
—राजेश कुमार भगताणी
भारतीय पौराणिकता और आधुनिक मनोरंजन शैली का मेल जब पर्दे पर सलीके से पेश किया जाए, तो परिणाम होता है एक ऐसी फिल्म जो दर्शकों को बांधकर रखती है। थामा (Thamma) भी इसी परंपरा का हिस्सा है, जो मैडॉक हॉरर कॉमेडी यूनिवर्स की अगली पेशकश है। यह फिल्म डर, मोहब्बत और हास्य के रंगों को बड़ी खूबसूरती से एक साथ समेटती है और एक सशक्त सिनेमाई अनुभव पेश करती है।
कहानी का सार
फिल्म की कहानी शुरू होती है आलोक गोयल (आयुष्मान खुराना) से, जो एक टीवी रिपोर्टर है और अपने माता-पिता (परेश रावल और गीता अग्रवाल) के साथ रहता है। एक ट्रेकिंग ट्रिप के दौरान पहाड़ियों में अचानक एक भालू के हमले से उसकी जान जाती-जाती बचती है, और यहीं उसकी मुलाकात होती है रहस्यमयी लड़की ताड़का (रश्मिका मंदाना) से। ताड़का न सिर्फ उसे बचाती है बल्कि उसकी देखभाल भी करती है। धीरे-धीरे दोनों के बीच आकर्षण पनपता है, लेकिन तभी कहानी लेती है मोड़, जब आलोक एक रहस्यमयी जनजाति द्वारा पकड़ लिया जाता है, जिसका नेतृत्व करता है यक्षासन (नवाजुद्दीन सिद्दीकी)। ताड़का अपने कबीले की मर्यादाओं को तोड़ते हुए आलोक को बचाने निकल पड़ती है, और इसी संघर्ष से आगे की कहानी खुलती है जो कई भावनात्मक और एक्शन से भरपूर मोड़ों से गुजरती है।
निर्देशन और पटकथा
निर्देशक आदित्य सर्पोतर का निर्देशन इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। मुनझा (2024) के बाद एक बार फिर उन्होंने दिखाया है कि वे जॉनर को किस तरह सहजता से मिश्रित कर सकते हैं। फिल्म में कहीं पर हॉरर की झलक है तो कहीं पर हास्य और रोमांस की मिठास। सबसे खास बात ये है कि फिल्म की कहानी, चाहे वह कितनी भी काल्पनिक क्यों न हो, आम दर्शकों को समझ आती है और मनोरंजन करती है।
फिल्म के कुछ दृश्य लंबे समय तक याद रहेंगे – जैसे ताड़का की पहली एंट्री, उसका आलोक के माता-पिता के साथ डिनर करना और गुंडों से आलोक को बचाना। इंटरवल से पहले का मोड़ जबरदस्त है, जबकि क्लाइमैक्स में थोड़ी कमी महसूस होती है। हालांकि प्री-क्लाइमैक्स की लड़ाई दृश्यात्मक रूप से शानदार है।
पटकथा की बात करें तो कहानी में बहाव है लेकिन कुछ हिस्सों में गहराई की कमी है। आलोक के करियर या उसकी रिपोर्टिंग प्रोफेशन को दिखाने का कोई खास उद्देश्य नजर नहीं आता। साथ ही उसे एक 'लूज़र' बताया गया है लेकिन स्क्रीन पर वह ज्यादा चार्मिंग और स्मार्ट नजर आता है, जिससे ये पहलू कमजोर पड़ता है। फिल्म का दूसरा भाग थोड़ा खिंचता है और यहीं पर दर्शकों की पकड़ ढीली हो जाती है।

अभिनय का जादू
आयुष्मान खुराना इस फिल्म में शानदार फॉर्म में हैं। उनकी अदाकारी में मासूमियत, हास्य और गंभीरता का बेहतरीन संतुलन है। वे पूरे फिल्म को अपने कंधों पर उठाते हैं। रश्मिका मंदाना ने ताड़का के किरदार को पूरी शिद्दत से निभाया है – रहस्य, जुनून और कोमलता से भरा हुआ यह किरदार उनकी अब तक की बेहतरीन परफॉर्मेंस में से एक है।
परेश रावल अपने अनुभव और कॉमिक टाइमिंग से फिल्म को हल्कापन देते हैं, वहीं नवाजुद्दीन सिद्दीकी अपनी अलग स्टाइल में यक्षासन के रोल को निभाते हैं। उनका किरदार डराता नहीं, बल्कि अपने संवादों से हंसी जरूर दिलाता है। फैयाज मलिक और गीता अग्रवाल शर्मा भी अपने-अपने किरदारों में सशक्त हैं। वहीं वरुण धवन का कैमियो (भेड़िया के रूप में) फिल्म को यूनिवर्स से जोड़ने में मजेदार ट्विस्ट देता है।
तकनीकी पक्ष और संगीत
संगीतकार जोड़ी सचिन-जिगर ने फिल्म के लिए कुछ पेप्पी गाने जरूर दिए हैं, लेकिन पिछले यूनिवर्स फिल्मों जैसे स्त्री या भेड़िया के मुकाबले ये उतने प्रभावशाली नहीं हैं। ‘तुम मेरे न हुए’ जो फिल्म के अंत में बजता है, वो एक खूबसूरत ट्रैक है। ‘रहें ना रहें हम’ और ‘पॉइज़न बेबी’ भी ध्यान खींचते हैं।
बैकग्राउंड स्कोर में टेंशन और रोमांटिक अंडरकरंट को अच्छे से उभारा गया है। सौरभ गोस्वामी की सिनेमेटोग्राफी फिल्म को एक विजुअल ट्रीट बनाती है। DNEG द्वारा किया गया VFX विशेषकर प्राणियों और रहस्यमयी लोकेशनों में अत्यंत प्रभावी है। एक्शन कोरियोग्राफी तेज और धारदार है। हेमंती सरकार की एडिटिंग पहले हाफ में चुस्त है लेकिन दूसरे भाग में थोड़ी ढीली पड़ती है।
कुल मिलाकर, थामा एक मनोरंजक, रोमांचक और भावनात्मक रूप से असरदार फिल्म है, जो मैडॉक हॉरर कॉमेडी यूनिवर्स को एक मजबूत कड़ी के रूप में आगे बढ़ाती है। यह फिल्म एक ऐसे अनुभव की तरह है जो डराती भी है, हंसाती भी है और प्रेम की गहराई को भी छूती है।
त्योहारों के इस मौसम में यह फिल्म सिनेमाघरों में दर्शकों को आकर्षित करने में सफल रहेगी, और बॉक्स ऑफिस पर इसकी शुरुआत मजबूत रहने की पूरी संभावना है। थामा इस बात का प्रमाण है कि भारतीय दर्शक अब केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक अनुभव की तलाश में हैं – और यह फिल्म वही अनुभव लेकर आती है।














