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बच्चों को इतना प्यार न दें जो ‘लाड’ में बदल जाए, आत्मविश्वास पैदा होने दे, नेतृत्व क्षमता का होगा विकास

कोरोना काल से पहले अक्सर हर घर में यह दिखाई दे रहा था कि माता-पिता, इनमें माताएँ ज्यादा, अपने 6 से लेकर 15 साल के बच्चों को उनकी किसी न किसी बात को लेकर टोकती रहती थीं

Posts by : Geeta | Updated on: Thu, 26 Aug 2021 6:44:36

बच्चों को इतना प्यार न दें जो ‘लाड’ में बदल जाए, आत्मविश्वास पैदा होने दे, नेतृत्व क्षमता का होगा विकास

कोरोना काल से पहले अक्सर हर घर में यह दिखाई दे रहा था कि माता-पिता, इनमें माताएँ ज्यादा, अपने 6 से लेकर 15 साल के बच्चों को उनकी किसी न किसी बात को लेकर टोकती रहती थीं। ऐसा नहीं है कि अब ऐसा नहीं हो रहा है, हो रहा है लेकिन अब उनके स्वास्थ्य को लेकर टोका-टाकी होती है। बच्चों को उनकी हर बात के चलते यह कहना कि ऐसा नहीं करना चाहिए, तुम्हें समझ नहीं है क्या, तुमने क्यों किया इत्यादि-इत्यादि के चलते बच्चों में कभी भी स्वयं निर्णय लेने की क्षमता पैदा नहीं हो पाती है। वह अपने हर निर्णय को लेने से पहले यह सोचता है कि यदि मैं ऐसा कर दूंगा तो मेरी माँ या पिता मुझे डाँटेंगे। हर मां-बाप अपने बच्चों को अच्छी परवरिश देना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि उनका बच्चा सबसे अलग नजर आए। इसके लिए जरूरी है कि आप अपने बच्चे के अंदर नेतृत्व क्षमता को विकसित करें। इसके लिए जरूरी है कि आप उसके द्वारा उठाए गए कदमों को आलोचना न करें अपितु उनकी सराहना करें। यदि बच्चे नपे कुछ गलत किया है तो उसे प्यार से तर्क सहित समझाएं जिससे उसे अपनी गलती को अहसास होने के साथ-साथ उसे सही करने की क्षमता का विकास हो। जिस बच्चे में आत्मविश्वास भरपूर होता है वही बच्चा हर काम में आगे रहता है। यही आत्मविश्वास बच्चे में नेतृत्व क्षमता को विकसित करता है।

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अभिभावक की परवरिश का होता है बच्चे पर असर

हाल ही में इस मामले को लेकर एक शोध प्रकाशित हुआ है जिसमें कहा गया है कि अभिभावक की परवरिश का बच्चे पर गहरा असर पड़ता है। यह बिलकुल सही है। सदियों से यही देखा आ रहा है कि बच्चे की परवरिश जिस माहौल में होती है बच्चा उसी हिसाब से चलता है।

शोध से यह बात सामने आई है कि मानव मस्तिष्क का 90 प्रतिशत भाग शुरुआती वर्षों में ही विकसित हो जाता है। यह ऐसा समय है जब बच्चे में आत्मविश्वास और नेतृत्व कौशल विकसित होता है। इसकी शुरुआत होती है अभिभावकों से। यदि बच्चे को इस बात का अहसास हो कि कुछ भी हो जाए उसके माता-पिता उसके हर कदम पर साथ खड़े हैं तो बच्चे में जबरदस्त आत्मविश्वास पैदा होता है। वह अपने आपको पूरी तरह से सुरक्षित महसूस करता है। जब भी वे रोते हैं या किसी परेशानी में पड़ते हैं उस समय उन्हें लगता है कि कोई न कोई, उन्हें सम्भालने के लिए, उनके आस-पास है।

चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हैं बच्चे

वर्ष 2020 में जब अचानक से कोरोना महामारी आई तो सभी को अपने-अपने घरों में बंद होकर रहना पड़ा। काम धंधों के साथ-साथ बच्चों की शिक्षा प्रणाली भी पूरी तरह से बंद हो गई। स्कूल बंद होने से बच्चों की इनडोर और आउटडोर क्रियाएँ पूरी तरह से रुक गईं। लगातार घरों में कैद रहने का असर बच्चों के मस्तिष्क पर पड़ा। इस दौरान देखा गया कि बच्चों के स्वभाव में बहुत बड़ा परिवर्तन आया। नेतृत्व क्षमता के जरिये बच्चों में आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता का विकास होता है। आत्मविश्वास के चलते बच्चों को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में कभी असफलता नहीं मिलती है। हर माता-पिता को यह प्रयास करना चाहिए कि वे अपने बच्चे में नेतृत्व क्षमता का विकास और आत्मविश्वास पैदा करें। उसमें यह भावना पैदा करें कि वह किसी कार्य को लेकर यह न सोचे को मैं यह नहीं कर सकता। जब बच्चे में यह भावना आएगी तभी वह घर के बाहर मिलने वाली चुनौतियों और समस्याओं का समाधान कर सकेगा। जब उसमें भरपूर आत्मविश्वास होगा तो अपने आप ही उसने नेतृत्व क्षमता का विकास होगा। इससे वह अपने साथ-साथ दूसरे के प्रति भी जिम्मेदार बनेगा।

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इन तरीकों से बढ़ाए आत्मविश्वास

1. माता-पिता की सबसे बड़ी पहली जिम्मेदारी यह है कि बच्चे द्वारा किए गए काम की प्रशंसा करें। प्रशंसा करें लेकिन सिर्फ सही काम की। यदि कोई गलती करता है तो उसे डांटने के स्थान पर समझाएँ कि कैसे इस काम को सही किया जा सकता है। उसे और अधिक प्रयास करने के लिए प्रेरित करें। यदि आपका बच्चा पढ़ाई में कुछ कमजोर नजर आता है तो उसे किसी डाँट या मारपीट के स्थान पर उसे अच्छे तरीके से करने को प्रेरित करें। यदि आपका बच्चा हर काम को आसानी से और सही तरीके से करता है तो उसकी बहुत ज्यादा प्रशंसा न उसके सामने न और के सामने करें इससे उसका आत्मविश्वास अति आत्मविश्वास में बदल जाएगा तो उसे आगे जाकर नुकसान पहुँचायेगा।

2. बच्चे हमेशा अपने से बड़ों और दूसरों को देखकर सीखते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि बच्चे का पहला स्कूल उसका घर होता है। घर पर वह अपने से बड़ों को जिस तरह से काम करते हुए देखता है वह उसी अनुरूप स्वयं भी करने का प्रयास करता है।

3. 6 साल की उम्र का होते ही बच्चे को घर के छोटे-छोटे काम करने की आदत डालें। जैसे-कप लेकर आना, पानी का खाली गिलास उठाना, अपने कपड़ों को उठाना, उन्हें ऑलमारी में रखवाना ऐसे कई काम हैं जो उनसे करवाना शुरू करना चाहिए। इससे बच्चे में जिम्मेदारी का अहसास पैदा होता है। जब उसे जिम्मेदारी का काम देते हैं तो उसमें ऊर्जा का प्रवाह होता है।

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4. बच्चों को अपना प्यार दें लेकिन उसे लाड में न बदलें। प्यार जब लाड में बदल जाता है तब बच्चा माँ-बाप पर हावी हो जाता है। छोटी सी उम्र से ही बच्चे में अपना काम करने की आदत डालें। उसे हमेशा आप स्वयं सब कुछ न दें बल्कि उसे स्वयं अपना प्रयास करने दें। स्कूल जाने के लिए उसे आप तैयार न करें अपितु उसमें इस प्रवृत्ति का विकास करें कि बच्चा स्वयं तैयार हो, उसे अपना बैग स्वयं व्यवस्थित करने दें, नाश्ता करने दें। जूते-मोजे उसे हाथों में न दें कोशिश कीजिए कि वह मोजे स्वयं पहने और जूते के फीते भी स्वयं ही लगाए। जब बच्चा अपने काम स्वयं करने का प्रयास करता है तो उसमें आत्म विश्वास पैदा होता है।

5. इन छोटी-छोटी बातों से बच्चे में निर्णय लेने की क्षमता का विकास होता है। साथ ही अपने नियमित कार्य करने की आदत भी पड़ती है जो आगे जाकर उसके लिए फायदेमंद होती है। खाने पीने में भी उसे स्वयं सोचने दें कि उसे क्या खाना है। इसके साथ ही बच्चे को स्वयं सोचने दें कि उसे क्या पहनना है। अपनी सोच उस पर तब तक हावी रहने दें जब तक वह आपकी उंगली पकडक़र चलता है।

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