
पूरे देश में जहां इस साल 2 अक्टूबर को दशहरे का पर्व मनाया जाएगा, वहीं जयपुर जिले के रेनवाल कस्बे में नवरात्र की षष्ठी (छठे दिन) पर ही रावण दहन की ऐतिहासिक परंपरा निभाई गई। यहां 61 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया गया, जिसे देखने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी। मंच पर रामलीला का मनमोहक मंचन हुआ और राम-रावण युद्ध का दृश्य दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर गया।
आकाश को रोशन करने वाली आतिशबाजी और सजाई गई झांकियों ने पूरे माहौल को उत्सवी बना दिया। दक्षिण भारत की शैली का मुखौटा नृत्य इस बार विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। यह परंपरा यहां हर साल छठे दिन निभाई जाती है और लोग इसे बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ देखते हैं।
दशकों पुरानी परंपरा, गांव-गांव तक फैली लोकप्रियता
रावण दहन के दौरान जब दशानन की प्रतिमा धराशायी हुई तो पूरा मैदान "जय श्रीराम" के नारों से गूंज उठा। स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है। आश्विन मास की षष्ठी को रावण दहन करना रेनवाल की पहचान बन चुका है। इतना ही नहीं, इस आयोजन को देखने आसपास के गांवों से भी लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
होली तक चलता है रावण दहन का सिलसिला
रेनवाल में इस अनोखे उत्सव की शुरुआत के बाद आसपास के गांव भी इसमें शामिल हो जाते हैं। यही कारण है कि क्षेत्र में रावण दहन का यह क्रम केवल दशहरे तक ही नहीं, बल्कि होली तक चलता रहता है। कार्यक्रम के दौरान जीवंत झांकियां, रामायण के विविध प्रसंग और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दर्शकों का मन मोह लेती हैं।
सामाजिक एकता और संस्कृति का प्रतीक
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह उत्सव केवल अच्छाई की बुराई पर विजय का संदेश देने तक सीमित नहीं है। इसका असली उद्देश्य ग्रामीणों को एक मंच पर लाना और उनकी सांस्कृतिक धरोहर को संजोए रखना है। यही कारण है कि इस परंपरा को आज भी पूरी आस्था, जोश और एकजुटता के साथ निभाया जाता है।














