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महायुति में बढ़ रही दूरियां? शिंदे खेमे की नाराजगी ने महाराष्ट्र की राजनीति में बढ़ाई हलचल

महाराष्ट्र की महायुति सरकार में सब कुछ ठीक नहीं होने की चर्चाओं के बीच एकनाथ शिंदे को नवी मुंबई एयरपोर्ट परियोजना के कार्यक्रम में आमंत्रित न किए जाने पर नया विवाद खड़ा हो गया है। जानिए कैसे इस मुद्दे ने फडणवीस-शिंदे संबंधों और गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Tue, 09 Jun 2026 8:40:13

महायुति में बढ़ रही दूरियां? शिंदे खेमे की नाराजगी ने महाराष्ट्र की राजनीति में बढ़ाई हलचल

महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फिर महायुति गठबंधन के भीतर सब कुछ सामान्य न होने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बीच बढ़ती दूरी को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। पिछले कुछ समय से शिंदे गुट के कई नेता सार्वजनिक मंचों से ऐसे बयान दे रहे हैं, जिनसे गठबंधन के भीतर असहजता साफ नजर आ रही है। अब एक नए विवाद ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है।

ताजा विवाद नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट में आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम को लेकर खड़ा हुआ है। इस कार्यक्रम में छत्रपति शिवाजी महाराज की 20 फीट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया गया, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि राज्य के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे इसमें शामिल नहीं थे। बाद में सामने आई जानकारी ने राजनीतिक हलकों में और ज्यादा हलचल पैदा कर दी।

एयरपोर्ट परियोजना के कार्यक्रम से शिंदे की गैरमौजूदगी बनी चर्चा का विषय

नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट परिसर में आयोजित इस भव्य समारोह का आयोजन अडानी एयरपोर्ट अथॉरिटी और सिडको (CIDCO) की ओर से किया गया था। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के अलावा मंत्री अदिति तटकरे और वन मंत्री गणेश नाईक मौजूद रहे। हालांकि, राज्य के दोनों उपमुख्यमंत्रियों की अनुपस्थिति ने कई सवाल खड़े कर दिए।

बाद में खबर सामने आई कि एकनाथ शिंदे को इस कार्यक्रम का निमंत्रण ही नहीं भेजा गया था। यही बात अब पूरे विवाद की जड़ बन गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जिस परियोजना से जुड़ा यह आयोजन था, उसका सीधा संबंध उस विभाग से है जिसकी जिम्मेदारी स्वयं शिंदे के पास है।

अपने ही विभाग की परियोजना से दूर रखने पर भड़का शिंदे खेमे का गुस्सा

नवी मुंबई एयरपोर्ट परियोजना का संचालन सिडको के माध्यम से किया जा रहा है। सिडको राज्य के शहरी विकास विभाग के अंतर्गत काम करता है और इस विभाग का नेतृत्व उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे कर रहे हैं। ऐसे में अपने ही मंत्रालय से जुड़ी इतनी बड़ी परियोजना के अहम कार्यक्रम में उन्हें आमंत्रित न किया जाना उनके समर्थकों को बेहद खटका है।

शिंदे गुट के नेताओं का आरोप है कि यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि जानबूझकर किया गया कदम था। शिवसेना नेता और मंत्री संजय शिरसाट ने इस मामले पर खुलकर नाराजगी जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि नौकरशाही पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ता जा रहा है और कुछ अधिकारी जानबूझकर ऐसे फैसले ले रहे हैं, जिनसे एकनाथ शिंदे को महत्वपूर्ण परियोजनाओं का श्रेय न मिल सके।

उनके इस बयान ने विवाद को और गहरा कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा होने लगी है कि क्या गठबंधन के भीतर नेतृत्व और प्रभाव को लेकर अंदरूनी खींचतान चल रही है।

विवाद बढ़ते ही सक्रिय हुआ मुख्यमंत्री कार्यालय

जैसे-जैसे मामला तूल पकड़ने लगा, मुख्यमंत्री कार्यालय भी हरकत में आ गया। गठबंधन सरकार की छवि पर असर पड़ने की आशंका को देखते हुए प्रशासनिक स्तर पर तुरंत कदम उठाए गए।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से सिडको और अडानी एयरपोर्ट अथॉरिटी दोनों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। उनसे पूछा गया है कि सरकारी प्रोटोकॉल का पालन क्यों नहीं किया गया और राज्य के उपमुख्यमंत्रियों को कार्यक्रम में आमंत्रित करने की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई।

सरकार की ओर से यह कदम विवाद को शांत करने और गठबंधन में किसी तरह की दरार की अटकलों पर विराम लगाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि विपक्ष इस पूरे मामले को लेकर लगातार सरकार पर निशाना साध रहा है।

विपक्ष को मिला नया राजनीतिक हथियार

महायुति सरकार के भीतर पैदा हुए इस विवाद ने विपक्षी गठबंधन महाविकास अघाड़ी को सरकार पर हमला बोलने का एक नया अवसर दे दिया है। शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के वरिष्ठ नेता अंबादास दानवे ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सत्ता में भागीदार होने के बावजूद एकनाथ शिंदे की स्थिति गठबंधन में कमजोर दिखाई दे रही है।

दानवे ने तंज कसते हुए कहा कि जिस नेता ने सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, आज वही अपने विभाग से जुड़े कार्यक्रमों में नजर नहीं आ रहा है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भाजपा और शिंदे गुट के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि पिछले कुछ दिनों से विपक्षी नेताओं की ओर से लगातार ऐसे बयान दिए जा रहे हैं, जिनमें दावा किया जा रहा है कि भाजपा से असंतुष्ट शिंदे गुट भविष्य में कोई बड़ा राजनीतिक फैसला ले सकता है। हाल ही में अंबादास दानवे ने भी संकेत दिए थे कि परिस्थितियां अनुकूल होने पर शिंदे गुट फिर से उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के करीब आ सकता है। वहीं शिवसेना के वरिष्ठ नेता अब्दुल सत्तार के कुछ बयानों को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

इन तमाम घटनाक्रमों के बीच महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर अटकलों का दौर शुरू हो गया है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि यह विवाद केवल एक प्रोटोकॉल संबंधी चूक साबित होता है या फिर महायुति के भीतर चल रही किसी बड़ी राजनीतिक असहजता का संकेत है।

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