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राजस्थान शिक्षक ट्रांसफर विवाद: डोटासरा बोले - '80% प्रिसिंपल्स का तबादला जानबूझकर किया गया'

सीकर के 200 से अधिक स्कूल प्रिंसिपलों को एक साथ दूसरी जगहों पर भेज दिया गया है, जिनमें से अधिकांश को राज्य के दूरस्थ बॉर्डर जिलों में तबादला कर दिया गया है। सबसे खास बात ये है कि ये तबादले उस क्षेत्र में हुए हैं, जिसे हाल के विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का अभेद्य गढ़ माना गया — यानी गोविंद सिंह डोटासरा का इलाका।

Posts by : Rajesh Bhagtani | Updated on: Tue, 23 Sep 2025 2:55:12

राजस्थान शिक्षक ट्रांसफर विवाद: डोटासरा बोले - '80% प्रिसिंपल्स का तबादला जानबूझकर किया गया'

राजस्थान में शिक्षकों के तबादले एक बार फिर राजनीतिक तूफान का कारण बन गए हैं। खासतौर पर सीकर जिले को लेकर जारी नई तबादला सूची ने शिक्षा जगत के साथ-साथ सियासी हलकों में भी हलचल मचा दी है। हाल ही में जारी की गई इस सूची में सीकर के 200 से अधिक स्कूल प्रिंसिपलों को एक साथ दूसरी जगहों पर भेज दिया गया है, जिनमें से अधिकांश को राज्य के दूरस्थ बॉर्डर जिलों में तबादला कर दिया गया है। सबसे खास बात ये है कि ये तबादले उस क्षेत्र में हुए हैं, जिसे हाल के विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का अभेद्य गढ़ माना गया — यानी गोविंद सिंह डोटासरा का इलाका।

शिक्षा विभाग की ओर से सोमवार रात जो चार हजार प्रिसिंपलों की तबादला सूची जारी की गई, उसने डोटासरा समर्थकों और शिक्षक संगठनों को झकझोर दिया है। सीकर जिले की अगर बात करें, तो यहां लगभग 80 प्रतिशत स्कूल प्रिसिंपलों को अचानक जैसलमेर, बाड़मेर, सिरोही, जालौर, नागौर, बूंदी और बारां जैसे सीमावर्ती जिलों में भेजा गया है। शिक्षक संगठनों ने आरोप लगाया है कि इस तबादले की आड़ में राजनीतिक बदले की भावना से कार्रवाई की गई है।

पूर्व शिक्षा मंत्री और पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए इसे “जानबूझकर की गई प्रताड़ना” बताया है। उनका कहना है कि यह सिर्फ तबादला नहीं, बल्कि शेखावाटी में कांग्रेस के मजबूत किले को तोड़ने की सोची-समझी साजिश है। डोटासरा ने कहा,

“बीच सत्र में 4000 प्रिसिंपलों का तबादला करके सरकार ने साबित कर दिया कि वह प्रतिबंध का नाटक कर रही थी। ये एकतरफा कार्रवाई जाति और राजनीतिक पृष्ठभूमि के आधार पर की गई है।”

उन्होंने यह भी कहा कि सीकर और आसपास के क्षेत्रों में कांग्रेस की जीत से बौखलाई सरकार अब शिक्षकों के माध्यम से बदला ले रही है।

“लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी थी, इसलिए अब सरकारी स्कूलों के प्रधानाचार्यों को सजा दी जा रही है।”

महिला व दिव्यांग प्रिसिंपलों पर भी कार्रवाई

सिर्फ पुरुष ही नहीं, कई महिला और दिव्यांग प्रिसिंपलों को भी दूरस्थ जिलों में भेजा गया है, जिससे परिवारिक व सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। शिक्षक संगठनों ने इसे न केवल अमानवीय करार दिया, बल्कि कहा कि सरकार ने “संवेदनशीलता” जैसे शब्द को ही दरकिनार कर दिया है।

बिना डिजायर, फिर भी तबादला

सीकर जिले में जो नए प्रिसिंपल दूसरी जगहों से भेजे गए हैं, उनमें से कई के नाम न तो विधायकों की डिजायर लिस्ट में थे, न ही किसी शिक्षक संघ की सिफारिश में। इसके बावजूद उन्हें जिले के प्रमुख स्कूलों में नियुक्त कर दिया गया, जिससे यह सवाल और गहरा गया है कि तबादला नीति पारदर्शी है या नहीं। इसके विपरीत, कई विधायकों के करीबी प्रिसिंपल्स को भी जिले के ही दूरदराज ब्लॉक्स में भेज दिया गया, जो एक और सियासी चर्चा का विषय बन गया है।

तबादलों के बीच खाली पड़े हैं सैकड़ों पद


एक ओर सरकार हजारों शिक्षकों को इधर से उधर कर रही है, दूसरी ओर सीकर जिले के सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं जहां प्रिसिंपल का पद ही खाली पड़ा है। इस विरोधाभास ने राज्य की शिक्षा नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षक संगठनों का कहना है कि पहले इन पदों को भरना प्राथमिकता होनी चाहिए थी, लेकिन सरकार ने पहले ही सेवा दे रहे प्रिसिंपलों को बाहर भेजकर और अधिक भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है।

क्या वाकई जाति के आधार पर ट्रांसफर?

डोटासरा और उनके समर्थकों का दावा है कि ट्रांसफर लिस्ट में जाति आधारित चयन भी किया गया है। जिन प्रिसिंपलों की जाति विशेष राजनीतिक विचारधारा से जुड़ी मानी जाती है, उन्हें खास तौर पर टारगेट किया गया। हालांकि सरकार की ओर से अब तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन यह विषय आने वाले दिनों में और गरमाने की संभावना है।

जनता देगी जवाब?

गोविंद सिंह डोटासरा ने अंत में चेतावनी देते हुए कहा कि “जो सरकार शिक्षकों के साथ ऐसा सुलूक कर सकती है, उसे जनता आगामी चुनावों में जवाब देना बखूबी जानती है। शेखावाटी की धरती अन्याय सहन नहीं करती।”

राजस्थान की राजनीति में शिक्षक तबादलों को हमेशा एक संवेदनशील मुद्दा माना गया है। लेकिन इस बार यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि पूरी तरह राजनीतिक मोड़ ले चुका है। अब देखना यह है कि सरकार अपने इस कदम का कैसे बचाव करती है और क्या डोटासरा व उनके खेमे का यह आक्रोश किसी बड़े राजनीतिक आंदोलन की चिंगारी बनेगा।

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