जा रही है।

विपक्ष और किसान संगठनों की चिंताएं

मुख्यमंत्री विजय की सीधी बातचीत की पहल को लेकर विपक्षी दलों और किसान संगठनों ने कुछ सवाल भी उठाए हैं। आलोचकों का मानना है कि यदि बातचीत का दायरा बढ़ता है, तो इससे कर्नाटक को कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण की भूमिका को कमजोर करने का अवसर मिल सकता है।

इसके अलावा यह आशंका भी जताई जा रही है कि कर्नाटक, पानी छोड़ने के बदले तमिलनाडु पर मेकेदातु परियोजना में प्रस्तावित बांध के विरोध को नरम करने का दबाव बना सकता है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश के. कन्नन का कहना है कि मुख्यमंत्रियों के बीच संवाद से सहयोग का माहौल जरूर बन सकता है, लेकिन यह ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनी अधिकारों का विकल्प नहीं हो सकता।

क्या हैं इस पहल के राजनीतिक मायने?

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो विजय के लिए कुछ परिस्थितियां अनुकूल मानी जा रही हैं। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है और तमिलनाडु में विजय की सरकार के साथ उसके संबंध सकारात्मक बताए जाते हैं। राहुल गांधी विजय के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए थे और डी.के. शिवकुमार के साथ भी उनके अच्छे संबंध माने जाते हैं। ऐसे में राजनीतिक संवाद का रास्ता अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि जल विवादों में राजनीतिक समीकरण अक्सर सीमित प्रभाव रखते हैं, क्योंकि दोनों राज्यों के नेताओं को अपने-अपने किसानों और जनता के हितों को प्राथमिकता देनी होती है। यदि विजय इस वार्ता के जरिए तमिलनाडु के लिए अतिरिक्त पानी सुनिश्चित करने में सफल रहते हैं और साथ ही मेकेदातु परियोजना पर राज्य के रुख से समझौता नहीं करते, तो इसे उनकी बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि माना जाएगा। वहीं, यदि बातचीत किसी ठोस परिणाम तक नहीं पहुंचती, तो आलोचक इसे राजनीतिक अनुभव की कमी और जोखिम भरा कदम भी बता सकते हैं।

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