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वैज्ञानिकों के लिए भी अनसुलझी हैं इन 7 रहस्यमयी मंदिरों की कहानी

भारत को आध्यात्म और साधना का केंद्र माना जाता है जहां सनातन धर्म में मंदिरों की परम्परा काफी पुरानी है। देशभर में लाखों-करोड़ों मंदिर हैं जिनसे भक्तों की आस्था जुड़ी हुई हैं। लेकिन इन मंदिरों में से कई ऐसे हैं जो अपने बेहद चमत्कारिक और रहस्यमयी हैं।

Posts by : Ankur Mundra | Updated on: Wed, 09 Mar 2022 2:41:31

वैज्ञानिकों के लिए भी अनसुलझी हैं इन 7 रहस्यमयी मंदिरों की कहानी

भारत को आध्यात्म और साधना का केंद्र माना जाता है जहां सनातन धर्म में मंदिरों की परम्परा काफी पुरानी है। देशभर में लाखों-करोड़ों मंदिर हैं जिनसे भक्तों की आस्था जुड़ी हुई हैं। लेकिन इन मंदिरों में से कई ऐसे हैं जो अपने बेहद चमत्कारिक और रहस्यमयी हैं। इन मंदिरों के रहस्य आज भी अनसुलझे हैं और कई वैज्ञानिक भी इनका कारण नहीं बता पाए हैं। पहली बार जा इन मंदिरों के बारे में पता चलता हैं तो लोग अचरज में पड़ जाते हैं। आज इस कड़ी में हम आपको देश के कुछ ऐसे ही रहस्यमयी मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनकी कहानी वैज्ञानिकों के लिए भी अनसुलझी हैं। तो आइये जानते हैं इन मंदिरों के बारे में...

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जगन्नाथ जी का मंदिर, कानपुर

कानपुर जिले की घाटमपुर तहसील के बेहटा गांव में भगवान जगन्नाथ जी का एक मंदिर है। इस मंदिर में मानसून आने से ठीक 15 दिन पहले मंदिर की छत से पानी टपकने लगता है। इसी से आस-पास के लोगों को बारिश के आने का अंदाजा हो जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर का इतिहास 5 हजार साल पुराना है। यहां मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलदाऊ और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। इनके अलावा मंदिर में पद्मनाभम की भी मूर्ति स्थापित है। स्थानीय निवासियों के अनुसार सालों से वह मंदिर की छत से टपकने वाली बूंदों से ही मानसून के आने का पता करते हैं। कहते हैं कि इस मंदिर की छत से टपकने वाली बूंदों के हिसाब से ही बारिश भी होती है। यदि बूंदे कम गिरीं तो यह माना जाता है बारिश भी कम होगी। इसके उलट अगर ज्यादा तेज और देर तक बूंदे गिरीं तो यह माना जाता है कि बारिश भी खूब होगी। बताते हैं कई बार वैज्ञानिक और पुरातत्व विशेषज्ञों ने मंदिर से गिरने वाली बूंदों की पड़ताल की। लेकिन सदियां बीत गई हैं इस रहस्य को, आज तक किसी को नहीं पता चल सका कि आखिर मंदिर की छत से टपकने वाली बूंदों का राज क्या है।

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मां कामाख्या देवी मंदिर, असम

मां कामाख्या देवी का मंदिर असम में राजधानी गुवाहाटी के नजदीक स्थित है। यह चमात्कारिक मंदिर मां भगवती के 51 शक्तिपीठों में शामिल हैं। लेकिन प्राचीन मंदिर में देवी भगवती की एक भी मूर्ति नहीं है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, जब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से मां सती के शव को काटा था, तो कामाख्या में उनके शरीर का एक भाग गिरा था। जहां-जहां माता सती के अंग गिरे थे वह जगह शक्तिपीठ कहलाती है। यहां पर कोई मूर्ति नहीं है मां सती के शरीर के अंग की पूजा की जाती है। कामाख्या मंदिर को शक्ति-साधना का केंद्र माना जाता है। यहां पर हर किसी की कामना पूरी होती है। इस वजह से इस मंदिर का नाम कामाख्या पड़ा है। यह मंदिर तीन भागों में बंटा है। इसके पहले हिस्से में हर किसी को जाने की इजाजत नहीं है। दूसरे हिस्से माता के दर्शन होते हैं। यहां पर एक पत्थर से हमेशा पानी निकलता रहता है। बताया जाता है कि इस पत्थर से महीने में एक बार खून की धारा बहती है। यह क्यों और कैसे होता है। इस बात का पता आज तक वैज्ञानिक भी नहीं लगा पाए।

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मां त्रिपुर सुदंरी मंदिर, बिहार

बिहार के बक्सर में तकरीबन 400 साल पहले ‘मां त्रिपुर सुदंरी’ मंदिर का निर्माण हुआ था। इसकी स्थापना के बारे में जिक्र मिलता है कि भवानी मिश्र नाम के एक तांत्रिक ने ही इसकी स्थापना की थी। इस मंदिर में प्रवेश करते ही आपको एक अलग तरह की शक्ति का आभास हो जाएगा, लेकिन मध्य रात्रि में मंदिर परिसर से आवाजें आनी शुरू हो जाती है। कहा जाता है कि यह आवाजें देवी मां की प्रतिमाओं के आपस में बात करने से आती है। आस-पास के लोगों को भी यह आवाजें साफ-साफ सुनाई देती हैं। मंदिर से आने वाली आवाजों पर कई पुरातत्व विज्ञानियों ने अध्ययन किया लेकिन परिणाम में निराशा ही हाथ आई। फिलहाल पुरातत्व विज्ञानियों ने भी यही मान लिया कि कुछ तो है जो मंदिर में आवाजें आती हैं।

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ज्वालामुखी मंदिर, हिमाचल प्रदेश

हिमाचल प्रदेश के कालीधार पहाड़ी के बीच माता ज्वाला देवी का प्रसिद्ध ज्वालामुखी मंदिर है। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक, यहां पर माता सती की जीभ गिरी थी। मान्यताओं के मुताबिक, माता सती के जीभ के प्रतीक के तौर पर ज्वालामुखी मंदिर में धरती से ज्वाला निकलती है। यह ज्वाला नौ रंग की होती है। यहां नौ रंगों की निकलने वाली ज्वालाओं को देवी शक्ति का नौ रूप माना जाता है। यह ज्वाला महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विन्ध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका और अंजी देवी की रूप है। मंदिर में निकलने वाली ज्वालाएं कहां से निकलती हैं और इनका रंग कैसे परिवर्तित होता है। आज तक इस बात की कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। इस ज्वाला को मुस्लिम शासकों ने कई बार बुझाने की कोशिश की, लेकिन उनको सफलता नहीं मिली।

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करणी माता मंदिर, राजस्थान

करणी माता का मंदिर राजस्थान के बीकानेर जिले के देशनोक में स्थित है। यह चूहों वाली माता का मंदिर के नाम देशभर में प्रसिद्ध है। करणी माता के मंदिर में अधिष्ठात्री देवी की पूजा की जाती है। अधिष्ठात्री देवी के मंदिर में चूहों का साम्राज्य है। यहां पर करीब 2500 हजार चूहे मौजूद हैं। यहां पर मौजूद चूहे अधिकतर काले रंग के हैं। इनमें कुछ सफेद और काफी दुर्लभ प्रजाति के हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, जो लोग सफेद चूहा देख लेते हैं उनकी मनोकामना पूरी हो जाती है। सबसे आश्चर्य करने वाली बात यह है कि चूहे किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं और मंदिर परिसर में दौड़ते रहते हैं। मंदिर में चूहों की संख्या इतनी है कि लोग पांव उठाकर नहीं चल पाते। इस मंदिर के बाहर चूहे नहीं दिखते हैं।

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ऐरावतेश्वर मंदिर, तमिलनाडु

इसका निर्माण 12वीं सदी में चोल राजाओं ने करवाया था। ज्ञात हो कि यह बेहद ही अद्भुत मंदिर है। यहां की सीढ़ियों पर संगीत गूंजता है। इस मंदिर को बेहद खास वास्तुशैली में बनाया गया है। इस मंदिर की खास बात है तीन सीढ़ियां। जिन पर जरा सा भी तेज पैर रखने पर संगीत की अलग-अलग ध्वनि सुनाई देने लगती है। लेकिन इस संगीत के पीछे क्या रहस्य है। इस पर आज तक पर्दा ही है। यह मंदिर भोलेनाथ को समर्पित है। मंदिर की स्थापना को लेकर स्थानीय किवंदतियों के अनुसार यहां देवताओं के राजा इंद्र के सफेद हाथी ऐरावत ने शिव जी की पूजा की थी। इस वजह से इस मंदिर का नाम ऐरावतेश्वर मंदिर हो गया। बता दें कि यह मंदिर महान जीवंत चोल मंदिरों के रूप में जाना जाता है, साथ ही इसे यूनेस्को की ओर से वैश्विक धरोहर स्थल भी घोषित किया गया है।

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मेहंदीपुर बाला जी मंदिर, राजस्थान

महेंदीपुर बालाजी मंदिर भी राजस्थान में है। यह चमात्कारिक मंदिर राज्य के दौसा जिले में स्थित है। मेहंदीपुर बालाजी धाम हनुमान जी के 10 प्रमुख सिद्धपीठों में शामिल है। माना जाता है कि यहां पर भगवान हनुमान जागृत अवस्था में विराजमान हैं। बताया जाता है कि जिन लोगों के ऊपर भूत-प्रेत और बुरी आत्मा का साया होता है। वह प्रेतराज सरकार और कोतवाल कप्तान के मंदिर में आते ही लोगों के शरीर से बुरी आत्माएं और भूत-पिशाच पीड़ित व्यक्ति के शरीर से निकल जाता है। इस मंदिर में रात को रुका नहीं जा सकता है और यहां का प्रसाद भी घर नहीं लेकर जाया जा सकता है।

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