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चिनाब ही नहीं, भारत के ये 10 ब्रिज भी हैं अपने आप में रिकॉर्ड-ब्रेकर, गिनते रह जाएंगे खूबियां

जम्मू-कश्मीर के चिनाब रेल पुल के अलावा भारत में कई ऐसे ब्रिज हैं जो अपनी लंबाई, ऊंचाई और इंजीनियरिंग के लिए प्रसिद्ध हैं। जानिए भारत के 10 ऐसे अद्भुत ब्रिजों के बारे में जो तकनीकी और सौंदर्य दोनों ही दृष्टि से अनोखे हैं।

Posts by : Kratika Maheshwari | Updated on: Fri, 06 Jun 2025 1:18:33

 चिनाब ही नहीं, भारत के ये 10 ब्रिज भी हैं अपने आप में रिकॉर्ड-ब्रेकर, गिनते रह जाएंगे खूबियां

जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर बने दुनिया के सबसे ऊंचे रेल पुल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज (06 जून) राष्ट्र को समर्पित कर दिया। नदी के तल से चिनाब रेल ब्रिज को 359 मीटर की ऊंचाई पर बनाया गया है, जो एफिल टावर से 35 मीटर और कुतुब मीनार से करीब 287 मीटर ऊंचा है। यह ब्रिज 1315 मीटर लंबा है और 272 किमी लंबे ऊधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेलवे लिंक प्रोजेक्ट का हिस्सा है।

1486 करोड़ की लागत से निर्मित यह ब्रिज 266 किमी प्रति घंटे तक की स्पीड से चल रही हवा को झेल सकता है और रिक्टर स्केल पर 8 तक तीव्रता वाला भूकंप भी सहने में सक्षम है। हालांकि, केवल चिनाब ही नहीं, भारत में कई और ऐसे ब्रिज हैं, जिनकी खूबियां आप गिनते रह जाएंगे। आइए जान लेते हैं ऐसे ही 10 ब्रिजों के बारे में।

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# बांद्रा-वर्ली सी लिंक ब्रिज

बांद्रा-वर्ली सी लिंक ब्रिज भारत में इंजीनियरिंग के बेजोड़ नमूनों में से एक है। यह ब्रिज 5.6 किलोमीटर लंबा है। इससे बांद्रा से वर्ली की यात्रा 10 मिनट में पूरी हो जाती है, जबकि पहले यह दूरी तय करने में एक घंटे का वक्त लगता था। बताया जाता है कि बांद्रा-वर्ली सी लिंक में 56 हजार हाथियों के वजन के बराबर लोहे और कंक्रीट का इस्तेमाल हुआ है। स्टील के केबल्स पर टिके इस ब्रिज की सभी केबल्स जोड़ने पर पृथ्वी की परिधि के बराबर लंबाई हो जाएगी। 1600 करोड़ रुपए से बनाए गए आठ लेन के बांद्रा-वर्ली सी लिंक ब्रिज पर पैदल, दोपहिया और तीन पहिया वाहनों से चलना मना है।

ये केबल 900 टन तक का भार सह सकती हैं। इस ब्रिज के बड़े पिलर्स की ऊंचाई 128 मीटर है। इस ब्रिज को बनाने में भारत के साथ ही सिंगापुर, चीन, कनाडा, मिस्र, ब्रिटेन, हांगकांग, स्विटजरलैंड, फिलीपींस, इंडोनेशिया और सब्रिया की कई कंपनियों ने अपना योगदान दिया है। 1600 करोड़ रुपए से बनाए गए आठ लेन के इस ब्रिज पर पैदल, दोपहिया और तीन पहिया वाहनों से चलना मना है।

# पंबन ब्रिज


रामेश्वरम तक पहुंच आसान बनाने के लिए पुराने ब्रिज के स्थान पर नया पंबन रेल ब्रिज बनाया गया है। यह भारत का पहला वर्टिकल लिफ्ट ब्रिज है। यह ब्रिज 6,790 फुट लंबा है। समुद्र पार कर इसके 100 मेहराब बनाए गए हैं। इनमें से 99 मेहराब 18.3 मीटर की ऊंचाई वाले हैं। सेंट्रल वर्टिकल मेहराब 72.5 मीटर का है। यह पुराने रेलवे पुल से तीन मीटर अधिक ऊंचा है। नया पंबन ब्रिज 2.08 किलोमीटर लंबा है। इस ब्रिज से गुजरने वाली ट्रेनों के सिग्नल को हवा की स्पीड से जोड़ा गया है। अगर 50 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक तेज हवाएं चलती हैं, तो सिग्नल अपने आप रेड हो जाता है और इस ब्रिज से ट्रेनों की आवाजाही रुक जाती है।

इस ब्रिज की सबसे बड़ी खासियत है कि समुद्री जहाजों को रास्ता देने के लिए इसे बीच से उठाया जा सकता है। इसके लिए 72.5 मीटर का वर्टिकल लिफ्ट स्पैन बनाया गया है। पहले के ब्रिज में इसे उठाने के लिए लगभग एक घंटा लगता था। नए ब्रिज में इसे पांच मिनट में उठा दिया जाता है और ऐसा करने के लिए मैनपावर की जरूरत भी नहीं पड़ती।

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# डबल डेकर रूट ब्रिज

मेघालय में स्थित उमशियांग डबल डेकर रूट ब्रिज एक लिविंग रूट ब्रिज है। यहां तक पहुंचने के लिए चेरापूंजी से 45 किलोमीटर की ट्रेकिंग करनी पड़ती है। इसके पास ही एक झरना भी स्थित है। पर्यटन के कारण इस ब्रिज की स्थिति बिगड़ती देख चेरापूंजी के पास नानग्रीयाट में भी ऐसा ही एक ब्रिज तैयार किया गया है। दरअसल, इन ब्रिजों को एक विशेष तरह के रबर के पेड़ों को उगाकर तैयार किया गया है।

पहले इस रबर के पौधों को रोपा गया और फिर जैसे-जैसे पौधे बढ़ते गए, इन ब्रिजों की मजबूती बढ़ती गई। इन रूट ब्रिजों को मेघालय का ताजमहल भी कहा जाता है। इनको तैयार करने में 25 साल का समय लगा और ये एक साथ 50 लोगों का भार सह सकते हैं। यही नहीं, ये अगले 500 सालों तक सेवा दे सकते हैं।

पूर्वी खासी पहाड़ियों में पहले लिविंग रूट ब्रिज की शुरुआत 180 साल पहले खासी जनजाति के लोगों ने की थी। उन्होंने सुपाड़ी के खाली तनों में रखकर एक छोर से दूसरे छोर तक रबर की जड़ें इस तरह से रोपीं जिससे ब्रिज तैयार हो सके। फिर ये जड़ें बढ़ते-बढ़ते इतनी मजबूत होती गईं कि इंसान के लिए आवागमन का साधन बन गईं।

# हावड़ा ब्रिज

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता को इसके जुड़वा शहर से जोड़ने के लिए हुगली नदी पर बने ब्रिज को हावड़ा ब्रिज के नाम से जाना जाता है, जिसका असली नाम रवींद्र सेतु है। साल 1965 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर इस ब्रिज का नाम रखा गया था। इसे अंग्रेजों ने साल 1936 में बनवाना शुरू किया था और 1942 में यह पूरा भी हो गया था। दूसरे विश्व युद्ध में फंसे होने के कारण अंग्रेजों ने बिना किसी औपचारिक उद्घाटन के ही इस ब्रिज को फरवरी 1943 में जनता के लिए खोल दिया था। इस ब्रिज की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें एक भी नट-बोल्ट नहीं लगा है।

यह एक कंटीलीवर ब्रिज है, जो अपनी तरह का दुनिया में छठा सबसे लंबा ब्रिज है। यह ब्रिज नदी के दोनों ओर बने 280 फुट ऊंचे दो खंभों पर टिका है। पुल का डेक 39 जोड़ी हैंगरों से लटका हुआ है। इसकी कुल लंबाई 705 मीटर, चौड़ाई 21.6 मीटर और ऊंचाई 82 मीटर है।

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# राम झूला ब्रिज

राम झूला वास्तव में उत्तराखंड के ऋषिकेष शहर के केंद्र से तीन किलोमीटर की दूरी पर गंगा नदी पर बना एक ब्रिज है। इसका निर्माण 7 मार्च 1985 को शुरू हुआ था और 5 अप्रैल 1986 को पूरा हो गया था। तब यह उत्तर प्रदेश राज्य में था और इस पर 1.02 करोड़ की लागत आई थी। उस समय यह पुल उत्तर प्रदेश का सबसे लंबा झूला पुल था। इस पुल का नाम शुरू में शिवानंद झूला था, जो आगे चलकर राम झूला के नाम से प्रसिद्ध हो गया। इसकी लंबाई 220.4 मीटर और चौड़ाई दो मीटर है। इस पुल का टावर 21 मीटर ऊंचा है, जो 44 मिमी व्यास के 24 रस्सों पर टिकाया गया है।

# लक्ष्मण झूला ब्रिज

उत्तराखंड की योग नगरी ऋषिकेश में ही एक और झूला पुल है, जिसे लक्ष्मण झूला ब्रिज के नाम से जाना जाता है। गंगा पर बना लक्ष्मण झूला इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना है। अंग्रेजों ने साल 1927 में इस पुल का निर्माण शुरू कराया था, जो 1929 में पूरा हो गया। 124 मीटर लंबा और 6 फुट चौड़ा इस्पात के तारों वाला यह पुल 11 अप्रैल 1930 को जनता के लिए खोला गया था। उस समय यह यूनाइटेड प्रोविंस (बाद में उत्तर प्रदेश नाम से जाना गया) का हिस्सा था और राज्य का पहला सस्पेंशन ब्रिज था। यह जीप आदि हल्के वाहनों के लिए भी उपयुक्त था। सुरक्षा कारणों से अब इस ब्रिज को बंद किया जा चुका है।

# सिंगशोर ब्रिज

पश्चिमी सिक्किम की पहाड़ियों में स्थित सिंगशोर ब्रिज एशिया का दूसरा सबसे ऊंचा सस्पेंशन ब्रिज है। यह जमीन से 198 मीटर ऊंचा है। इस ब्रिज की लंबाई 240 मीटर है और यह सिक्किम का सबसे ऊंचा ब्रिज है। साल 2000 के शुरुआत में इसे लोहे और कंक्रीट से बनाया गया था।

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# राम सेतु

राम सेतु, जिसे एडम्स ब्रिज के नाम से भी जाना जाता है, रामेश्वरम को श्रीलंका के मन्नार द्वीप से जोड़ता है। यह प्राकृतिक लाइमस्टोन से बना 48 किलोमीटर लंबा ब्रिज है, जिसको लेकर कई धार्मिक कथाएं भी प्रचलित हैं। रामायण के अनुसार इस ब्रिज को भगवान राम ने वानरों की अपनी सेना की मदद से बनाया था। इसी पर चलकर वह माता सीता को बचाने लंका पहुंचे थे। वाल्मीकि रामायण में इस ब्रिज को सेतुबंथन कहा गया है। बताया जाता है कि 1480 तक यह ब्रिज समुद्र की सतह के ऊपर था। प्राकृतिक आपदाओं के कारण यह धीरे-धीरे समुद्र में समाता गया।

जानकारों के अनुसार इसे एडम्स ब्रिज इसलिए कहा जाता है, क्योंकि बाइबल और कुरान के मुताबिक पहले मनुष्य एडम ने इसी प्राकृतिक ब्रिज से श्रीलंका तक की यात्रा की थी।

# अन्नाई इंदिरा गांधी रोड ब्रिज

यह ब्रिज नेशनल हाईवे 49 को पंबन द्वीप पर स्थित रामेश्वरम से जोड़ता है। चारों ओर समुद्र से घिरा यह ब्रिज पंबन रेल ब्रिज के बगल में ही स्थित है। इसका उद्घाटन साल 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने किया था। अन्नाई इंदिरा गांधी रोड ब्रिज की लंबाई 2.34 किमी है और इसके नीचे से जहाज आसानी से गुजर जाते हैं।

# सरायघाट ब्रिज

असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाया गया सरायघाट ब्रिज एक रेल कम रोड ब्रिज है। यह असम राज्य में इस तरह का किसी नदी पर बना पहला ब्रिज है। इसकी लंबाई 1492 मीटर है। इस ब्रिज पर सड़क की चौड़ाई 7.3 मीटर है। इस ब्रिज का निर्माण साल 1959 से 1962 के बीच किया गया था और तब इसकी लागत 10.6 करोड़ रुपये थी। 23 सितंबर 1962 को इस ब्रिज से पहला रेल इंजन गुजरा था। यह ब्रिज पूर्वोत्तर को पूरे भारत से जोड़ने के लिए जाना जाता है। यह ब्रिज नदी के सामान्य बहाव से 40 फुट बना है।

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