
रक्षाबंधन, भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के अद्वितीय रिश्ते को समर्पित त्योहार है, जिसे इस साल पूरे देश में 9 अगस्त 2025 को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसकी लंबी उम्र और समृद्धि की कामना करती हैं, और भाई जीवनभर उसकी रक्षा का वचन देता है। रक्षाबंधन सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने वाला भावनात्मक पर्व है। इस अवसर पर कई भाई-बहन मंदिरों में जाकर आशीर्वाद लेना बेहद शुभ मानते हैं। भारत में कुछ ऐसे खास मंदिर हैं जो भाई-बहन के रिश्ते की प्रतीक बन चुके हैं, और रक्षाबंधन पर यहां विशेष भीड़ देखने को मिलती है। आइए जानते हैं ऐसे ही 5 पवित्र मंदिरों के बारे में, जहां रक्षाबंधन के दिन दर्शन करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
1. यमुना-धर्मराज मंदिर, मथुरा – भाई-बहन के स्नेह का पवित्र प्रतीक
मथुरा, जो भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है, वहां स्थित यमुना-धर्मराज मंदिर भाई-बहन के रिश्ते की दिव्यता का प्रतीक है। यह मंदिर विश्राम घाट के पास यमुना नदी के किनारे स्थित है। यहां मां यमुना और उनके भाई यमराज की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने आए थे, तब यमुना ने उन्हें भोजन करवाया और अपने प्रेम का प्रतीक स्वरूप राखी बांधी। यमराज इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने यमुना को आशीर्वाद दिया कि जो भी भाई इस दिन बहन से राखी बंधवाकर यमुना स्नान करेगा, उसकी आयु लंबी और जीवन सुखमय होगा। तभी से यह परंपरा रक्षाबंधन से जुड़ गई है और यह मंदिर इस कथा का जीता-जागता प्रतीक बन गया।
रक्षाबंधन के दिन, इस मंदिर में बहनों की लंबी कतार लगती है, जो अपने भाइयों की दीर्घायु और सुख-शांति की कामना करती हैं। साथ ही, यहां आने वाले श्रद्धालु यमुना नदी में स्नान कर पुण्य प्राप्त करते हैं और मंदिर में पूजा अर्चना कर भाई-बहन के रिश्ते को और भी मजबूती देते हैं।
इस दिन विशेष रूप से यम द्वितीया की तरह भाई-बहन साथ में प्रसाद चढ़ाते हैं और मंदिर में एक साथ दर्शन करने से उनके रिश्ते में प्रेम और समझ बढ़ती है। यहां की संध्या आरती और भजन संध्या में भाग लेने वाले भक्त एक विशेष आत्मिक अनुभव का अहसास करते हैं। रक्षाबंधन के पावन अवसर पर इस मंदिर की यात्रा, आस्था और परंपरा का एक सुंदर संगम बन जाती है।
2. बंशी नारायण मंदिर, उत्तराखंड – सिर्फ रक्षाबंधन के दिन खुलता है ये रहस्यमयी मंदिर
हिमालय की गोद में स्थित बंशी नारायण मंदिर, उत्तराखंड के अद्भुत और रहस्यमयी तीर्थ स्थलों में से एक है। यह मंदिर चमोली जिले के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है, और भगवान विष्णु के एक विशेष रूप "बंशी नारायण" को समर्पित है। बंशी यानी बांसुरी और नारायण यानी विष्णु – यह मंदिर उनके उस स्वरूप को दर्शाता है जिसमें वे लोक कल्याण के लिए बांसुरी बजाते हैं, जो जीवन के संगीत और संतुलन का प्रतीक मानी जाती है।
इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि सालभर में केवल एक ही दिन – रक्षाबंधन – को इसके कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं। सूर्योदय होते ही पुजारी वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मंदिर के द्वार खोलते हैं और सूर्यास्त के बाद इसे एक वर्ष के लिए पुनः बंद कर दिया जाता है। स्थानीय किंवदंती है कि इस दिन भगवान स्वयं यहाँ विराजते हैं, और सौभाग्यशाली भक्तों को उनकी बांसुरी की दिव्य ध्वनि सुनाई देती है।
यहां तक पहुंचना आसान नहीं है – श्रद्धालुओं को पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच 10-12 किमी की कठिन चढ़ाई तय करनी पड़ती है। लेकिन कठिनाइयों के बावजूद, भक्तों का उत्साह देखते ही बनता है। लोग परिवार सहित इस यात्रा पर निकलते हैं, विशेषकर भाई-बहन की जोड़ियाँ, जो साथ में भगवान विष्णु के दर्शन कर अपने रिश्ते में मजबूती और आशीर्वाद की कामना करते हैं।
यह स्थान न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य का भी अद्वितीय उदाहरण है। चारों ओर फैली हरियाली, हिमालय की शांत वादियाँ और शुद्ध वातावरण इस मंदिर यात्रा को एक आत्मिक और आध्यात्मिक अनुभव बना देते हैं।
रक्षाबंधन के दिन यहां पूजा-अर्चना करने से यह विश्वास किया जाता है कि जीवन में विष्णु कृपा बनी रहती है और भाई-बहन के संबंधों में सदा मधुरता व मजबूती बनी रहती है।
3. या-बहन मंदिर, बिहार – भाई-बहन को समर्पित राज्य का इकलौता मंदिर
बिहार के सीवान जिले के दरौंदा ब्लॉक में स्थित भैया-बहन मंदिर एक ऐसा स्थान है जहाँ भाई-बहन के पवित्र प्रेम को देवी-देवताओं की तरह पूजा जाता है। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि भावनात्मक रूप से भी लोगों के दिलों से जुड़ा हुआ है। बिहार राज्य में यह ऐसा एकमात्र मंदिर है जो विशेष रूप से भाई-बहन के अटूट रिश्ते को समर्पित है।
इस मंदिर की खास बात यह है कि यहाँ हर साल रक्षाबंधन के दिन विशेष आयोजन होते हैं। इस शुभ अवसर पर बहनें विशेष रूप से सजी-संवरी होकर मंदिर में आती हैं और परिसर में स्थित प्राचीन बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। वे रक्षा सूत्र बांधती हैं और अपने भाइयों के जीवन में सुख, समृद्धि, सुरक्षा और दीर्घायु की कामना करती हैं। इस पेड़ को भाई के प्रतीक रूप में देखा जाता है, जिसे राखी बाँधना एक आध्यात्मिक परंपरा बन चुकी है।
रक्षाबंधन के दिन इस मंदिर में वातावरण पूरी तरह भक्तिमय और भावनाओं से भरा होता है। दूर-दराज़ से भाई-बहन की जोड़ियाँ यहां दर्शन के लिए पहुंचती हैं। कई परिवार पीढ़ियों से इस मंदिर में रक्षाबंधन मनाने की परंपरा निभा रहे हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार, यहां की गई पूजा से भाई-बहन के रिश्ते में कभी दरार नहीं आती और ईश्वर दोनों के जीवन में रक्षा और सहयोग का आशीर्वाद देते हैं।
इस मंदिर से जुड़ी कई कहानियाँ और लोककथाएँ भी स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित हैं, जिनमें बताया जाता है कि कैसे सच्चे प्रेम और त्याग के प्रतीक भाई-बहन की जोड़ी को देवत्व का स्थान दिया गया। यह मंदिर आज भी उस पवित्र बंधन की जीवंत मिसाल बना हुआ है, जिसे दुनिया की कोई भी ताकत तोड़ नहीं सकती।
4. काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी – सावन के अंतिम दिन की आध्यात्मिक छटा
वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर न सिर्फ इस पवित्र नगरी का, बल्कि सम्पूर्ण भारत का एक अत्यंत पूज्य और ऐतिहासिक शिव मंदिर है। श्रावण मास के दौरान यह मंदिर भक्तों से भरा रहता है, परंतु सावन के अंतिम दिन, रक्षाबंधन के अवसर पर यहां का माहौल अत्यधिक पावन और भावनात्मक हो जाता है। इस दिन बड़ी संख्या में भाई-बहन बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए उमड़ते हैं और एक-दूसरे की कुशलता, प्रेम और समृद्ध जीवन की प्रार्थना करते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस दिन शिवलिंग पर की गई पूजा से भाई-बहन के रिश्तों में और मजबूती आती है तथा उनका जीवन सुखद और शुभ बनता है।
5. भाई-बहन मंदिर, बिजनौर – जहां पत्थर में समाया है भाई-बहन का अमर प्रेम
उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के हल्दौर कस्बे से कुछ दूरी पर स्थित चुड़ियाखेड़ा के घने जंगलों में छिपा है एक अद्भुत और रहस्यमयी मंदिर — भाई-बहन मंदिर। यह मंदिर उन चंद स्थलों में से एक है, जहां भाई और बहन की मूर्तियाँ नहीं, बल्कि शिला रूप में विराजमान दिव्य युगल की पूजा की जाती है। वर्षों से यहां स्थानीय श्रद्धालु इन्हें ईश्वर रूप मानकर श्रद्धा से पूजते आ रहे हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, सतयुग में जब डाकुओं ने एक बहन पर आक्रमण किया, तो उसका भाई उसकी रक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना करता है। उसकी आर्त पुकार सुनकर भगवान ने दोनों को पत्थर का रूप दे दिया ताकि वे सदा के लिए सुरक्षित और अमर हो जाएं। यही शिलाएं आज इस मंदिर की आत्मा हैं।
रक्षाबंधन के पावन दिन पर यहां विशाल मेला लगता है। दूर-दूर से भाई-बहन की जोड़ियाँ यहां आकर दर्शन करती हैं और अपनी अटूट प्रीति की लंबी उम्र, सुरक्षा और सौहार्द की कामना करती हैं। मान्यता है कि इस स्थान पर की गई प्रार्थना से भाई-बहन की हर मनोकामना पूरी होती है।














