राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और फोटो-वीडियो रिकॉर्डिंग को लेकर शिक्षा विभाग के नए दिशा-निर्देशों ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। आदेश में स्कूल परिसर में किसी बाहरी व्यक्ति के फोटो खींचने, वीडियो बनाने, इंटरव्यू करने या लाइव स्ट्रीमिंग के लिए प्रधानाचार्य से पहले लिखित अनुमति लेने की बात कही गई है। इसी बीच शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के बयान ने मामले को और चर्चा में ला दिया है।
मंत्री ने कहा कि उन्होंने कुछ लोगों से यह सुना है कि सरकार ने स्कूलों में लोगों के जाने और रिकॉर्डिंग करने पर रोक लगा दी है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार ने ऐसा कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया है। उनके मुताबिक, बनाए गए नियमों का उद्देश्य स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा और उनकी निजता की रक्षा करना है।
बाहरी व्यक्ति को लेनी होगी प्रधानाचार्य की अनुमति
माध्यमिक शिक्षा विभाग की ओर से 16-17 अगस्त को जारी निर्देशों में सरकारी स्कूल परिसरों में बाहरी लोगों की गतिविधियों को लेकर नियम तय किए गए हैं।
इन निर्देशों के अनुसार, यदि कोई बाहरी व्यक्ति स्कूल में फोटो, वीडियो, इंटरव्यू या लाइव स्ट्रीमिंग करना चाहता है, तो उसे पहले स्कूल के प्रधानाचार्य से लिखित अनुमति लेनी होगी। यानी अनुमति के बिना ऐसी गतिविधियों की इजाजत नहीं होगी।
सरकारी स्कूलों में अलग-अलग तरह की व्यवस्थागत समस्याओं को लेकर छात्र प्रदर्शन भी कर रहे हैं। ऐसे माहौल में स्कूल परिसरों में बाहरी लोगों की आवाजाही और रिकॉर्डिंग को लेकर जारी निर्देशों ने राजनीतिक बहस को जन्म दिया है।
विजिटर रजिस्टर में दर्ज होगी पूरी जानकारी
शिक्षा विभाग के दिशा-निर्देशों के तहत स्कूल में आने वाले प्रत्येक बाहरी व्यक्ति की जानकारी विजिटर रजिस्टर में दर्ज की जाएगी। अनुमति मिलने के बावजूद बाहरी व्यक्ति को स्कूल परिसर में स्वतंत्र रूप से घूमने की अनुमति नहीं होगी।
ऐसे व्यक्ति के साथ स्कूल का शिक्षक, स्टाफ सदस्य या प्रधानाचार्य मौजूद रहेगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य स्कूल परिसर में बाहरी लोगों की गतिविधियों पर निगरानी बनाए रखना है।
क्लासरूम और टॉयलेट जैसे स्थानों पर भी नियम
निर्देशों में स्कूल के कुछ संवेदनशील हिस्सों में बाहरी लोगों की स्वतंत्र आवाजाही पर रोक का भी प्रावधान है। क्लासरूम, टॉयलेट, लैब और हॉस्टल जैसे स्थानों पर कोई बाहरी व्यक्ति अकेले नहीं जा सकेगा।
शिक्षा विभाग ने बच्चों की सुरक्षा और निजता से जुड़े प्रावधानों के संदर्भ में ‘इन लोको पेरेंटिस’ के सिद्धांत का भी उल्लेख किया है। इसका आशय ऐसे स्थानों पर बच्चों के संबंध में माता-पिता की तरह जिम्मेदारी निभाने से है।
मंत्री मदन दिलावर के बयान से उठे सवाल
आदेश जारी होने के बाद शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के बयान को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। मंत्री ने कहा कि उन्हें कुछ लोगों से यह सुनने को मिला है कि स्कूलों में प्रवेश और रिकॉर्डिंग पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है।
हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने यह साफ किया कि स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश या रिकॉर्डिंग पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। उन्होंने बच्चों की सुरक्षा को सरकार की जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि नाबालिग बच्चों की तस्वीर या उनकी बाइट लेने से पहले अभिभावकों की अनुमति जरूरी है।
मंत्री के अनुसार, स्कूल में बच्चों की मौजूदगी के दौरान उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी शिक्षकों की होती है। इसके अलावा स्कूल प्रबंधन समिति और अभिभावक-शिक्षक बैठकों के माध्यम से भी बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों पर नजर रखी जाती है।
बच्चों की निजता और अधिकारों पर जोर
मदन दिलावर ने यह भी कहा कि कोई व्यक्ति बिना अनुमति स्कूल में प्रवेश कर बच्चों से अनावश्यक सवाल-जवाब करे या उनकी निजता को प्रभावित करे, तो इसे उचित नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार, संस्था प्रधान की जिम्मेदारी है कि बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन न हो।
इस तरह शिक्षा विभाग के आदेश में बाहरी लोगों की गतिविधियों के लिए अनुमति और निगरानी की व्यवस्था पर जोर दिया गया है, जबकि सरकार की ओर से इसे बच्चों की सुरक्षा और निजता से जुड़ा कदम बताया जा रहा है।
कांग्रेस ने सरकार पर साधा निशाना
दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस आदेश को लेकर राजस्थान सरकार पर निशाना साधा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने आरोप लगाया कि सरकार सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति सामने आने से रोकना चाहती है।
डोटासरा का कहना है कि सरकार को स्कूलों की व्यवस्थाओं में सुधार करने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि जमीनी स्थिति सामने लाने वाले लोगों पर पाबंदियां लगाने के बजाय सरकारी स्कूलों की कमियों को दूर करने की जरूरत है।
इस मामले में एक ओर सरकार बच्चों की सुरक्षा और निजता को नियमों का आधार बता रही है, वहीं कांग्रेस इसे स्कूलों की वास्तविक स्थिति सामने आने से रोकने की कोशिश के तौर पर देख रही है। इसी विरोधी दावों के चलते शिक्षा विभाग का यह आदेश राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है।














