
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने हाल के दिनों में विभिन्न प्रदेशों में चल रही बुलडोजर कार्रवाईयों और उनसे जुड़ी राजनीति पर तीखी आलोचना की है। उन्होंने उन राज्यों की नकेल कसी जो सुप्रीम कोर्ट के विध्वंस संबंधी निर्देशों का पालन नहीं कर रहे और कथित तौर पर गरीबों तथा अल्पसंख्यक समुदायों पर बेमतलब की कार्रवाई कर रहे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने RSS और केन्द्र सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठाए।
ओवैसी ने शायर साहिर लुधियानवी की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि अत्याचार की हर शकल अंततः समाज में गहरी चोट छोड़ती है। उन्होंने कहा, “जुल्म अगर बढ़ता है तो मिटेगा भी नहीं; खून अगर टपकेगा तो जम जाएगा।” इन शब्दों के ज़रिये उन्होंने बुलडोजर अभियानों को अन्याय की अभिव्यक्ति बताया और चेतावनी दी कि ऐसी हरकतें लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था के लिए खतरा हैं।
ट्विटर (X) के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन न करने वाली सरकारों पर उन्होंने ज़ोरदार आपत्ति जताई। ओवैसी ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि किसी भी तरह के विध्वंस से पहले नोटिस और न्यायिक प्रक्रिया आवश्यक है, पर कुछ राज्य सरकारें इसी प्रक्रिया को ताक पर रखकर सीधे बुलडोजर से गरीबों के घरों को निशाना बना रही हैं। उनका तर्क था कि यह किस्म का दुरुपयोग संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है और लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करता है।
ओवैसी ने कुछ राज्यों का नाम लेकर सीधे कहा कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे स्थानों से बुलडोजर की कई ख़बरें आ रही हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि जनता इन अत्याचारों को बर्दाश्त नहीं करेगी। उनके शब्दों में, “ऐसी आग जिसे बुझाया न जा सके, वह जनता की आवाज़ बन जाती है।” उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे अन्याय के खिलाफ एकजुट हों और संवैधानिक प्रक्रियाओं की रक्षा करें।
तेलंगाना समेत कई जगहों पर उन्होंने स्थानीय प्रशासन को भी आगाह किया कि वे कानून की सीमाओं में रहकर काम करें; नहीं तो उनकी पार्टी हर मंच पर ऐसे कदमों का विरोध करेगी। ओवैसी के इस रुख ने राजनीतिक चर्चा तेज कर दी है और आम लोगों में भी इस मामले पर बहस छेड़ दी है।
RSS और प्रधानमंत्री पर तीखे सवाल
AIMIM प्रमुख ने सीधे तौर पर RSS और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी कटाक्ष किया। ओवैसी का कहना रहा, “मालूम हुआ कि आरएसएस के किसी भी आदमी ने मुल्क के लिये जान नहीं गवाई।” उन्होंने प्रधानमंत्री की आरएसएस की वाह-वाही पर सवाल उठाते हुए यह भी कहा कि सरकारों की भाषा व नीतियाँ कई बार अल्पसंख्यकों के प्रति असहनशील प्रतीत होती हैं।
ओवैसी ने आगे तीखा आरोप लगाया कि कानून बनते-बनते हालात ऐसे हो गए हैं कि मुस्लिम समुदाय की धार्मिक और सामाजिक जगहों को निशाना बनाया जा रहा है—उनके शब्दों में “मस्जिदें, दरगाहें और शमशान जैसी जगहों पर जो हमले हो रहे हैं, वे unacceptable हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि कुछ छोटे-छोटे मामलों में दोहरे मापदंड दिखते हैं—जहां “I LOVE MODI” बोलना स्वीकार्य है, वहीं “I LOVE MOHAMMAD” बोलना मुश्किल हो जाता है—और यह विभाजन समाज के लिये खतरनाक है।
ओवैसी ने प्रधानमंत्री को सीधे चुनौती भी दी कि अगर वे आरएसएस के प्रति अपनी निष्ठा जताते हैं तो यह बताएं कि उनकी वाणी और नीतियाँ सभी भारतीयों के लिये समान रूप से किस तरह काम कर रही हैं। उन्होंने आगाह किया कि ऐसी नीतियों से सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है और यह देश के लिए हानिकारक होगा।
न्याय और संवैधानिक प्रक्रिया की पुकार
ओवैसी ने बार-बार यह मांग दोहराई कि केंद्र और राज्य, दोनों स्तरों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का सख्ती से पालन होना चाहिए और बुलडोजर जैसी शक्ति-प्रदर्शन वाली कार्रवाइयों की राजनीति तत्काल बंद हो। उनका संदेश साफ था: अत्याचार और दूसरे समुदायों के खिलाफ मनमानी कार्रवाईयों का घमंड लंबे समय तक कायम नहीं रह सकता; जनता और संविधान अंततः न्याय की मांग करेंगे।
उनके बयानों ने राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है और यह स्पष्ट कर दिया है कि यह विषय आने वाले दिनों में सार्वजनिक बहस का केंद्र बना रहेगा। ओवैसी ने दावा किया कि उनकी पार्टी सभी स्तरों पर इस मुद्दे पर आवाज उठाती रहेगी और संवैधानिक मर्यादा व नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेगी।














