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प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से ही होगा समग्र विकास: राज्यपाल हरिभाऊ बागडे

राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से ही देश का समग्र विकास संभव है। उन्होंने नई शिक्षा नीति, गुरुकुल परंपरा और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर जोर दिया।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Mon, 29 Jun 2026 7:23:37

प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से ही होगा समग्र विकास: राज्यपाल हरिभाऊ बागडे

जयपुर। राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के विकास की मजबूत आधारशिला है। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति का मूल उद्देश्य भी प्राचीन भारतीय ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ जोड़कर देश के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करना है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और उसे शिक्षा, शोध तथा नवाचार से जोड़ने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया।

राज्यपाल सोमवार को पूर्णिमा विश्वविद्यालय में विद्याभारती के सहयोग से आयोजित "भारतीय ज्ञान परंपरा – पारंपरिक ज्ञान से आधुनिक शिक्षा, शोध और नवाचार" विषय पर आयोजित पांच दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था, सांस्कृतिक विरासत और ज्ञान परंपरा की विभिन्न विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।

गुरुकुलों में मिलता था जीवनोपयोगी और नैतिक शिक्षा का समग्र ज्ञान

राज्यपाल ने कहा कि प्राचीन भारत में लगभग आठ लाख गुरुकुल संचालित होते थे, जहां विद्यार्थियों को केवल पुस्तक आधारित शिक्षा नहीं, बल्कि जीवन को सफल बनाने वाला व्यावहारिक और नैतिक ज्ञान भी प्रदान किया जाता था। उन्होंने बताया कि उस समय विद्यार्थियों को 18 विद्याओं और 64 कलाओं का प्रशिक्षण दिया जाता था, जिससे उनका व्यक्तित्व हर दृष्टि से विकसित होता था।

उन्होंने कहा कि गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का मूल उद्देश्य केवल विद्वान तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसे जिम्मेदार और नैतिक नागरिक बनाना था, जो समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को समझ सकें। इसी कारण उस समय नैतिक मूल्यों को शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जाता था।

चक्रपाणी मिश्र के ग्रंथ में छिपा है आधुनिक विज्ञान का आधार

अपने संबोधन में राज्यपाल ने 16वीं शताब्दी के महाराणा प्रताप के दरबारी विद्वान चक्रपाणी मिश्र का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके द्वारा रचित "विश्व वल्लभ" ग्रंथ आज भी अत्यंत उपयोगी वैज्ञानिक जानकारियों का महत्वपूर्ण स्रोत है। उन्होंने बताया कि इस ग्रंथ में भूजल की खोज, मौसम का पूर्वानुमान, जल शुद्धिकरण, कुंड एवं बावड़ियों के निर्माण, पर्यावरण संरक्षण, बागवानी, कृषि वानिकी तथा वृक्षों के रोगों और उनके उपचार जैसी अनेक विषयों पर विस्तृत जानकारी उपलब्ध है।

उन्होंने कहा कि आज जिन तकनीकों को आधुनिक विज्ञान की उपलब्धि माना जाता है, उनका आधार भारतीय ज्ञान परंपरा में सदियों पहले से मौजूद रहा है। भारत की यही विशेषता रही कि यहां ज्ञान को सदैव समाज की उपयोगिता और प्रकृति के संतुलन से जोड़कर विकसित किया गया।

भगवान राम की शिक्षा और गुरुकुल परंपरा का दिया उदाहरण

राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा कि भारत की शिक्षा व्यवस्था वैदिक परंपरा पर आधारित रही है, जहां शिक्षा का उद्देश्य केवल अकादमिक ज्ञान देना नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों का विकास करना था। उन्होंने भगवान श्रीराम का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने भी गुरुकुल शिक्षा प्राप्त की थी और इसी संस्कारपूर्ण शिक्षा ने उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया।

उन्होंने महर्षि विश्वामित्र का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने राजा दशरथ से श्रीराम को अपने आश्रम की रक्षा के लिए साथ ले जाने का आग्रह किया था। राज्यपाल ने कहा कि विश्वामित्र ने यह संदेश दिया था कि अन्याय और हिंसा का उचित प्रतिकार आवश्यक होता है। यदि समाज अन्याय के सामने मौन रहता है, तो वह भयभीत और कमजोर बन जाता है। इसलिए आवश्यक परिस्थितियों में हिंसा का प्रतिरोध ही अहिंसा की रक्षा का सर्वोत्तम माध्यम बनता है।

अंग्रेजों ने बदली शिक्षा व्यवस्था, नैतिक मूल्यों को पहुंचा नुकसान

राज्यपाल ने कहा कि अंग्रेजों के शासनकाल में प्रकाशित गजेटियरों में भी भारत में लाखों गुरुकुलों के अस्तित्व का उल्लेख मिलता है। उस समय भारत का भौगोलिक स्वरूप व्यापक था और वर्तमान पाकिस्तान, म्यांमार तथा श्रीलंका भी उसी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा थे। उन्होंने बताया कि गुरुकुलों में शिक्षा पूरी तरह निशुल्क होती थी और उनका संचालन समाज के सहयोग से किया जाता था।

उन्होंने कहा कि उस दौर में शिक्षा का अधिकांश भाग श्रुति परंपरा पर आधारित था, जिसमें विद्यार्थी गुरु से ज्ञान सुनते, उस पर चिंतन और मनन करते तथा व्यवहार में उतारते थे। राज्यपाल ने रणकपुर के जैन मंदिरों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां की अद्भुत स्थापत्य कला इस बात का प्रमाण है कि भारत में शिक्षा का सीधा संबंध कौशल और व्यवहारिक दक्षता से था।

मैकाले की शिक्षा नीति पर उठाए सवाल, भारतीय योगदान को बताया उपेक्षित

राज्यपाल ने कहा कि लॉर्ड मैकाले ने भारत की मजबूत और नैतिक शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने के उद्देश्य से नई शिक्षा प्रणाली लागू की थी। उनका मानना था कि यदि भारतीय शिक्षा व्यवस्था को बदल दिया जाए तो लंबे समय तक देश पर शासन करना आसान हो जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि इसी नीति के तहत देश के पारंपरिक उद्योग-धंधों को भी कमजोर किया गया और लोगों को आर्थिक संकट की ओर धकेला गया।

उन्होंने महर्षि कणाद का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने सदियों पहले अणु और परमाणु का सिद्धांत प्रस्तुत किया था, लेकिन आधुनिक विज्ञान में उनके योगदान को अपेक्षित स्थान नहीं मिला। उन्होंने कहा कि दशमलव प्रणाली का उद्भव भी भारत में हुआ, जिसने पूरी दुनिया की गणना प्रणाली को नई दिशा दी। उनके अनुसार पश्चिमी देशों में ज्ञान को अलग-अलग विषयों में बांटकर पढ़ाया गया, जबकि भारत में प्रारंभ से ही समग्र ज्ञान और बहुआयामी शिक्षा की परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत कला, चिकित्सा, धातुविज्ञान, कृषि और विज्ञान जैसे अनेक क्षेत्रों में विश्व का अग्रणी राष्ट्र था।

बप्पा रावल और महर्षि अरविंद के विचारों का किया उल्लेख


अपने संबोधन के अंतिम चरण में राज्यपाल ने बप्पा रावल के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने अपने समय में विदेशी आक्रमणकारियों को लंबे समय तक भारत की सीमाओं से दूर रखा। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान का रावलपिंडी नगर बप्पा रावल के नाम से जुड़ा माना जाता है, जहां उन्होंने विश्राम किया था।

राज्यपाल ने महर्षि अरविंद घोष के विचारों का उल्लेख करते हुए शिक्षकों और विद्यार्थियों से आह्वान किया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं होना चाहिए, बल्कि बौद्धिक क्षमता, नैतिक मूल्यों, आत्मसंयम और शांति जैसे गुणों का विकास भी समान रूप से आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान का प्रभावी समन्वय किया जाए, तो भारत न केवल शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को प्राप्त करेगा, बल्कि विश्व के समक्ष समग्र विकास का एक आदर्श मॉडल भी प्रस्तुत कर सकेगा।

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