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ब्रह्मकपाल घाट: जहां श्राद्ध से मिलता है आठ गुना अधिक पुण्य, विदेशी भी करने आगे हैं पिंडदान

बदरीनाथ धाम के पास स्थित ब्रह्मकपाल घाट पर श्राद्ध और पिंडदान करने से आठ गुना अधिक पुण्य मिलता है। यहां न केवल भारतीय बल्कि विदेशी श्रद्धालु भी पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए आते हैं।

Posts by : Kratika Maheshwari | Updated on: Sun, 14 Sep 2025 9:46:22

ब्रह्मकपाल घाट: जहां श्राद्ध से मिलता है आठ गुना अधिक पुण्य, विदेशी भी करने आगे हैं पिंडदान

बदरीनाथ धाम के पास स्थित ब्रह्मकपाल घाट सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था और मोक्ष का अनूठा संगम है। मान्यता है कि यहां पितरों के श्राद्ध और तर्पण से अन्य किसी भी स्थान की तुलना में आठ गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है। यही कारण है कि भारत के विभिन्न राज्यों से ही नहीं, बल्कि अमेरिका, रूस, कनाडा, फ्रांस और यूरोप जैसे देशों से भी लोग हजारों किलोमीटर का सफर तय करके अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां पिंडदान करने आते हैं।

कहा जाता है कि यही वह स्थान है जहां भगवान शिव ने ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाई थी। इसीलिए इसे ‘मोक्षभूमि’ कहा जाता है और हर साल पितृपक्ष के दौरान यहां श्रद्धालुओं का भारी जमावड़ा लगता है।

अलकनंदा के तट पर पितरों की शांति के लिए पूजा

बदरीनाथ से मात्र 500 मीटर की दूरी पर अलकनंदा नदी के किनारे स्थित ब्रह्मकपाल में हर वर्ष असंख्य लोग अपने पितरों की आत्मा की मुक्ति के लिए श्राद्ध और पिंडदान करते हैं। स्थानीय तीर्थ पुरोहित अरविंद हटवाल बताते हैं कि बीते कुछ वर्षों से यहां आने वाले विदेशी श्रद्धालुओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

9/11 के बाद विदेशियों की आस्था का झुकाव

तीर्थ पुरोहित महावीर प्रसाद हटवाल याद करते हुए बताते हैं कि साल 2001 में जब अमेरिका पर 9/11 का आतंकी हमला हुआ, उसके बाद पहली बार 15 विदेशी एक साथ ब्रह्मकपाल पहुंचे और सामूहिक रूप से पिंडदान किया। यही वह क्षण था जब यह परंपरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचानी जाने लगी। इसके बाद से अमेरिका, रूस, यूक्रेन, कनाडा, फ्रांस जैसे देशों के श्रद्धालु लगातार यहां आकर पितरों के लिए अनुष्ठान कर रहे हैं।

पौराणिक कथा से जुड़ी मान्यता

बदरीनाथ धाम के पूर्व धर्माधिकारी आचार्य भुवन उनियाल बताते हैं कि इस स्थान का महत्व भगवान शिव की कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि जब महादेव ने क्रोधवश ब्रह्मा के पांच सिरों में से एक को त्रिशूल से काटा, तो वह उनके त्रिशूल से चिपक गया और ब्रह्महत्या का दोष उन पर चढ़ गया। मुक्ति की खोज में शिव पूरे पृथ्वी लोक में भटकते रहे और जब बदरीनाथ के इस स्थान पर पहुंचे तो त्रिशूल से वह सिर नीचे गिर गया। तभी से यह स्थान ‘ब्रह्मकपाल’ के नाम से विख्यात हुआ।

अकाल मृत्यु वालों के लिए मोक्ष का स्थान


तीर्थ पुरोहित विवेक सती, अजय सती और सुबोध हटवाल का कहना है कि ब्रह्मकपाल पर किए गए श्राद्ध और पिंडदान से उन आत्माओं को विशेष शांति मिलती है, जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो। मान्यता है कि यहां की गई श्रद्धापूर्वक प्रार्थना से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि आज यह घाट न केवल भारतीय आस्था का केंद्र है, बल्कि विदेशी श्रद्धालुओं को भी अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।

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