
जयपुर। जैन धर्म में दसलक्षण महापर्व को आत्मशुद्धि, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का सर्वोच्च अवसर माना जाता है। यह पर्व विशेष रूप से श्वेतांबर और दिगंबर जैन समुदाय में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाया जाता है। दस दिनों तक चलने वाले इस पर्व का प्रत्येक दिन एक विशिष्ट गुण—जैसे क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच और ब्रह्मचर्य—पर आधारित होता है, जो व्यक्ति को धर्म, संयम और आत्मकल्याण की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है। इन दस दिनों में जप, ध्यान, पूजा, स्वाध्याय, त्याग और भक्ति जैसे अनुष्ठानों के साथ-साथ सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजनों का भी आयोजन किया जाता है।
संस्था द्वारा आयोजित भावनृत्य प्रतियोगिता
अखिल भारतीय श्रीमाल जैन जागृति संस्था ने इस महापर्व को भक्ति और उत्साह के साथ मनाने के लिए प्रतिदिन विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया। संस्था के सचिव डॉ. इन्द्र कुमार जैन के अनुसार, पर्व के तीसरे दिन भावनृत्य प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें 15 वर्ष से अधिक आयु वर्ग की बालिकाओं और महिलाओं ने भाग लिया। जैन भजनों पर आधारित इन भावनृत्यों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया और कार्यक्रम का वातावरण पूर्णतया भक्ति और अध्यात्म से परिपूर्ण हो गया।
संस्था के कोषाध्यक्ष नवल जैन ने बताया कि संस्था के सदस्य सम्पूर्ण भारतवर्ष से ऑनलाइन माध्यम से इस कार्यक्रम में जुड़कर उत्सव का अनुभव कर रहे हैं, जिससे पर्व का उल्लास और व्यापक स्तर पर फैला।
कार्यक्रम के प्रायोजक और संयोजक
इस विशेष आयोजन के प्रायोजक रहे श्री ज्ञानेन्द्र जैन – श्रीमती ममता जैन, श्री शोभित जैन – श्रीमती नीतिका, श्रेयांश जैन और नित्या जैन (खंडार वाले)। कार्यक्रम का सफल संयोजन श्री राजेंद्र जी, अशोक जी, दीपेंद्र जी, गौरव जी, श्रीमती नयना जी और श्रीमती अल्पना जी ने किया। संस्था की ओर से सभी प्रायोजकों और संयोजकों का हार्दिक आभार व्यक्त किया गया।
संस्था के अध्यक्ष अजय कुमार जैन ने इस अवसर पर कहा कि ऐसे आयोजन न केवल धार्मिक भावनाओं को सशक्त करते हैं, बल्कि समाज में सांस्कृतिक जागरूकता और एकता को भी मजबूती प्रदान करते हैं। उन्होंने सभी प्रतिभागियों, आयोजकों और दर्शकों को धन्यवाद देते हुए आशा व्यक्त की कि आने वाले वर्षों में भी यह परंपरा इसी उत्साह और भक्ति के साथ जारी रहेगी।
दसलक्षण महापर्व का महत्व
दसलक्षण पर्व जैन धर्म की आत्मानुशासन और तपस्या की परंपरा का अद्वितीय उदाहरण है। इस पर्व के दौरान दस दिनों तक प्रत्येक दिन एक विशेष धर्म या लक्षण का पालन और स्मरण किया जाता है।
ये दस लक्षण इस प्रकार हैं:
उत्तम क्षमा
दसलक्षण महापर्व का पहला लक्षण क्षमा है। इसमें सभी जीवों के प्रति क्षमा और करुणा की भावना रखना सिखाया जाता है। क्षमा का अभ्यास व्यक्ति के मन और व्यवहार को शांति और सौहार्दपूर्ण बनाता है।
उत्तम मार्दव
मार्दव का अर्थ है विनम्रता। अहंकार का त्याग कर दूसरों के प्रति नम्र और सज्जन व्यवहार अपनाना ही इस लक्षण का मूल उद्देश्य है। यह व्यक्ति को दूसरों के प्रति सहानुभूतिशील बनाता है।
उत्तम आर्जव
आर्जव का लक्षण सादगी और ईमानदारी को दर्शाता है। इसमें व्यक्ति को अपने विचारों और व्यवहार में सरलता तथा सच्चाई बनाए रखने की शिक्षा दी जाती है।
उत्तम शौच
शौच केवल बाहरी सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मा और मन की शुद्धि का प्रतीक भी है। इस लक्षण का पालन करने से व्यक्ति का मन और आत्मा दोनों पवित्र रहते हैं।
उत्तम सत्य
सत्य का पालन जीवन में नैतिकता और आत्मसम्मान की नींव रखता है। इसमें हमेशा सत्य बोलना और असत्य से दूर रहना शामिल है।
उत्तम संयम
संयम का अर्थ है इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण। यह लक्षण व्यक्ति को आवेगों और अनावश्यक वासनाओं से दूर रखकर मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन प्रदान करता है।
उत्तम तप
तपस्या का लक्षण शरीर और आत्मा दोनों को साधने की प्रेरणा देता है। यह आत्मसंयम, ध्यान और कष्ट सहने की शक्ति विकसित करता है।
उत्तम त्याग
त्याग का अर्थ है मोह-माया और भौतिक वस्तुओं का परित्याग। इसे अपनाने से व्यक्ति मानसिक रूप से स्वतंत्र और संतुष्ट बनता है।
उत्तम आकिंचन्य
आकिंचन्य का लक्षण पूर्ण विरक्ति और वैराग्य की भावना पर आधारित है। इसमें सांसारिक इच्छाओं और वस्तुओं से दूर रहकर आध्यात्मिक उन्नति की ओर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
उत्तम ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्य का पालन व्यक्ति को आत्मिक उन्नति की साधना में सक्षम बनाता है। यह न केवल जीवन में संयम और आत्मनियंत्रण लाता है, बल्कि आध्यात्मिक विकास की दिशा भी दिखाता है।
इन दस लक्षणों का अनुसरण करने से आत्मा की शुद्धि होती है और व्यक्ति मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर होता है।
दसलक्षण महापर्व केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मानुशासन और आध्यात्मिक उत्थान की प्रेरणा है। अखिल भारतीय श्रीमाल जैन जागृति संस्था द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम इस पर्व की महत्ता को और अधिक सजीव बनाते हैं। भावनृत्य प्रतियोगिता जैसी प्रस्तुतियां समाज में भक्ति, अध्यात्म और सांस्कृतिक एकता को गहराई से स्थापित करती हैं।














